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कोरोना कालीन प्रबंधन- दो दृश्य 

1. अदृश्य कोरोना ने भारी-भरकम दुकान बंद करवा दी है। डबल शटर लगा हुआ है। सूरज उगे कोई एक घंटा बीत गया। आटे-मिर्च की तलाश में एक ग्राहक भटक रहा है। थका मांदा वह दुकान के बाहर अतिक्रमी सीढ़ियों पर बैठा है। सरकारी दुर्गति से तंग आकर अपने मुंह पर डबल मास्क लगा रखा है। अचानक सामने 10 पुलिस के भद्र जन उपस्थित हो गए हैं। पुलिस की सारी व्यवस्था ऐसी पारदर्शी है, जैसे कि उनके मुंह पर कोई मास्क नहीं है। उनके हाथों में अपने-अपने निजी डंडे हैं, जैसे समर्थ व्यक्तियों के हाथों में अपने निजी कानून होते हैं। उस गरीब ग्राहक की दसों-दिशाओं में पुलिस के दसों डंडे फड़-फड़ाने लगे हैं। पुलिस ने तबीयत से अपने डंडे साफ किए। क्यों बे! तूने डबल मास्क क्यों लगा रखा है? पूरे देश में तू कोरोना की नई दहशत फैलाना चाहता है? और यह दुकान खोल कर क्यों बैठा है? कुछ बोलता क्यों नहीं? मुंह चुप कर क्यों बैठा है? निकाल हजार रुपए का चालान! मारा-पीटी, चालान-फालान, रफा-दफा-वफा का कार्यक्रम सड़क पर विधिवत संपन्न! सौदा 500 रुपयों पर तय हुआ। आटा नमक मिर्च के लिए घर से लाए हुए रुपयों को ग्राहक ने पुलिस को भेंट किया। उसने अपने घुटनों में मुंह डालकर राहत की सांस ली। ग्राहक बहुत खुश हुआ कि आज उसकी जान तो बच गई! सामने गली के कुत्ते पुलिस पर जोर-जोर से भौंक रहे हैं। कुत्तों के उसी शिष्टमंडल पर अशिष्ट विधि से पुलिस ने अपने डंडे फेंक मारे हैं। एक भद्र कुत्ते की टांग से खून बहने लगा है। वह की-की-की करते हुए, उस ग्राहक के सिर के ऊपर से छलांग मार, एक भव्य कूड़ा घर में विलीन हो गया है।
2. यह स्वर्ग धाम स्मार्ट सिटी का काफी व्यस्त शहर है। इसमें अमरसिंह घाट पर रात-दिन शव जल रहे हैं। सभी शव जलने के लिए अपने-अपने टोकन लिए 3 दिन से बाहर पड़े कसमसा रहे हैं। श्मशान के भूतों ने इन दिनों अपना डेरा करीब के रानी रूपमती खंडहर में शिफ्ट कर लिया है। करीब 10 प्रतिशत शव ही अपनी अंतिम क्रिया का आनंद ले चुके हैं। अपने प्रिय को खोने का गम अब पूरे व्यापार में बदल चुका है। हताश-निराश परिजन शव को जलाने के लिए उसके जलने का इंतजार छोड़ चुके हैं। अंतिम संस्कार कार्यक्रम में लेनदेन हो रहा है। सर जी, 10,000  रुपयों में काम नहीं चलेगा। इसके लिए पूरे 50,000 रुपए लगेंगे। देखो! यह शव भी बहुत मोटा है। फिर पुलिस को भी उनका कमीशन देना होता है। प्लीज! 40,000 में मामला सलटा दीजिए! कह दिया न! एक रुपया भी कम नहीं…! इसी श्मशान की एक सड़क पर रिक्शे में बदहवास महिला बैठी है। उसके पैरों के पास उसके जवान बेटे की लाश पड़ी है। लाश के हाथ-पांव सड़क पर हवा में झूल रहे हैं। जब सरकारी हॉस्पिटल ले जाया गया, तो उसकी सांसे चल रही थी। तब हॉस्पिटल ने साफ मना कर दिया था। प्राइवेट हॉस्पिटल ने तो मां-बेटे की शक्ल देखते ही उनके बाउंसरों ने हॉस्पिटल के आसपास भी फटकने नहीं दिया। न एंबुलेंस मिली, न ही ऑक्सीजन! बस मिली तो कोरोना की लहर! मां ने फोन निकाला और ऑनलाइन क्रिया-कर्म अंत्येष्टि के लिए कोई ऐप डाउनलोड करने लगी। घनघोर पीड़ाओं से लथपथ शरीर मोबाइल में टच-टच कर रहा था। ऑनलाइन सर्वर पर भारी ट्रैफिक जाम लगा था। बस एक चकरा घूम रहा था।
रामविलास जांगिड़
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