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आरक्षण पर राजनीति का भ्रमजाल

हमारे देश में आरक्षण पर राजनीति और दुष्प्रचार कब तक होता रहेगा। यह एक ज्वलन्त विषय है, जो अभी तक भी आम जनता की समझ से परे नजर आ रहा है। हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया है। उसे लेकर भी राजनीतिक दल भ्रम फैला रहे हैं। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला दिया है कि सरकारी नौकरी में प्रमोशन के अवसर पर आरक्षण देने के लिए बाध्यता नहीं है। मगर इस फैसले की आड़ में यह दुष्प्रचार किया जा रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय आरक्षण को ही खत्म करने जा रहा है। न्यायालय के फैसले के साथ साथ यह भी प्रचारित किया जा रहा है कि केंद्र सरकार भी इसके लिए जिम्मेदार है। अनेक प्रमुख राजनेता व राजनैतिक दल न्यायालय के इस फैसले को तीन तलाक, धारा 370 तथा नागरिकता संशोधन कानून से जोड़ रहे हैं। वह यह भी कह रहे हैं कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरक्षण को खत्म करने के लिए प्रयासरत हैं। इस प्रकार के दुष्प्रचार से संबंधित वर्गों में अफरा तफरी होनी स्वाभाविक है। सरकार इस मुद्दे पर सफाई दे चुकी है और दे रही है। सरकार यह भी स्पष्ट कर चुकी है कि इस विषय में केंद्र सरकार का कोई लेना देना नहीं है तथा ना ही इस प्रकरण में केंद्र सरकार किसी भी रूप में पक्षकार है। इसके बावजूद भी। राजनीति के खिलाड़ी। माहौल बिगाड़ने से बाज नहीं आ रहे हैं।रू हालांकि आरक्षण एक ऐसा ज्वलंत और नाजुक विषय बन गया है। जिससे देश के करोड़ों लोग सीधे प्रभावित है। हालांकि आरक्षण का स्त्रोत देश का संविधान है। मगर अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए सत्ता सत्ता से दूर हुए विपक्षी दल भ्रामक व्याख्या करने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। बात। उत्तराखंड से आरंभ हुई। उत्तराखंड सरकार के लोक निर्माण विभाग के सहायक अभियंताओं के प्रमोशन से जुड़े। लोअर कोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार किया। मगर। न्यायालय के इस निर्णय को भी। दुष्प्रचार के जरिए। संबंधित लोगों को दिग्भ्रमित किया जा रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान निर्माताओं की उस व्यवस्था व भावना को उल्लेखित किया है, जिसके अंतर्गत आरक्षण को मूलभूत अधिकार नहीं माना गया है। यह भी सच है कि सामाजिक न्याय के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए भारत के संविधान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था दी हुई है। साथ ही सच्चाई यह भी है कि स्वयं संविधान निर्माता इस व्यवस्था को लंबे काल तक चलाने के लिए पक्ष में नहीं थे।
अभी सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है उसमें यह उल्लेख है कि जिन वर्गों के प्रतिनिधित्व में कोई असंतुलन नहीं है, तो सरकार को वहां प्रमोशन के स्तर पर आरक्षण लागू करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में हर बिंदु स्पष्ट है तथा इस फैसले में ना तो आरक्षण को अवैध ठहरा है और ना ही आरक्षण पर किसी प्रकार की रोक लगाने वाला यह निर्णय है। इसके बावजूद इस फैसले पर राजनीति करने वाले अपनी सोच और पूर्वाग्रह से बाज नहीं आ रहे।
गौरतलब बात यह भी है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और सामाजिक न्याय बराबरी की बेसिक चीजें हैं। आरक्षण उस तक पहुंचने का एक तरीका भर है, मगर कोई मौलिक अधिकार नहीं है। आरक्षण को तब तक ही लागू रखा जाना आवश्यक प्रतीत होता है। जब तक कि इस प्रकार के आरक्षण के लिए धरातल पर यथोचित आधार हैं। मगर हमारे यहां मामला सिर्फ जातिगत आरक्षण के आधार पर टिका हुआ है। यद्यपि जातिगत आरक्षण जारी है। शिक्षा और नौकरी में प्रवेश के स्तर पर आरक्षण अभी तक कायम है। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने सिर्फ और सिर्फ इस बात पर निर्णय दिया है कि प्रमोशन के दौरान आरक्षण दिया जाना कोई आवश्यक नहीं। इसके बावजूद पूर्वाग्रह तथा दुष्प्रचार सिर्फ स्वार्थ को राजनीति है और सामाजिक व्यवस्था के लिए यह सब विषम साबित होता जा रहा है।

श्यामसुंदर जैन
स्वतंत्र पत्रकार, चूरू राजस्थान

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