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समाज के बहुपक्षीय आयामों में बराबर हो स्त्री की सहभागिता

स्त्री आधी आबादी है और प्रकृति की बराबरी की साझीदार भी पर स्त्री स्वयं वर्तमान शिक्षा के दायरे को पर्याप्त न समझ पाने के कारण  समावेशी विकास नही कर पा रही है। रेशमा खान ‘वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी’ का मानना है कि नारी के दिव्य रूप की परिकल्पना भारत में ही की जा सकती है और माना जाता है की भारतवर्ष में नारी घर संसार के अलावा व्यवसाय पटल पर भी अपनी एक भूमिका रखती है स्त्री वह शक्ति है जो पूरे समाज को एक दिशा प्रदान करती है साथ ही अपने प्रगतिशील विचारों के साथ सामाजिक उन्नयन का कार्य भी करती है शायद इसी संदर्भ में सनातन संस्कृति में स्त्री को नवदुर्गा का अवतार कहा गया है।
लेकिन जहां गार्गी मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं को पर्याप्त खुला मंच था वैसे ही महिलाओं के लिए व्यवहार में भी एक खुला मंच बनाने का प्रयास करना होगा। क्योंकि जब तक सैद्धांतिक और व्यवहारिक रूप से मानक प्रतिमान एक न होंगे तब तक विकास का संतुलन भी डांवाडोल होगा। आज भी महिलाओं के लिए दायरे बुने जाते हैं पर पुरूष को खुले रहने की इजाजत है पर आवश्यकता है आज समावेशी शिक्षा के संतुलित परिवेश की।
रेशमा खान जिनका जन्म 26 अक्टूबर 1965 में कोटा के लाडपुरा नामक स्थान में हुआ तब ये चार भाई बहन में सबसे छोटी संतान थी और इनके पापा श्री सलीम जी शेरवानी भारतीय सूचना मंत्रालय में क्षेत्रीय प्रचार अधिकारी और मम्मी शाहजहां शेरवानी जिन्होंने अपनी इस प्रतिभावान बेटी को शिक्षा के सभी दायरों में उन्मुक्त रखा तो आज रेशमा जी उदाहरण देती है अपने माता-पिता का कि वे उस युग में भी परिवेशित शिक्षा का वातावरण बनाएं रखा और लैंगिक विषमता का आभास भी नहीं होने दिया। शायद इसलिए इनके भाई भी अनीस शेरवानी भाई आकाशवाणी कार्यक्रम अधिकारी, इनकी बहन अंग्रेजी प्रवक्ता, दुसरी बहन सामाजिक विश्लेषक है जो स्वयं सिद्ध है कि परिवार मे समावेशी शिक्षा का वातावरण रहा जो आज के प्रसंग में एक आदर्श उदाहरण है।
रेशमा की प्रारंभिक शिक्षा कश्मीर में हुई और चौथी क्लास से बीएससी तक सोफिया एजुकेशन से इन्होंने शिक्षा प्राप्त की तत्पश्चात इन्होंने  अंग्रेजी साहित्य, इतिहास और पत्रकारिता में भी स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की। रेशमा जी के जीवन में महिलाओं की राजनीतिक व प्रशासनिक सजगता के प्रति कार्य करने का रूझान भी अपने आप में विशेष प्रसंग रखता है। एक बार कालेज से निकलने के दरमियाँ इन्होंने इंदिरा गांधी को प्रत्यक्ष देखा तब इन्होंने महसूस किया कि इनकी राजनीतिक प्रशासनिक समझ इनकी ताकत है तो हर महिला अगर अपनी समझ और जानकारी विकसित कर ले तो शायद वे भी अबला नहीं कहलाएगी, उन्हे भी सबला माना जाएगा पर इंदिरा गांधी की असामयिक मृत्यु ने फिर एक झिझक पैदा कर दी कि महिलाओं को सशक्त दिखना और होने मे अंतर है। इंदिरा गांधी का यूं चले जाना इनके कोमल मन को आहत कर गया पर धीरे-धीरे मन में आई विसंगति भी तब दूर हो गई जब इन्होने दुनिया की दूसरी दबंग नेता को अपना आदर्श माना। बड़ी सी बिंदी माथे पर सजाए सुषमा स्वराज जी ने इन्हे काफी प्रेरणा दी कि वे एक एक महिलाओं को सशक्त करके बहुत बड़ा योगदान तो नहीं दे पाएंगी पर जिस भी महिला को सशक्त करेंगी उनके पूरी परिवार मे एक सुखद परिवर्तन आएगा और एक दिन एक एक ग्यारह की तर्ज पर परिवर्तन की बयार भी आएगी। इस जज्बे को शर्मिला खत्री प्रसार भारती अधिकारी दिल्ली ने भी प्रखर बनाया और जीवन के कटु अनुभव को भी ताकत के रूप में लेने का सबक भी सहेली से मिला।
शायद इसलिए शिक्षा लेने के दरमियाँ ये महिलाओं के उन्नायक कार्य हेतु प्रयासरत रही। इसी दौरान इनकी शादी 1992 श्री उमरदीन खान से हुई जो स्वयं सम्मानित भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी है जो कि सवाई माधोपुर चौथ के बरवाड़ा से है। इन्होंने भी रेशमा जी को प्रोत्साहित किया कि वे अपने आकाशवाणी के सेवा कार्य में भी महिलाओं की सहभागिता सुनिश्चित करके महिलाओं को नया आसमान देने की कोशिश करे और ईश्वरीय संयोग इनकी दो बेटियां शमायला और शैजां भी माँ की मुहिम में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहयोगी रही।
फरवरी 1988 से आकाशवाणी मे कार्यरत होने के पश्चात  आकाशवाणी के माध्यम से हजारों लोगों को शिक्षा से जोड़ने का कार्य किया है। आज भी कोशिश रहती है कि महिलाओं को राजनीति व प्रशासन की सजगता के लिए जोड़ा जाए ताकि भारतवर्ष को लैंगिक विषमता को दूर किया जा सके वाकई प्रकृति के दो सोपान को समान आधार बिंदु दिया जा सके।
डॉ. भावना शर्मा
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