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युवा शक्ति देश के लिए वरदान या चुनौती? : – श्री आशुतोष महाराज

“युवा दिवस विशेष!!”
( श्री आशुतोष महाराज जी युवाओं को आध्यात्मिक ज्ञान के साथ सही मार्गदर्शन भी प्रदान कर रहे है )

‘उठो, जागो, साहसी बनो, वीर्यवान बनो। सब उत्तरदायित्व अपने कंधे पर लो। यह याद रखो कि तुम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हो। तुम जो कुछ बल या सहायता चाहो, वह सब तुम्हारे ही भीतर विद्यमान है। सभी के पास जा-जाकर कहो – ‘उठो, जागो और सोओ मत। सारे दुःख और अभाव नष्ट करने की शक्ति तुम्ही में है। इस बात पर दृढ़ता से विश्वास करने से वह शक्ति जाग उठेगी।’ यह संसार कायरों के लिए नहीं है बल्कि शेर जैसा हौसला रखने वाले योद्धाओं के लिए है। इसलिए अपने उत्तरदायित्वों से भागने की कोशिश मत करो। सफलता और असफलता की चिंता मत करो। पूर्ण निष्काम भाव संपन्न होकर कर्तव्य पालन करते चलो। याद रखो कि विजयी वही होता है जो सदैव दृढ़ संकल्प और धैर्य से युक्त रहता है। हे वीरों! बद्धों को पाशमुक्त करने, दरिद्रों के कष्ट कम करने और अज्ञजनों का हृदय अंधकार दूर करने के लिए आगे बढ़ो। पवित्र और परोपकारी बनो क्योंकि यही धर्म का सार है। सच्चा युवा वही है जो अनीति, अत्याचार और अज्ञानता से लड़ता है। जो बुरी आदतों से दूर रहता है। जो काल की चाल को बदल देता है। जिसमें जोश के साथ होश भी है। जिसमें भटकती मानवता के लिए कुछ कर गुजरने की आस्था है। जो समस्याओं का हल निकालता है और प्रेरणादायक इतिहास रचता है। जो बातों का बादशाह नहीं बल्कि कुछ कर गुजरने का जज़्बा रखता है।’
उपर्युक्त कथन बीसवीं सदी के महान संत, समाज सुधारक एवं विचारक स्वामी विवेकानंद जी के हैं। एक महान युवा सन्यासी, समाज सुधारक और विदेशों में भारतीय संस्कृति के सम्मान में चार चाँद लगाने वाले स्वामी विवेकानंद जी का जन्म दिवस 12 जनवरी ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के अनुसार युवा अवस्था वह बिन्दु है जब व्यक्ति असाधारण तल में प्रवेश कर जाता है और सफलता की नई ऊँचाई को छूता है। जर्मन लेखक गेटे ने भी कहा है, ‘दुनिया नौजवानों को इसलिए चाहती है क्योंकि वह होनहार होते हैं। उनमें कुछ कर गुजरने की चाहत होती है। उनमें अपार संभावनाएं होती हैं।’ श्री आशुतोष महाराज जी भी अकसर नौजवानों को समझाते हुए अपने प्रवचनों में कहा करते हैं- ‘युवा होना सिर्फ उम्र की एक अवस्था का नाम नहीं बल्कि यह किसी दीपक की वह अवस्था है जब उससे सब से ज़्यादा प्रकाश की उम्मीद की जाती है। युवा शक्ति ही वह शक्ति है जिसने हर समय में युग निर्माण किया। जिस के योग्य नेतृत्व में सभ्यता, संस्कृति आगे बड़ी। फिर चाहे वह प्रभु श्री राम की वानर सेना हो, अंगद, नल-नील, हनुमान आदि जैसे जज़्बे और गुरु भक्ति से भरपूर नौजवान हों। चाहे देश को आज़ाद करवाने वाले शहीद भगत सिंह, कर्तार सिंह सराभा, उधम सिंह आदि जैसे देश भक्त हों या फिर श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा निर्मित खालसा फौज हो। श्री कृष्ण जी के योग्य नेतृत्व में अधर्मियों का नाश करने वाली पांडव सेना हो या फिर विश्वामित्र जी की आज्ञा अनुसार देश के आततायी राक्षसों का नाश करने वाले युवा श्री राम और लक्ष्मण जी हों।’ भाव हर समय युवा शक्ति ने ही विश्व में नवीन क्षितिज का निर्माण कर देश, कौम, संस्कृति, धर्म आदि की रक्षा की है। ‘नौजवान’ शब्द अपने आप में अथाह ऊर्जा, उत्साह और आंदोलन का प्रतीक है। युवा होने का अर्थ ही है- संचित शक्तियों का भंडार, जिसे गुरु महाराज जी अपनी प्रेरणा और ज्ञान से जाग्रत कर रहे हैं। वह नौजवानों के सामर्थ्य को पहचान कर उसका सार्थक उपयोग कर रहे हैं।
