न्यूज के लिए सबकुछ, न्यूज सबकुछ
ब्रेकिंग न्यूज़

देश के शाहीन बागों से मिथक तोड़ती मुस्लिम महिलाएं

महिलाएं आज देश मे राजनीति का व्याकरण लिख रही और समिकरण भी तय कर रही हैं।देश के शाहीनबागों ने इस मे मुस्लिम महिलाओं की भी भागेदारी तय कर दी है।प्रशासन की चेतावनी,आंसू गैस और मुक़दमे के बाद भी इन महिलाओं का विरोध प्रदर्शन पिछले एक महीने से जारी है।केन्द्र सरकार के कानून एनआरसी और भवीष्य के सीएए कानून के खिलाफ दिल्ली से शुरू हुआ ये आंदोलन आज देश के कई छोटे बड़े शहरों तक पहुंच गया है।इलाहाबाद का रोशनबाग,पटना का सब्जीबाग,कानपुर का मोहम्मद अली पार्क,लखनउू का घंटाघर,कोलकाता के पार्क सर्कस ,शांतिबाग गया,अम्बेडकर पार्क सिवान,इकबाल मैदान भोपाल,आराम पार्क खुरेंजी,नज़रूलबाग आसनसोल,मैंगलौर,बरैली और राजस्थान के कोटा जैसे कई अन्य शहरों मे मुस्लिम महिलाएं हाथों मे तिरंगा और माथे पर भी तिरंगा पट्टी बांध कर कड़ाके की ठण्ड और सर्द हवाओं को पछाड़ कर तम्बू ताने बैठी हैं।उनमे जोश है,हिम्मत है,लड़ने की ताकत है और कुछ कर गुजरने की तम्न्ना भी है।भारत माता की जय और कहीं-कहीं वंदेमातरम की सदा भी गूंजती है।ये पार्क सांस्कृतिक बिंदु के दृढ़ निश्चय बन गये हैं।दरअसल ये बदली तस्वीर है उस समाज की जिसमे दशकों से दाढ़ी-टोपी वालों की जमात बेतुके फतवे दे कर महिलाओं की आवाज को दबाते रहें हैं।इस बात मे कोई शक नही कि आजादी के बाद भारतीय इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं प्रदर्शन के लिए सड़कों पर निकली हैं।अगर हम खुद से सवाल पूछें कि अब से पहले हमने कब इतनी सारी खासकर मुस्लिम महिलाओं को राजनीतिक प्रतिरोध के मैदान में एक साथ उतरते देखा है?जवाब पक्का न मे ही मिलेगा क्यों कि भारत में हुए ऐसे किसी आंदोलन की याद नही आती जिसमें महिलाओं की नेतृत्वकारी छवि प्रमुखता से उभरी हो।देश मे पिछले एक माह की तस्वीरें बयां कर रही हैं कि हमारी राजनीतिक संस्कृति में कोई चीज बदल रही है। ये महिलाएं ख़ुद इन प्रदर्शनों का नेतृत्व भी कर रही हैं,खुद वक्ता बन कर धरने को सम्बोधित भी कर रही हैं। यही नही नारा लगाने का हुनर भी इन महिलाओं के पास है,ऐसा लगता नही कि ये महिलाएं पहली बार अपने घर की दहलीज से बाहर निकली हैं।मुस्लिम महिलाओं की सार्वजनिक हिस्सेदारी प्रतिरोध के आंदोलन का खास पहलू है।जो बुर्के़ और हिजाब के साथ विरोध की आवाज़ में अपनी अलग पहचान बना रही हैं।दिल्ली के निम्न आय वर्ग और मुस्लिम बहुलता वाले शाहीन बाग़ की महिलाएं विरोध का नया चेहरा बनकर उभरी हैं।इस इलाके की पहचान अभी तक लजीज खाने और सस्ते कपड़े के लिए थी।लेकिन अब आती है हर सदा यही शाहीनबाग से जलने न देगें घर कोई घर के चिराग से। सोशल मीडिया कवरेज के कारण एक आंदोलन हर जगह दूसरा आंदोलन खड़ा करने की प्रेरणा देता है।यानी देश मे अब कई शाहीनबाग तैयार हो गये हैं।देश के दर्जनों शाहीनबाग से आवाज आ रही है कि तिरंगा लिए हाथ मे बन गई अब मै क्रांतिकारी हूं ,रूक रूक चल रही अभी ना मै हारी हूं ,हां मै शाहीनबाग की नारी हूं। बुर्का और हिजाब में मुस्लिम महिलाओं को अब मुस्लिम कहलाने में ना तो डर है और ना ही अपने पर्दानशी होने मे कोई हिचक है।बातचीत मे अधिकाशं मुस्लिम महिलाएं कहती है कि हिजाब उनकी अपनी पसंद का हिस्सा है,इसके लिए किसी का दबाव नही है।एक कोचिंग संस्थान मे मैनेजर के पद पर कार्यरत शाइस्ता कहती हैं कि इसे पुरूषवादी समाज के खिलाफ आक्रोश नही माना जाना चाहिए।वह कहती हैं कि दरअसल आज कल मुस्लिम महिलाएं आधुनिक शिक्षा की ओर रूख कर रही हैं ।