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परिवारवाद की सूबेदारी चालू आहे

भारत में परिवारवाद का भूत एक बार फिर महाराष्ट्र और हरियाणा में हिलोरे लेने लगा है। महाराष्ट्र में शिवसेना ने अपने स्वाभाविक सहयोगी को छोड़कर अपने धूर विरोधी से नाता जोड़ने का फैसला किया है और वह भी एक अदद कुर्सी के खातिर। बाल ठाकरे कभी रिमोट से सियासत को कंट्रोल करने की बात करते थे मगर उनका पुत्र अब सियासत सँभालने को आतुर है। कहने का तात्पर्य है परिवारवाद का नंगा नाच अब शिवसेना भी नाचने जा रही है। और यह सब किसी सिद्धांत के कारण नहीं अपितु परिवारवाद के वशीभूत होकर किया है। बाल ठाकरे की विरासत बेटे उद्धव और पोते आदित्य के कुशल हाथों में सुरक्षित थी मगर सत्ता के मोह ने कट्टर हिंदुत्व को कुचल कर कथित धर्म निरपेक्षता का चोला पहनने को मजबूर किया है। अब देखना यह है उद्धव किस सीमा तक जाकर सत्ता सुंदरी का वरन करते है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने शिवसेना के नापाक गठजोड़ को स्वार्थों की संज्ञा दी है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने शिवसेना-बीजेपी की सरकार नहीं बन पाने पर बातों-बातों में शिवसेना को स्वार्थी करार दे दिया। वहीँ हरियाणा परिवारवाद से उभरने का नाम नहीं ले रहा है। चैधरी देवीलाल की चैथी पीढ़ी सत्ता सुख का आनंद लेने के लिए हरियाणा मंत्रिमंडल में शामिल हो चुकी है। इन्हें मिलाकर हमारे लोकतान्त्रिक देश में एक दर्जन राज्यों में परिवारवाद की चिंगारी अभी सुलग रही है।

यूँ देखा जाये तो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में वंशवादी राजनीति न के बराबर है जबकि कांग्रेस, सपा, डीएमके, आरजेडी, एनसीपी, लोकदल के नाम से विभिन्न दल, नेशनल कॉन्फ्रेंस, पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, देवेगौड़ा की पार्टी, अकाली दल जैसे दलों का संगठन और सत्ता एक परिवार विशेष के लिए समर्पित है। कई राजनीतिक विश्लेषक परिवारवाद और वंशवाद की परिभाषा अलग अलग बताते है। इन लोगों की मान्यता के अनुसार यदि संघर्ष के रास्ते कोई भाई अपनी जगह सियासत में बनाकर आता है तो उसे परिवारवाद का दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। वहीँ दूसरे पक्ष के विश्लेषक मानते है कि परिवार के सहारे आगे बढ़ना अनुचित है। भारत के लोकतंत्र को समझने वाले लोगो का एक दृष्टिकोण ये भी है की इस देश में वंशवाद और राजशाही को लोकतंत्र का जामा ओढ़ाया गया है। राजशाही के जमाने में और लोकतंत्र में फर्क सिर्फ इतना है कि तब राजा ही अपने बेटे को उत्तराधिकारी घोषित करता था अब वो जनता से घोषित करवाता है। बहरहाल आम जनता की नजर में परिवारवाद और वंशवाद में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। लोकतंत्र के लिए यह हितकारी नहीं है।

आजादी के बाद से ही परिवारवाद गैर कांग्रेसी दलों का कांग्रेस के विरुद्ध अचूक हथियार रहा है। शुरू में डॉ लोहिया ने परिवारवाद पर कांग्रेस पर हमला किया था बाद में गैर कांग्रेस दलों ने इसे हथिया लिया। अब तो लगभग सभी पार्टियों में परिवार का ही बोलबाला है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश, बिहार में तेजस्वी यादव और चिराग पासवान, कर्नाटक में कुमार स्वामी, पंजाब में बादल, हरियाणा में चैटाला, कश्मीर में अब्दुल्ला, महाराष्ट्र में ठाकरे और सुप्रिय सुले के बाद राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा के अवतरित होने के बाद देश में वंश और परिवारवाद की सियासत गरमा गई है। मोतीलाल नेहरू से राहुल गाँधी तक कांग्रेस नेहरू- गाँधी परिवार के कब्जे में रही है। नेहरू -गाँधी परिवार जब जब कांग्रेस पर सवार हुआ है तब तब यह पार्टी आगे बढ़ी है। नरसिंह राव, सीताराम केसरी का कार्यकाल भी लोगों ने देखा है। कहा जाता है की इन दोनों नेताओं के समय पार्टी की लुटिया डूबी जो अब तक उभर नहीं पाई है। कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप कोई नया नहीं है मगर यह सच है की इस पार्टी को जीवनदान यह परिवार ही दे सकता है अन्यथा स्वतंत्रता के गर्भ से निकली पार्टी को बिखरने में देर नहीं लगेगी।
भारत की राजनीति में परिवारवाद खत्म होने की बजाय वटवृक्ष की तरह फैलता जा रहा है। वर्तमान में लगभग हर पार्टी परिवारवाद के रोग से ग्रसित है। प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का हाल तो यह है,कि पार्टी का अध्यक्ष पद परिवारों की बपौती बना हुआ है। अधिकांश राजनीतिक दलों में एक ही परिवार के सदस्य कब्जा जमाये हुए है। इन दलों में वंशवाद के साथ दागी सियासत भी उफान पर है। कई दल तो लोकतंत्र का जामा पहन कर जाति ,संप्रदाय और वर्ग विशेष की राजनीति का सियासी खेल खेल रहे है। इन दलों के पास धन दौलत की कमी नहीं है। जितनी तेजी से राजनीतिक दलों में परिवारवाद पांव पसार रहा है, वह दिन दूर नहीं जब शायद कोई आम आदमी चुनाव लड़ सके।
भारत का लोकतंत्र भी अजब निराला है। मतदाता चाह कर भी जाति और क्षेत्र की राजनीति के भंवर से आजादी के 73 वर्षों के बाद भी निकल नहीं पाए है। लोकतंत्र ने आज पूरी तरह परिवारतंत्र का जामा पहन लिया है। बड़े बड़े आदर्शों की बात करने वाले नेता परिवारमुखी होगये है। देश वंशवाद से कब मुक्त होगा यह बताने वाला कोई नहीं है। इस गंभीर और संक्रामक बीमारी का इलाज केवल देश का मतदाता ही कर सकता है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी . 32 माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

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