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देश विरोधी अराजकता के खिलाफ न्यायपालिका लचर रवैया

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार विरोध-प्रदर्शन के नाम पर प्रदेश में अराजकता का माहौल पैदा करने वालों के साथ सख्ती के साथ पेश आ रही है,यह दिल्ली सहित तमाम राज्यों के लिए मिसाल है। अगर कोई धरना-प्रदर्शन सुनियोजित तरीके से देशद्रोही ताकतों द्वारा चलाया जा रहा हो तो फिर उसे कुचलने के लिए सख्ती करना लाजिमी है। इसी सख्ती का असर है जो यूपी में अराजकता फैलाने वालों के हौसले पस्त पड़े हैं। अलीगढ़ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में समय-समय पर कुछ देशद्रोही ताकतें सिर उठाने की कोशिश करती जरूर हैं,लेकिन पुलिस की सख्ती उनके हौसले कुचलने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ती है। देश की जनता हो या फिर सियासतदार अथवा हमारी अदालतें उनको यह समझना ही होगा कि हम संविधान से बंधे हुए हैं। अगर नागरिक सुरक्षा एक्ट संसद के दोनों सदनों से पारित होकर कानून बन चुका है तो फिर इसको लेकर विवाद बेइमानी है। आश्चर्य कि बात यह है कि आम जनता तो दूर सुप्रीम कोर्ट के विद्वान जज साहब तक जब देशद्रोही गतिविधियों को असहमति का लबादा पहनाने लगे तो समझा जा सकता है कि मोदी विरोध की जड़े कहां तक जमी हुई हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसर सुप्रीम कोर्ट के जज दीपक गुप्ता का सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में यह कहना कि सरकारें हमेशा सही नहीं होती। बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र के खिलाफ है। देश में असहमति को देशद्रोह समझा जा रहा है। जज साहब यहीं नहीं रूके उन्होंने अपनी बात स्पष्ट करते हुए यहां तक कहा कि आज असहमति को देश विरोधी या लोकतंत्र विरोधी समझा जा रहा है। यह संवैधानिक मूल्यों पर चोट है। जज साहब ने यह बात किस संद्रर्भ में कही यह तो वहीं जाने लेकिन उनकी बातों से यही लगता है कि उन्हें न्यायपालिका की खामिया तो नहीं दिखती हैं,लेकिन सरकार को आईना दिखाने से उन्हें परहेज नहीं है।

इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश हो या फिर महाराष्ट्र अथवा देश का कोई हिस्सा जिसमें दिल्ली भी शामिल है,में जगह-जगह चल रहा धरना, लाखों लोगों की नाक में दम किए हुए है उसके यदि खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे हैं तो इसकी एक वजह न्यायपालिका का अति उदार रवैया भी है। न्यायपालिका को यह भूलना नहीं चाहिए कि उसकी जिम्मेदारी सीमित है। वह सिर्फ इस बात पर फैसला ले सकता है कि देश में हर स्तर पर कानून का पालन हो रहा है या नहीं। अगर जहां कानून के खिलाफ कोई काम कर रहा है तो उसके खिलाफ कार्रवाई का उचित आदेश उसके द्वारा दिया जाए। पूरे देश में सीएए के नाम पर जगह-जगह सड़क जाम करके अराजकता का जो माहौल पैदा किया जा रहा है उसने लाखों लोगों की नाक में दम कर रखा है। ऐसे अराजकता वाले आंदोलन अगर अपने पंख फैलाते जा रहे हैं या उसके खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे हैं तो इसकी एक वजह न्यायपालिका का अति उदार रवैया भी है। धरना-प्रदर्शन के नाम पर यदि कुछ सौ लोग किसी मुख्य सड़क को जाम कर दें तो अदालत का पहला कदम यह होना चाहिए कि सड़क खाली हो। यह घोर निराशाजनक है कि दिल्ली की अदालत सड़क जाम करके धरना दे रहे लोगों को सड़क खाली करने के स्पष्ट निर्देश देने से इन्कार कर देती हैं, फिर मामला जब उच्चतम न्यायालय गया तो उसने धरना दे रहे लोगों को समझाने-बुझाने के लिए वार्ताकार नियुक्त कर दिए। ऐसा करके सड़क पर काबिज होकर की जा रही अराजकता को एक तरह से मंजूरी मिल गई। आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट की यह पहल यह परम्परा भी बन सकती है।
यह दुखद ही नहीं चिंताजनक भी है कि कहीं कोई अपनी मांगों को लेकर सड़क या फिर रेल मार्ग पर कब्जा करके बैठ जाएं तो उसके खाली कराने के बजाए सुप्रीम कोर्ट अपने वार्ताकार भेजे। समझना कठिन है कि जब उच्चतम न्यायालय ने यह माना भी और कहा भी कि इस तरह रास्ता रोककर धरना देना अनुचित है तब फिर उसने शाहीन बाग इलाके की नोएडा से दिल्ली को जोड़ने वाली उस सड़क को खाली कराने के आदेश देने की जरूरत क्यों नहीं महसूस की जिससे प्रतिदिन प्रतिदिन लाखों लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो रही थी। मुट्ठी भर लोग सड़क पर कब्जा करके लाखों नागरिकों के धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं औ सुप्रीम कोर्ट तत्काल किसी फैसले पर पहुंचने के बजाय तारीख पर तारीख दे रही है। अगर सुप्रीम कोर्ट इस तथ्य से परिचित नहीं है कि शाहीन बाग की सड़क बंद होने से हर दिन लाखों लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है। आधे-पौने की घंटे की दूरी तीन-चार घंटे में तय करने को मजबूर लाखों लोगों का समय और श्रम और धन तीनो का हाश्र हो रहा है तो क्या ये लाखों लोग दूसरे दर्जे के नागरिक है,जिनको हितों की चिंता सुप्रीम कोर्ट को नहीें है।

हैरत की बात यह भी है कि ऐसे आंदोलनों की वजह एक तो काल्पनिक हैं और दूसरे, इसमें कोई तर्क भी नजर नहीं आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट का यह पता होना चाहिए कि धरना दे रहे लोग चाहते हैं कि मोदी सरकार सीएएध्एनपीए कानून को वापस ले,तभी धरना-प्रदर्शन खत्म होगा। क्या यह घोर अराजक व्यवहार नही हैं? न जाने क्यों सुप्रीम अदालत इन चीजों को अनदेखा कर रही हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान दिल्ली को जिस तरह हिंसा की आग में झोंककर देश की छवि खराब करने की कोशिश की गई। इस बात का अहसास भी सुप्रीम कोर्ट को होना चाहिए।

लब्बोलुआब यह है कि सुप्रीम कोर्ट समाज सेवा की भूमिका नहीं निभाए,उसे कानून की परिभाषा को समझते हुए उसके सामने जो मामले आए उस पर संविधान सम्मत फैसला सुनाएं। मामला जब सरकार के किसी बड़े फैसले की संवैधानिक स्थिति के नाम पर उसके विरोघ से जुड़ा हो तो फिर यह और भी जरूरी हो जाता है सुप्रीम कोर्ट जल्द से जल्द निर्णय सुनाए। अन्यथा उंगली तो उस पर भी उठेंगी।

संजय सक्सेना, लखनऊ

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