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पठन पाठन को स्टूडेंट्स फ्रेंडली बनाने की कवायद

पठन पाठन को स्टूडेंट्स फ्रेंडली बनाने के लिए सरकार तरह तरह के प्रयोग करने में जुटी है ताकि स्कूली बच्चों को बेहतर शैक्षिक, सकारात्मक और आनंददायक वातावरण मिल सके। इसी दिशा में राजस्थान में सभी सरकारी स्कूलों में शनिवार को नो बैग डे होगा। इसका मतलब है हर शनिवार को छात्रों को बैग लेकर स्कूल नहीं जाना होगा। यानि इस दिन स्कूल में बच्चे बैग नहीं लाएंगे, बल्कि खेल-खेल में को-करिकुलम एक्टिविटीज से सीधे जुड़ने का मौका मिलेगा। नो बैग डे के पीछे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों पर से पढ़ाई का बोझ कुछ हद तक कम करना है। इस दिन स्कूलों में पढाई नहीं होगी और अभिभावक-अध्यापक मीटिंग के अतिरिक्त साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां, हैप्पीनेस थेरेपी, खेलकूद, व्यक्तित्व विकास, स्काऊट, जीवन मूल्य एवं नैतिक शिक्षा, बाल सभायें तथा भाषा एवं कौशल विकास एवं निरोगी राजस्थान के सूत्रों से संबंधित क्रियायें संपादित करवायी जायेंगी।
एक सच्चाई ये भी है प्राथमिक शिक्षा में बच्चों पर बैग का भारी भरकम बोझ डाल दिया गया है जिसका वजन किसी भी हालत में पांच किलो से कम नहीं है। नन्हें मुन्ने बच्चों को वजनी बैग के साथ स्कूल जाते देखा जा सकता है। सरकार ने कई बार यह भारी बोझ कम करने कवायद की मगर आज तक इसका कोई सर्वमान्य हल नहीं निकला।
इसी भांति हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद एनसीईआरटी ने स्कूलों को एक एडवाइजरी जारी कर कहा था लंच ब्रेक या मिड डे मील दिए जाने के दौरान स्कूलों में बच्चों की उम्र के अनुसार गीत संगीत के कार्यक्रम आयोजित किये जाये। गाने बजाने के ऐसे कार्यक्रम आवश्यकता के अनुसार पढ़ाई के दौरान भी किये जा सकते है। एनसीईआरटी द्वारा विद्यालयों के लिए जारी आर्ट इंटीग्रेटेड लर्निंग दिशानिर्देश में कहा गया कि संगीत से बच्चों की ग्रहणशीलता बेहतर होती है। इससे ठहराव और शांति की भावना भी विकसित होती है। यह कहा जा सकता है इस प्रकार की कवायद के पीछे पठन पाठन को स्टूडेंट्स फ्रेंडली बनाना है ताकि बच्चे एक अनुकूल और सकारात्मक माहौल में अपनी पढाई पूरी करें।
हर माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा जिंदगी में कुछ ऐसा करें जिससे समाज में उसकी अलग पहचान बने और वह धरातलीय सच्चाई को समझे। कई माता-पिता पढ़ाई को लेकर गलत धारणा पाल लेते हैं। उन्हें लगता है कि किताबी ज्ञान ही सब कुछ है और वो बच्चों को दिनभर किताब में ही उलझाये रखना चाहते हैं। विधालयी शिक्षा का हाल भी कोई ज्यादा ठीक नहीं है वहां भी मेकाले के पदचिन्हों का अनुसरण कर किताबी कीड़ा बनाकर बच्चे का दिमागी शोषण किया जा रहा है। घर में माता पिता और स्कूल में अध्यापक डंडा लेकर बच्चों को किताबों में चक्करघिन्नी रखते है। यह समझ में नहीं आता की बच्चा स्कूल जा रहा है जेल। इस चक्कर में कई बार बच्चों को व्यवहारिक ज्ञान ठीक से नहीं मिल पाता, जिसकी जरूरत स्कूल के बाद उन्हें सबसे ज्यादा पड़ती है। शिक्षा प्रणाली एक मशीन हो गई है जो कि क्लोन तैयार करने में लगी हुई है और व्यक्तित्व को पीछे छोड़ दिया है।
आजकल ज्यादात्तर माता-पिता की सोच यह है कि भविष्य में कुछ करना है तो बच्चे का ऊँचे स्तर की शिक्षा प्राप्त करना आवश्यक है क्योंकि इसके बिना अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी और इसीलिए जब बच्चे के थोड़े से भी कम मार्क्स आते है तो वह दुखी हो जाते है। माता-पिता की यह सोच बिल्कुल सही है कि भविष्य में कुछ करना है तो शिक्षा प्राप्त करना अनिवार्य है लेकिन ज्यादातर माता-पिता यही समझते है कि शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान से है और इसलिए उनके हिसाब से बच्चे का किताबी कीड़ा होना अति आवश्यक है। शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान से नहीं है और शिक्षा केवल वह नहीं है जो ज्यादातर भारतीय स्कूलों में पढाया जाता है। शिक्षा का अर्थ ज्ञान एंव उस ज्ञान का हमारे जीवन में उपयोग करने से है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग खुशमय जिंदगी जी सकें और यह ज्ञान किसी भी क्षेत्र में हो सकता है।
बहुत से माता पिता स्कूल भेजकर यह संतोष कर लेते है की उसका बच्चा ज्ञानी ध्यानी बनेगा मगर स्कूल में उसे किताबों से बाहर निकलने की इजाजत नहीं होती है जो बच्चों को जीवन की सच्चाइयों से रूबरू नहीं कराती। आवश्यकता इस बात की है की हमारी शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन हो जिससे वह प्रारंभ से ही व्यावहारिक और जमीनी सच्चाई से अवगत हो।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी .32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 8949519406

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