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दहीबड़े ने घोंटा प्रजातंत्र का गला!

प्रजातंत्र के गले पर चिंतन कर रहा हूं। इसके गले को घोंटने की खबरें निरंतर सुनाई पड़ रही है। राजनीति की इस कलहकारी गला काट प्रतियोगिता में सभी एक दूसरे का गला काटते हुए प्रजातंत्र का गला घोंटने की कलाकारी कर रहे हैं। हर कोई हमारे देश की अनेकता में चाकू फेंकता जीव का कदरदान हुआ जा रहा है। प्रजातंत्र का गला हर एक सियासी पार्टी अपने-अपने ढंग से काटती-घोंटती दिखाई पड़ रही है। अभी राष्ट्रीय दलदल पार्टी के प्रवक्ता ने टीवी पर बैठकर सरेआम प्रजातंत्र का गला घोंट दिया, तो राष्ट्रीय गिरगिट दल ने थोड़ी देर पहले ही प्रजातंत्र का गला अपने निजी विचारों की तलवार से काटकर तार-तार कर दिया था। प्रजातंत्र में कई तरह के कानून होते हैं। विविध कानूनों का शानदार गुलदस्ता! एक वह कानून जिसे सिर्फ राजनीतिज्ञ ही मानते हैं। एक वह कानून जिसे सिर्फ नौकरशाह ही तानते हैं। एक वह कानून जिसे सिर्फ धर्म विशेष के लोग ही जानते हैं। एक वह कानून जिसे केवल न्यायविद ही तानते हैं। एक वह कानून जिसे केवल पुलिस वाले पहचानते हैं। इस तरह से कानूनों के बीच कई तरह के कानून कुल-बुला रहे हैं। इन्हीं अलग-अलग कानूनों के तहत प्रजातंत्र का गला विचित्र तरीके से घुटता जा रहा है। प्रजातंत्र वास्तव में मरजा तंत्र दिखाई पड़ रहा है। कोरोना काल में तो अपने-अपने ढंग के अपने प्रकार के विचित्र कानूनों का चलन है।
अगर मुर्दा बड़ा राजनीतिज्ञ था अथवा बड़ा धर्मराज या कोई बड़ा खजूर टाइप हुआ तो वह धारा 144 के बीच अच्छी-खासी शव बारात जुटाने में कामयाब होता है। अगर मुर्दा पीपल वाली गली के श्मशान घाट की तीसरी गली से पांचवे नंबर की सातवीं झुग्गी में रहता हो तो उसे सरकारी मेले में भी उठाने वाला कोई जंतु नहीं मिलेगा। अपने-अपने मुर्दों के अपने-अपने भाग्य! जैसा मुर्दा वैसा कानून! भाग्यवान मुर्दे ही कायदे से भीड़ जमा कर पाते हैं और वह जाते-जाते भी प्रजातंत्र का गला घोंटने में अपनी बहादुरी दिखा जाते हैं। अगर कोई बंदा लब्ध प्रतिष्ठित धर्मबाज, सियासत दान या ग्रेट बिजनेसमैन हुआ तो वह लाश बनने के लिए बड़े अस्पताल में भर्ती होता है। वही पीपल वाली गली वाला शव सरकारी अस्पताल में जमा होकर सीधे गंगा माता की यात्रा करते हुए किसी अन्य टाइप के प्रदेश में जाकर इधर-उधर कीचड़ में धंस जाता है। उसकी समुद्र से मिलने की इच्छा भी अधूरी रह जाती है। अपने-अपने प्रजातंत्र के अपने-अपने खटके हैं। इधर प्रजातंत्र के गले काटने वाले, उसके गले को घोंटने वाले कई दलाल, चमचे, नेता आदि जंतु एंजॉय-मुखी हैं। कभी पक्ष तो कभी विपक्ष। कभी संसद तो कभी सड़क। कभी नेता तो कभी चमचा। कभी अफसर तो कभी चपरासी। कभी कुम्हारिया तो कभी दिल्ली। कभी रामलाल तो कभी रहीम बक्स। कभी कचोरी तो कभी दही बड़ा। हर कोई अपने ढंग से प्रजातंत्र का गला काटने-घोंटने के लिए तत्पर हुआ जा रहा है। बागों में, बहारों में! गलियों में चौबारों में! प्रजातंत्र का गला काटने-घोंटने की प्रतियोगिता सी हुई जा रही है।

 

रामविलास जांगिड़

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