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अपराधी होंगे बेपर्दा

देश में दागी सियासत सुर्खियों में है। ऐसा लगता है आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं के सामने राजनीतिक दल नतमष्तक हो गए है। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर इस सम्बन्ध में कुछ निर्देश जारी कर राजनीतिक दलों से सवाल जवाब किये है। सदा की तरह यह सुर्खिया केवल मीडिया तक ही सीमित रहेगी क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल दागी सियासत से अछूता नहीं है। ऐसा लगता है सियासी दलों ने दागियों के आगे घुटने टेक दिए है। सियासत में स्वच्छता का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी भी दागियों के सामने असहाय है। इस पार्टी के संस्थापक रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री शांतिभूषण ने आपराधिक छवि के लोगों को टिकिट देने के कारण पार्टी की विजय पर बधाई देने से इंकार कर दिया। दिल्ली विधान सभा के हालिया चुनावों में 70 में से 41 विजयी विधायकों पर आपराधिक मुकदमे चल रहे है इनमें आप पार्टी के सर्वाधिक 38 नव निर्वाचित विधायक शामिल है।
राजनीति को अपराधियों के चंगुल से मुक्त कराने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सभी राजनीतिक दलों को आदेश दिया कि उसे अपने उम्मीदवारों के आधिकारिक मामलों का रिकॉर्ड अपने वेबसाइट पर दिखाना होगा। यह भी आदेश जारी किया कि क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले उम्मीदवारों को वो टिकट क्यों दे रहे हैं, इसकी वजह बतानी होगी और जानकारी वेबसाइट पर देनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सियासी दलों को वेबसाइट, न्यूजपेपर और सोशल मीडिया पर यह बताना होगा कि उन्होंने ऐसे उम्मीदवार क्यों चुनें जिनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। जस्टिस आरएफ नरीमन और एस रविंद्र भट की बेंच ने कहा कि राजनीतिक दलों को यह बताना होगा कि उन्होंने एक साफ छवि के उम्मीदवार की बजाय आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार को क्यों टिकट दिया। कोर्ट ने जिताऊ उम्मीदवार के तर्क को खारिज किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बीते चार आम चुनाव से राजनीति में आपराधिकरण तेजी से बढ़ा है।
एक आधिकारिक जानकारी के अनुसार वर्तमान में 542 सांसदों में से 233 यानि 43 फीसदी सांसदों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे लंबित हैं। भाजपा के 303 में से 116, कांग्रेस के 52 में से 29, लोजपा के सभी छह निर्वाचित सदस्यों, बसपा के 10 में से 5, जदयू के 16 में से 13, तृणमूल कांग्रेस के 22 में से नौ और माकपा के तीन में से दो सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। 204 लंबित मामलों वाले केरल से निर्वाचित कांग्रेसी सांसद डीन कुरियाकोस दागी सूची में सबसे आगे है। आपराधिक मामलों में फंसे सर्वाधिक सांसद केरल और बिहार से चुन कर आए। केरल से निर्वाचित 90 फीसदी, बिहार से 82 फीसदी, पश्चिम बंगाल से 55 फीसदी, उत्तर प्रदेश से 56 और महाराष्ट्र से 58 प्रतिशत सांसदों पर केस लंबित है। वहीं सबसे कम नौ प्रतिशत सांसद छत्तीसगढ़ के और 15 प्रतिशत गुजरात के हैं। हलफनामों के हिसाब से 159 यानि 29 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर मामले लंबित है।
राजनीति के अपराधीकरण पर गाहे बगाहे मीडिया में एक बार सुर्खिया बनती है और फिर यह प्रकरण ठंडे बस्ते में समा जाता है। पिछले दो दशकों के इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो अपराधी सियासत के इस मामले में हम खाली हाथ ही मिलेंगे। इस बारे में अनेक बार सुप्रीम कोर्ट अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। चुनाव आयोग का रुख भी स्पष्ट है। राजनीतिक दल हाथी के दांत की कहावत से आगे बढ़ते नहीं मिलेंगे। मगर देश की जनता चाहती है दागी सियासत का नापाक गठजोड़ तोडा जाये। हालाँकि यह अलग बात है दागी को चुनाव तो जनता ही जिताती है। यहाँ सवाल यह पैदा होता है जब सब चाहते है की चुनाव से दागियों को दूर रखा जाये तो अब तक कोई भी स्पष्ट निर्णय क्यों नहीं ले पाता है। यह विचारणीय है। मोदी सरकार अपने साहसिक निर्णयों के लिए विख्यात है मगर राजनीति के अपराधीकरण पर वह भी चुप्पी साधे है। सही बात तो यह है दागियों ने सभी पार्टियों में अपनी पेठ मजबूत बना रखी है और बड़ी संख्या में माननीय ऐसे मामलों में फंसे हुए है।
देश की सियासत में नेताओं और अपराध का चोली-दामन का साथ रहा है। आजादी के बाद से ही देश में जाति, धन और बाहुबल का दबदबा देखा गया। जाति और दागी सियासत धीरे धीरे बढ़ती गई और आजादी के 73 सालों के बाद भी हम इसका तौड़ नहीं ढूंढ पाए फलस्वरूप सियासत में इनका दबदबा आज भी कायम है। देश में ऐसी कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं, जो पूरी तरह से दागी मुक्त हो। यानी उनके किसी भी एक नेता पर अपराध के मामले दर्ज नहीं हों।
पिछले 73 सालों में जिस तरह हमारी राजनीति का अपराधीकरण हुआ है और जिस तरह देश में आपराधिक तत्वों की ताकत बढ़ी है, वह जनतंत्र में हमारी आस्था को कमजोर बनाने वाली बात है। राजनीतिक दलों द्वारा अपराधियों को शह देना, जनता द्वारा वोट देकर उन्हें स्वीकृति और सम्मान देना और फिर कानूनी प्रक्रिया की कछुआ चाल, यह सब मिलकर हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था और जनतंत्र के प्रति हमारी निष्ठा, दोनों, को सवालों के घेरे में खड़ा कर देते हैं।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
D-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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