वर्तमान समय में युवा शक्ति को संचित और पोषित करना अत्यंत आवश्यक है। जिसके द्वारा असंभव को भी संभव किया जा सकता है क्योंकि नौजवान वर्ग ही राष्ट्र की उन्नति के आधार हुआ करते हैं। किसी भी राष्ट्र की सबसे अनमोल संपत्ति और ताकत युवा ही होते हैं। इसलिए जनसंख्या के संदर्भ में भारत आज अपनी युवा अवस्था में है। संसार के महान विचारकों ने वर्तमान भारत को सौभाग्यशाली देश कहा क्योंकि भारत की कुल आबादी का लगभग 66 प्रतिशत वर्ग युवा है। जो अन्य देशों के मुकाबले बहुत ज्यादा है। ऐसी परिस्थिति में सबसे अहम सवाल यह उठता है कि देश के लिए युवा शक्ति वरदान है या फिर चुनौती? चुनौती इसलिए की यदि युवा शक्ति भटक जाए तो स्वयं एवं देश का भविष्य नष्ट हो सकता है। इसलिए युवाओं की ऊर्जा का संपूर्ण रूप से सही दिशा में प्रयोग करना इस समय की सबसे बड़ी चुनौती है। जब तक यह ऊर्जा, उत्साह, समर्थता, प्रतिभा सकारात्मक रूप में हैं तब तक किसी भी राष्ट्र का बहुउद्देशीय विकास होता रहता है परन्तु जैसे ही इसका नकारात्मक रूप में प्रयोग होने लगता है यह भयानक रूप धारण कर लेती है।
नौजवानों में स्वामी विवेकानंद जी जैसी आध्यात्मिकता का संचार करने की आवश्यकता है ताकि वह देश को नई उड़ान दे सकें। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि मेरी उम्मीद आधुनिक युवा पीढ़ी से है। इन्हीं में से मेरे कार्यकर्ता आएंगे क्योंकि नौजवानों में ही समाज की बुराइओ और अन्याय से लड़ने की अपार क्षमता है। नौजवानों में अपार संभावना है जिसे भरपूर तरीके से खिलने और बढ़ने का मौका उपलब्ध होना चाहिए। एक अच्छा व्यक्ति बनने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ-साथ आध्यात्मिकता का होना भी अनिवार्य है। सदैव सकारात्मक पहलू देखने की आदत होना भी आदर्श युवा का गुण है। आज का नौजवान इस बात से भी अनभिज्ञ है कि भारतीय संस्कृति आदि काल से ही सम्पूर्ण विश्व को धर्म, कर्म, त्याग, ज्ञान, सदाचार, परोपकार और मनुष्यता की सेवा करना सिखाती आयी है। सद्भावना और एकता का संचार करना ही भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र रहा है। इसका मूल कारण है कि भारतीय दर्शन में आत्म-दर्शन की बात की गई है। इसलिए श्री आशुतोष महाराज जी ने युवाओं को आध्यात्मिक ज्ञान के साथ समय-समय पर योग्य मार्गदर्शन भी प्रदान किया क्योंकि वह युवाओं में उत्साहपूर्ण फौलादी इरादों को देखना चाहते हैं। वह चाहते हैं की नौजवान समाज में फैली चुनौतियों का सामना करने के लिए सदैव तत्पर रहें।
वर्तमान काल में युवा शक्ति का जाग्रत होना बहुत जरूरी है। अतः जाग्रत नौजवानों का फर्ज है कि वह आलस्य को त्याग कर दूसरों के कल्याण के लिए कदम बढ़ाएं। तुम युवा हो, कमजोर नहीं और न ही हीन। तुम कर्म स्वरूप हो, कर्मवीर हो। नौजवानों की समर्थता को बयान करता विवेकानंद जी का कथन है कि युवा वह है जो सदा क्रियाशील रहता है। जिसके अंदर सिंह जैसा साहस है। जिसकी दृष्टि सदा अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहती है। जो इस संसार में कुछ अलग करना चाहता है। जो किस्मत के सहारे न बैठ कर हिम्मत और जज़्बे के साथ अपने कर्तव्यों के प्रति चेतन रहता है। ऐसा नौजवान फिर कभी परिस्थितियों का दास नहीं बनता बल्कि परिस्थितियाँ उसकी गुलाम बन जाती हैं। गुरु महाराज जी के आशीर्वाद से आज हमें भी समाज की सेवा करने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ है। यदि आज युवा शक्ति पूर्ण बल, बुद्धि और निःस्वार्थ भाव से विश्व शांति के लक्ष्य में लग जाए तो निश्चित ही संसार की काया पलट हो सकती है। यह दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की मासिक पत्रिका “अखंड ज्ञान” से उद्ग्रित लेख है!

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