फिर सोशल मीडिया और बदलते जमाने की जागरूकता ने मिलकर मुस्लिम महिलाओं में राजनीतिक तौर पर जागरूक तबके को जन्म दिया है।अलीगढ़ की तूबा कहती है कि सारे आंकड़े तो मै नही जानती लेकिन एमयू मे स्नातक से पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों में छात्राओं की संख्या करीब 20 फीसद अधिक होती है ,जो इस बात की दलील है कि मुस्लिम महिलाएं अब पढ़ कर काबिल बनना चाहती हैं।भारतीय समाज मे मुस्लिम औरतों की जो तस्वीर अब तक दिखती रही है।वह गरीबी की मारी अशिक्षित,पुरूषों के तानों से सिसकती हुयी,अभाव मे सिमटी हुयी एक बेजुबान औरत की थी।इस तस्वीर को पूरी तरह से इंकार भी नही किया जा सकता है।क्यों कि आप किसी भी मुस्लिम आबादी मे चले जाएं तो वहां तंग गलियां,घनी आबादी के बीच कभी दरवाजे के बाहर या दहलीज के भीतर मुस्लिम औरतें बीड़ी बनाती,कशीदाकारी और दस्तकारी करती आसानी से मिल जायेगी।मानो घर का आंगन और दहलीज तक ही उसकी जिंदगी सिमटी हो।लेकिन शाहीनबाग ने मुस्लिम महिलाओं की तस्वीर का दूसरा रूप भी दिखा दिया।शाहीनबाग के नाम के अनूरूप वह उस सफेद बाज की तरह दिखी जो बहुत दूर तक देखता और उूचां उड़ता है।हिजाब पहने ये महिलाएं मुट्ठी भींच कर कभी पुलिस को ललकारती दिखी तो कभी सड़कों पर इंकेलाब जिंदाबाद के नारे लगाती दिखीं।ये कुशल वक्ता भी नजर आयी और हिम्मत के साथ घर से दूर चौबीस घंटे सत्याग्रह करती भी नजर आयीं।लेकिन एक महीने पहले शायद ही किसी ने उनसे इस तरह की उम्मीद की होगी। आधुनिक भारत के इतिहास में विरोध प्रदर्शन की शुरुआत शायद स्वतंत्रता आंदोलन में हुई।1857 में हुई क्रांति से पहली बार राष्ट्र की परिकल्पना हुई फिर गांधी का सत्याग्रह आया जो विरोध प्रदर्शनों का एक मॉडल बन गया है।देश मे महिलाओं के आंदोलन का लम्बा इतिहास है और मुस्लिम महिलाओं की इसमे हिस्सेदारी का भरपूर जिक्र मिलता है।दस्तावेज और देश मे आंदोलनों के इतिहास पर शोध करने वालों के मुताबिक आंदोलनों मे ज्यादा मुस्लिम औरतों की हिस्सेदारी पश्चिमी उत्तर प्रदेश से रही, जहां आज भी उत्तर प्रदेश की लगभग 40 प्रतिशत मुस्लिम आबादी रहती है। आबादी के अलावा उसकी सबसे बड़ी वजह दिल्ली से इलाके की नजदीकी भी है।आज भी मेरठ में हबीबा, जो जाति से गुर्जर मुस्लिम थीं, का नाम गौरव के साथ लिया जाता है।हबीबा को 1857 मे फांसी पर चढ़ा दिया गया था और जमीला नाम की बहादुर पठान को जिंदा पकड़ लिया गया और बाद में फांसी पर चढ़ा दिया गया।इसके अलावा मौलवी लियाकत की बेटी हाजिरा बेगम का नाम बहुत अहम है।ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक हाजिरा बेगम रोटियां बना कर घर-घर भेजकर आंदोलनकारियों को इकट्ठा करती थी। अंग्रेज इतिहासकार क्रिस्टोफर हिबर्ट ने भी मुस्लिम महिलाओं के आंदोलन खास कर 1857 के दौर मे हिस्सेदारी पर लिखा है।उस जंगे-आज़ादी में कानपुर की हर दिल अज़ीज़ नृत्यांगना अज़ीज़न बाई सारे ऐशो-आराम त्याग कर देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से छुड़ाने के लिए मैदान में कूद पड़ीं थी।उन्होंने महिलाओं के समूह बनाए, जो मर्दाना वेश में रहती थीं।वे सभी घोड़ों पर सवार होकर और हाथ में तलवार लेकर नौजवानों को जंगे-आज़ादी में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करती थीं। अवध के नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हज़रत महल ने हिंदू-मुस्लिम एकता को मज़बूत करने के लिए उत्कृष्ट कार्य किए।महिला आंदोलन के इतिहास में अस्सी का दौर हमेशा एक स्वर्ण काल के रूप में याद किया जाता है।सन 90 के बाद के जटिल समय में उसी विरासत को थामने वाले हाथों ने देश भर में जनतांत्रिक वातावरण की मशाल को जलाए रखने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है।जम्मू कश्मीर जैसे इलाके मे मुस्लिम महिलाओं के घर की दहलीज के बाहर बहादुरी के किस्से मशहूर हैं।कुलाली-हिलकाक इलाक़े की मुनिरा बेगम ने आतंकवादियों का मुक़ाबला करने के लिए बंदूक़ उठा ली थी।उन्हीं के नक्शे-क़दम पर चलते हुए सूरनकोट के गांव की अन्य महिलाओं ने भी हथियार उठाकर आतंकवादियों से अपने परिजनों की रक्षा करने का संकल्प लिया था।बाद मे जम्मू-कश्मीर के राजौरी ज़िले के कालसी गांव की रुख़साना क़ौसर ने आतंकवादियों को मार कर यह संदेश दिया कि देश में वीरांगनाओं की कोई कमी नहीं है।एक पुराना आंकड़ा यह ख़ुशनुमा अहसास कराता है कि पिछले कुछ बरसों में स्कूलों में दाख़िला लेने वाले मुस्लिम बच्चों, ख़ासकर लड़कियों की तादाद बढ़ रही है।नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ प्राथमिक स्तर यानी पांचवीं तक की कक्षाओं में 1.483 करोड़ मुस्लिम बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।उच्च प्राथमिक कक्षाओं में भी मुस्लिम बच्चों की तादाद में इज़ाफ़ा हुआ है।यह संख्या कुल दाख़िले की 9.13 फ़ीसदी है।क़ाबिले ग़ौर यह भी है कि उच्च प्राथमिक विद्यालय में लड़कियों की संख्या मुस्लिम छात्रों की तादाद की 50.03 फ़ीसदी है, जबकि सभी वर्ग की लड़कियों के उच्च प्राथमिक कक्षा में कुल दाख़िले महज़ 47.58 फ़ीसदी हैं। यह रिपोर्ट देश के राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों के 633 ज़िलों के 12.9 लाख मान्यता प्राप्त स्कूलों से एकत्रित जानकारी पर आधारित है।आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2001 से 2011 के बीच स्नातक स्तर की शिक्षा प्राप्त करने में मुस्लिम महिलाओं की प्रगति हुई है। कुल स्नातक मुस्लिम महिलाओं की संख्या 2001 में 6.58 लाख थी वहीं 2011 में यह बढ़कर 17.42 लाख हो गई।रियल स्टेट के क्षेत्र मे काम कर रही लड़कियां अरशिन सिद्दीकी और जाहिरा शेख कहती हैं कि आज मुस्लिम महिलाएं खुद आगे आ रही हैं।महिलाओं के विरोध प्रदर्शन पर अपनी राय जाहिर करती हुयी कहती हैं कि ये हर भारतीय महिलाओं के स्वाभिमान से जुड़ा मसला है।उनका कहना है कि हमारे पुरखों ने इस देश के लिए कुर्बानी दी है।हम हिंदुस्तानी हैं ,क्यों सबूत दें। मुस्लिम धर्मगुरु महिला शिक्षा पर बहुत अधिक बल नहीं देते क्योंकि शिक्षा प्राप्त व्यक्ति धर्मांधता से बाहर निकल आता है और मौलवी यह नहीं चाहते हैं कि उनकी पकड़ से उनके अनुयायी बाहर आए क्योंकि उनके मानने वालों की जितनी अधिक संख्या होती है वे चुनाव की राजनीति में उतना अधिक मोलतोल करते हैं।जबकि हदीस में भी कहा गया है कि एक मर्द ने पढ़ा तो समझो एक व्यक्ति ने पढ़ा और अगर एक महिला पढ़ी तो समझो एक परिवार, एक ख़ानदान पढ़ा।ये आंकड़े,ये आंदोलन मुस्लिम समाज में बदलाव के प्रतीक हैं। इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि आने वाला वक़्त मुस्लिम महिलाओं के लिए शिक्षा की रौशनी से जगमगाती सुबह लेकर आएगा।एक बार महिलाओं ने घर की चारदीवारी से बाहर कदम रखना सीख लिया तो फिर उन्हें घेर के घेरे में वापस बांध रखना मुमकिन नहीं।एक महीने की इस छोटी सी अवधि में महिलाओं ने सीख लिया है कि पुरुषों की खींची हुई लकीर पर नहीं चलना बल्कि अपना रास्ता खुद अख्तियार करना है।उम्मीद की जानी चाहिए कि हिंदुस्तान के भीतर दो हिंदुस्तानों के बीच की खाई को पाटने का काम भी ये महिलाएं और ये आंदोलन करेगा।

शाहिद नकवी

Print Friendly, PDF & Email
Tags:
Skip to toolbar