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मुर्दे का टोकन 

“अरे सर, यह तो मर गया।”
“कैसे?’
‘हार्ट प्रोब्लम थी।’
‘ठीक है,कोरोना की फाइल में नाम डाल दो इसका।’
‘यह तो गलत है सर!’
‘अरे! यार तुम नहीं समझोगे। लाखों रुपया सरकारी आ रहा है, कोरोना के लिए, हम भी तो कुछ कमाएंगे ?’
‘पर’
‘पर-वर कुछ नहीं तुम ज्यादा टेंशन न लो। यह तो मर ही गया। इसके मरने के बाद अगर हमने थोड़ी कमाई कर ली, तो कौन सा गुनाह कर दिया।’
‘ओके सर!’
‘हाँ इसकी दोनाें किडनियाँ भी निकाल लेना। बहुत दिनों  से कुछ किडनियाँ लेने वाले हमारे पीछे पड़े हैं। कई कस्टमर तो किडनियों के लिए लाखों देने को हमेशा तैयार खड़े हैं।
‘अगर यह बात इसके परिवार वाले जान गये तो।’
‘कोरोना वाली लाश कौन ले जायेगा? हमें ही सफाई वालों से, समाज सेवियो से फुंकवाना पड़ेगा। यार तुम भी बच्चों जैसी बातें करते हो। बाई द वे अगर इसके घर-परिवार वाले ले भी गये, तो कौन उसकी बॉडी खोलकर चेक करेगा। फौरन फूंक-ताप कर चले आयेंगे। आजकल तो श्मशान घाट पर इतनी भीड़ है कि मुर्दों को घंटों लाइन में लगकर टोकन लेना पड़ रहा है। कई बार तो परेशान मातपुरसी वाले अपने सगे-संबंधियों की लाश को लावारिस छोड़ कर चले आ रहें हैं।.. खबरें भी पढ़ा करो भाई।
‘जी सर,”
“कोई आक्सीजन की कालाबाजारी कर रहा है, कोई दवाई की। तमाम नेता-अधिकारी आपदा में अवसर खोज कर खूब कमाई कर रहे हैं, हम भी अपनी डाक्टरी की पढ़ाई में लाखों खर्च करके यहां आएं हैं, अपनी जान जोखिम में डाल रहें हैं, अगर ऐसे में मुर्दों से कुछ कमाई कर रहे हैं, तो कौन सा बेजा काम कर रहे हैं तुम्हीं बताओ।’
‘जी सर, मैंने इसके नाम के आगे कोरोना की फर्जी रिपोर्ट फाइल में अटैच कर दी है।’
“ठीक है, अब आगे का काम शुरू करो। बेचारा बहुत गरीब था, पर मरने के बाद हमें थोड़ा मालामाल कर गया। भगवान इसकी आत्मा को शांति दे।”
 सुरेश सौरभ
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