National Hindi Daily Newspaper
ब्रेकिंग न्यूज़

हर बच्चा खास है

स्टाफ रूम में बैठे भवानीदास कक्षा की तैयारी कर रहे थे। यह देख उनके साथी अध्यापक मोहन ने उन्हें टोका- “आप हर दिन कक्षा में इतना गला फाड़कर पढ़ाते हैं। इसका कोई फायदा भी है? जो पढ़ने वाला होगा वही पढ़ेगा। बाकियों को पढ़ाने का क्या मतलब? न उन्हें कुछ आता है न जाता है। आप इतनी मेहनत करते ही क्यों हैं? आपकी वजह से हमारा जीना दुश्वार हो गया है। बात-बात में प्रधानाध्यापक आपका नाम ले-लेकर हमारी नाक में दम कर रखे हैं। हम आपके हाथ जोड़ते हैं। बच्चों को जितनी आवश्यकता है उतना ही पढ़ाइए। हद से ज्यादा पढ़ाने के चक्कर में हमारा बोरिया-बिस्तरा गोल मत कीजिए।”
भवानीदास चुप थे। अपने साथी अध्यापक की बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे। फिर एक लंबी सांस लेते हुए कहा – “कभी आपने चींटियों की लाइन देखी है? नहीं न? यदि देखी होती तो आप इस तरह मुझसे खीझकर बातें नहीं करते। चींटियों की वैसे तो कई खूबियाँ हैं। उनमें एक खूबी यह भी है कि वे अनुशासन के साथ कतार में चलने की सीख देती हैं। जो चींटी सबसे आगे होती है, वह पीछे-पीछे चलने वाली चींटियों को रास्ता बताते हुए चलती है। वह बड़ी समझदार, जागरूक तथा बुद्धिमान होती है। मात्र उसे ही मंजिल का पता होता है, सो पीछे वाली चींटियाँ उसका देखा-देखी कर पीछे-पीछे चल पड़ती हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सभी चींटियाँ मेहनत कर रही हैं। किंतु रास्ता केवल एक को पता है। यदि बाकी की चींटियाँ उसका ठीक-ठीक पालन करेंगी तो अगली बार उन्हें किसी के पीछे चलने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।”
साथी अध्यापक ने सारी बातें ध्यान से सुनी। किंतु अपनी खीझ का इन बातों से संबंध जोड़ नहीं पाए। उनके चेहरे पर उभरे प्रश्नचिह्न को देखकर भवानीदास समझ गए। भवानीदास इन बातों का संबंध कक्षा के बच्चों से जोड़ते हुए कहा- “जब मैं पहली बार कक्षा में आया था तब चालीस में से केवल 10 बच्चों को पढ़ना-लिखना आता था। आज यह संख्या बढ़कर 22 हो गयी है। मैंने उन दस बच्चों की शेष बच्चों से तुलना नहीं की। उनके आत्मविश्वास को ठेस नहीं पहुँचाई। बल्कि शेष बच्चों में यह विश्वास दिलाया कि वे भी उन दस बच्चों की तरह बन सकते हैं। इसके लिए मैंने केवल उनका मार्गदर्शन किया है। दुनिया का कोई भी बच्चा कमजोर या फिसड्डी नहीं होता। आवश्यकता है तो उन्हें अवसर देने की। उन पर विश्वास करने की। उनकी विशेषताओं को औजार बनाकर प्रेरित करने की। वे अवश्य आगे बढ़ सकते हैं। मैंने बच्चों को यही सिखाया है कि तुम किसी के पीछे मत ठहरो। तुम जहाँ ठहरो वहीं से नयी लाइन शुरु होनी चाहिए। मैंने मार्गपालक नहीं मार्गदर्शक बनने की सीख दी है।”
साथी अध्यापक, भवानीदास की बातें सुन लज्जित हुआ। सिर झुका लिया। झुके सिर से उन्होंने ‘हर बच्चा खास है’ की सार्वभौमिक सत्यता स्वीकार ली।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar