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खाली कमरा

मेरे निविड विपिन के
तिमिर से
जब
मैं हो जाती हूं
भयभीत, पराभूत

तब तुम्हारे
स्वप्नमयी, चिरअभिलाषित
असंख्य खिड़कियों वाले
कमरे के
बंद दरवाजे पर
खटखटाती हूं
धीरे धीरे से
जोर जोर से

हिमशिखरों से पिघले
लावों को
समेटते
मेरे नयनदीप
बंद खिड़की की
झिर्रियों से
एक खिड़की से दूसरी खिड़की
बदहवास
निर्निमेष
ढूंढते हैं
तुमको

तुम्हारे खाली कमरे का सन्नाटा
मेरे रक्त की शिराओं में
समा जाता है
और निस्सीम खालीपन
प्राणों में भरकर
लौट आती हूं मैं
अपने घुप्प अंधेरों में
चुपचाप।

 

मीनू मदान

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