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उमंग और उत्साह का सावन

सावन मास आस्था, प्रेम, उमंग, और उत्साह से सरोबार होता है।सावन का नाम आते ही तन मन मे उमंग,उत्साह एवं मस्ती छा जाती है।हरीतिमा की चादर भी पृथ्वी इसी महीने में ओढ़ती है। यानी कि पृथ्वी का प्रकृति इसी माह में नयनाभिराम श्रृंगार करती है।जुलाई की तपन देने वाली गर्मी से राहत देने वर्षा का आना, सावन के मौसम को ओर भी सुहावना कर देता है।

बादलों की गड़गड़ाहट,
बिजली की गर्जना, रिमझिम रिमझिम वर्षा की फुहारे, पूर्ववाई का चलना, मोर की पीहू पीहू,कोयल की कु-कु, पक्षियों कलरव से माहौल में मानो प्रकृति संगीत घोल रही हैं।सावन माह महिलाओ के लिए उमंग,उत्साह और प्रेम का प्रतीक होता है।
परम्पराओ के अनुरूप नव विवाहित युवतियां विवाह के बाद आने वाले प्रथम सावन मास में सास ओर बहु एक साथ नही रहते है।इसलिए नव विवाहित युवतियां सावन मास लगने के एक दिन पहले अपने मायके में आजाती है।
नव विवाहित स्त्रियां एवं युवतियां एक समूह के रूप में इकट्ठी होकर उमंग और उत्साह से नाचती गाती है। सावन के लोकगीतों की स्वरलहरियां बिखेरती है। बाग बगीचों में पेड़ की शाखाओं पर झूले डाल कर झूला झूलती हैं। सभी सहेलियां एक-दूसरे को झूला झुलाती है। मौज मस्ती करती हैं और सभी एक-दूसरे को अपने जीवन के संस्मरण सुनकर खुशी का इजहार करती है।
युवतियां मायके में सखी सहेलियों के साथ अपनी बचपन से युवा अवस्था तक की स्मृतियों में खो जाती है।
श्रावण मास में हरियाली तीज,रक्षा बंधन जैसे त्योहार का युवतियों को बेसब्री से इंतजार रहता है।

बदलते परिवेश ने झूलो का स्वरूप बदला
बदलते परिवेश में आधुनिकता ने त्यौहार, उत्सव का स्वरूप बदल गया,लेकिन प्रासंगिकता नही बदली। गांव में अब पेड़ नही रहे, बाग- बगीचे रहे।
उनकी जगह बड़ी- बड़ी बिल्डिंग बन गई।पेड़ नही रहे तो झूले भी कहा डाले।
झूलों की परंपरा वैदिक काल से चल रही है।इस परंपरा के फल स्वरुप आजकल रेडीमेड लोहे व स्टील के झूले, बांस के झूले पर झूल कर परंपरा निभाई जा रही है। ग्रामीण परिवेश में आज भी नाम मात्र की परंपरा देखने को मिल रही है। शहरों में महिला संस्थाओं द्वारा सामूहिक रूप से होटल या उद्यान में रेडीमेड झूलों पर झूल कर नाचते गाते त्यौहार की प्रासंगिकता बरकरार रख रही है।कुछ लोग होटल में पार्टी व संगीत का आयोजन कर त्यौहार का लुफ्त उठाते हैं।
कोरोना का असर*
इस बार तो कोरोना महामारी के कारण त्यौहार, उत्सव पर काफी गहरा असर देखने को मिल रहा है।गांवों व शहरों में उद्यान व होटलों के सावन के झूलों की बहार नहीं होगी।इस वैश्विक महामारी ने पर्व,त्योहारों का रंग फीका कर दिया।

डॉ.शम्भू पंवार

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