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भारतीय राजनीति में डॉ. अंबेडकर की प्रासंगिकता 

“रुतबा मेरे सर को तेरे संविधान से मिला है
ये सम्मान भी मुझे तेरे संविधान से मिला है
औरो को जो मिला है वो मुकदर से मिला है
हमें तो मुकदर भी तेरे संविधान से मिला है।”
 मानव जाति के इतिहास में कभी कोई ऐसा युग नहीं गुजरा, जब किसी ने अपने तर्क, कर्म एवं बुद्धि के बल पर तत्कालीन रूढ़िवादी मान्यताओं, जातीय भेदभाव एवं ऊंच-नीच की धारणाओं पर कड़ा प्रहार न किया हो। मनुष्य सदैव सत्य की तलाश में निरन्तर प्रयासरत रहा है और उनको नेतृत्व देने के लिये डॉ. आम्बेडकर जैसे व्यक्तित्व भी प्रकट होते रहे हैं। अम्बेडकर ने अपने सामाजिक , राजनीतिक , नैतिक मुद्दों पर खुल के विचार रखें हैं। “मनुष्य नश्वर है, उसी तरह विचार भी नश्वर हैं। एक विचार को प्रचार-प्रसार की जरूरत होती है, जैसे कि एक पौधे को पानी की, नहीं तो दोनों मुरझाकर मर जाते हैं।” अम्बेडकर का यह कथन उनकी महानता को  नई ऊँचाई दे रहा हैं। उनके व्यक्तित्व की तरह उनके विचार भी महान रहे है और आज भी पूरी दुनियां उनपर नाज़ करती है।
एक समय की बात है। जिस वक्त नेहरू प्रधानमंत्री थे, उनकी कैबिनेट में भीम राव अम्बेडकर कानून मंत्री बने। एक दिन किसी काम से नेहरू ने  अम्बेडकर को अपने आवास पर बुलाया। बातों-बातों में नेहरू ने अम्बेडकर से कहा- ”अम्बेडकर जी, राजनीति खेल है और हमलोग इसके खिलाड़ी है।” इसके जवाब में अम्बेडकर जी ने कहा- ”नहीं, राजनीति आपके लिए खेल है , लेकिन मेरे लिए राजनीति मेरा लक्ष्य है।”  अम्बेडकर ने सहजता से अपनी बात को समझाते हुए कहा कि राजनीति समाज और देश को बदलने की बड़ी कुंजी है।  देश तभी आगे बढ़ेगा जब समाज एक होगा। समाज को एक करने का हमें प्रयास करना होगा। इसके बाद नेहरू जी उठकर कमरे से बाहर चले गए। आज के दौर में राजनीति ठीक वैसे ही चली है जैसे नेहरू ने कहा था। अगर अम्बेडकर के कथन के अनुसार समाज सेवा हुआ होता , तो आज  धर्म और जाति के नाम पर देश जलता नहीं बल्कि विकास के पथ पर जा कर फल – फूल रहा होता।  वास्तव में देखा जाए तो अम्बेडकर के ही शब्दों में – “राजनीतिक अत्याचार सामाजिक अत्याचार की तुलना में कुछ भी नहीं है और एक सुधारक जो समाज को खारिज कर देता है वो सरकार को खारिज कर देने वाले राजनीतिज्ञ से ज्यादा साहसी है।”
समाज सेवा बनाम राजनीति हमेशा से ही डिबेट का मुद्दा रहा है। समाज सेवा के नाम पर राजनीति करने का पुराना चलन है। सामाजिक व धार्मिक संगठन को राजनीति की पहली सीढ़ी पर करार दिया हुआ है।  आज राजनीति का अर्थ  सत्ता में अपने आप को अपनी क्षमताओं से अधिक ऊंचे स्थान पर फिट करने के लिये प्रयत्नशील रहना व ऐसा होने में अवरोध बनने वालों का विरोध करना हो गया है। जिस दल के कार्यकर्ता सत्ता के लाभों के अभ्यस्त हो जाते हैं वे सत्ता चली जाने के बाद लुंजपुंज हो जाते हैं ,  जबकि लोगों को उनके विधिसम्मत अधिकार दिलवाने के लिये संघर्ष करने का यह सर्वोत्तम अवसर होता है। भाषणों में देश के लिये खून की एक –  एक बूंद देने का दावा करने वाले यदि राष्ट्रीय त्योहारों पर रक्त दान की परंपरा ही डालें तो इस देश के किसी अस्पताल को कभी रक्त की कमी न पड़े और प्रतिवर्ष हजारों जानें बच सकें। सच कहा जाए तो राजनीति  ने अब समाज सेवा से बहुत दूरी बना ली है।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर भारत के आधुनिक निर्माताओं में से एक माने जाते हैं। उनके विचार व सिद्धांत भारतीय राजनीति के लिए हमेशा से प्रासंगिक रहे हैं। दरअसल वे एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था के हिमायती थे, जिसमें राज्य सभी को समान राजनीतिक अवसर दिया जाए तथा धर्म, जाति, रंग व लिंग आदि के आधार पर भेदभाव न किया जाए। उनका यह राजनीतिक दर्शन व्यक्ति और समाज के परस्पर संबंधों पर बल देता है। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि जब तक आर्थिक और सामाजिक विषमता समाप्त नहीं होगी, तब तक जनतंत्र की स्थापना अपने वास्तविक स्वरूप को ग्रहण नहीं कर सकेगी। दरअसल सामाजिक चेतना के अभाव में जनतंत्र आत्मविहीन हो जाता है। ऐसे में जब तक सामाजिक जनतंत्र स्थापित नहीं होता है, तब तक सामाजिक चेतना का विकास भी संभव नहीं हो पाता है।
अम्बेडकर ने राजनीति में या किसी पार्टी में किसी एक व्यक्ति को ही नायक मान कर उसकी पूजा करना और उसे ही सर्वेसर्वा मान लेने के सिद्धांत को भी बेहतर नहीं माना और उसे देश के विकास के लिए घातक मानते थे। उनका मानना था – असीमित प्रशंसा के रूप में नायक पूजा एक बात है।  नायक की आज्ञा मानना एक बिलकुल अलग तरह की नायक पूजा है। पहली में कोई बुराई नहीं है परन्तु दूसरी बहुत घातक है । पहली प्रकार की नायक पूजा व्यक्ति की बुद्धि और कार्य स्वतंत्रता का हनन नहीं करती है । दूसरी व्यक्ति को पक्का मूर्ख बना देती है ।पहली से देश का कोई नुक्सान नहीं होता है। दूसरी प्रकार की नायक पूजा तो देश के लिए पक्का खतरा है। यदि आप शुरू में ही नायक पूजा के विचार पर रोक नहीं लगायेंगे तो आप बर्बाद हो जायेंगे । किसी व्यक्ति को देवता बना कर आप अपनी सुरक्षा और मुक्ति के लिए एक व्यक्ति में विश्वास करने लगते हैं जिसका नतीजा होता है कि आप निर्भर रहने तथा अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन रहने की आदत बना लेते हैं । यदि आप इन विचारों के शिकार हो जायेंगे तो राष्ट्रीय जीवन में आप लकड़ी के लट्ठे की तरह हो जायेंगे। आप का संघर्ष समाप्त हो जायेगा ।
  उनको लोकतंत्र पर पूरा भरोसा था। उनका मानना था कि जो तानाशाही त्वरित परिणाम दे सकती है वह सरकार का मान्य रूप नहीं हो सकती है। लोकतंत्र श्रेष्ठ है क्योंकि यह स्वतंत्रता में अभिवृद्धि करता है। उन्होंने लोकतंत्र के संसदीय स्वरूप का समर्थन किया, जो कि अन्य देशों के मार्गदर्शकों के साथ संरेखित होता है। उन्होंने ‘लोकतंत्र को जीवन पद्धति’ के रूप में महत्त्व दिया, अर्थात् लोकतंत्र का महत्त्व केवल राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि व्यक्तिगत, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में भी है। उन्होंने कहा था – “आप के नेता बहुत योग्य होने चाहिए। आप के नेताओं का साहस और बौद्धिकता किसी भी पार्टी के सर्वोच्च नेता की टक्कर की होनी चाहिए। ” उनके विचारों के इतर आज हम देखते है कि सभी राजनीतिक पार्टियों में किसी न किसी एक व्यक्ति का ही वर्चस्व है और उन्हीं के इर्द गिर्द पार्टी घूमती है और जब यह पार्टी सत्ता में आती है तो फिर उस एक व्यक्ति के इशारे पर ही पूरी सरकार नाचती है।  ऐसी एकत्रित शक्तियों से उतपन्न समस्याओं को ही अम्बेडकर देश के लिए बीमारी मानते हैं जो कि देश को दीमक की तरह खोखला करते जा रहा हैं।  वे कहते है- “कानून और व्यवस्था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़े तो दवा  जरूर दी जानी चाहिए।”
 इतिहासकार आर.सी. गुहा के अनुसार, डॉ. बी.आर. अंबेडकर अधिकांश विपरीत परिस्थितियों में भी सफलता का अनूठा उदाहरण हैं। आज भारत जातिवाद, सांप्रदायिकता, अलगाववाद, लैंगिक असमानता आदि जैसी कई सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। हमें अपने भीतर अंबेडकर की भावना को खोजने की ज़रूरत है, ताकि हम इन चुनौतियों से खुद को बाहर निकाल सकें।
एक कवि ने कहा है- 
“देश प्रेम में जिसने आराम को ठुकराया था
गिरे हुए इंसान को स्वाभिमान सिखाया था
जिसने हमको मुश्किलों से लड़ना सिखाया था
इस आसमां में वह दीपक बाबा साहेब कहलाया था।’
  नृपेन्द्र अभिषेक नृप
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