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खुशियों का खजाना है परिवार

परिवार एक बार फिर वैश्विक चर्चा का विषय बन गया है। मीडिया में आरही खबरों के अनुसार जनसँख्या विस्फोट, शहरीकरण और सोशल मीडिया को एक हद तक परिवार के विखंडन का दोषी माना जा रहा है। कहा जाता है परिवार ही वह संस्था है जो मनुष्य के सुखी जीवन का आधारभूत स्तम्भ है। हमारे देश में परिवार को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती है। शहरीकरण की वजह से परिवार टूट रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में गांवों से शहरों में या विदेशों में पलायन कर रहे हैं जिसकी वजह से ना चाहते हुए भी परिवारों में एक दूरी बन रही है। बड़े और संयुक्त परिवार छोटे होते जा रहे है, साथ ही आधुनिक जीवन शैली आज के युवा को परिवार से अलग कर रही है।
सियासी प्रगति की अंधी दौड़ में हमने दुनिया को अवश्य अपनी मुट्ठी में कर लिया है मगर परिवार नामक संस्था से विमुख होते जा रहे है। इसी का नतीजा है देश में पारिवारिक समस्याएं बढ़ती जा रही है जिसका खामियाजा बच्चे से बुजुर्ग तक को उठाना पड़ रहा है। एक ही परिवार में धीरे धीरे एक दूसरे से आपसी बातचीत बंद होने से अनेक समस्याएं उठ खड़ी हुई है। समय रहते बातचीत का रास्ता नहीं खुला तो तनाव, घुटन और अवसाद का सामना करना पड़ सकता है। बातचीत और आपसी संवाद खुशियों का खजाना है जिससे मरहूम होना किसी भी परिवार के लिए संभावित व्याधि को आमंत्रित करना है।
हमारी लाइफ स्टाइल बदल गयी है। बच्चे बहुत छोटी उम्र में ही स्कूल जाना शुरू कर देते हैं। माता.पिता काम पर चले जाते हैं। जो थोड़ा.बहुत समय वे साथ होते भी हैं वह भी टीवी. कंप्यूटर या फोन पर चला जाता है। बहुत.से परिवारों में बच्चे और माता.पिता अजनबियों की तरह अपनी.अपनी जिंदगी जीते हैं। उनके बीच जरा. भी बातचीत नहीं होती। किसी भी समाज का केंद्र परिवार ही होता है। परिवार ही हर उम्र के लोगों को सुकून पहुँचाता है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में परिजनों से बात करने का सुख अब बिरलों को ही मिल पाता है। इससे तनाव कम होने के साथ विभिन्न पारिवारिक दिक्कतों और समस्याओं का एक ही जाजम पर हाथोंहाथ निपटारा हो जाता है। परिवार मर्यादा और आदर्श का जीवंत उदहारण है। यह सामाजिक संगठन की मौलिक इकाई है। परिवार के अभाव में मानव समाज का अस्तित्व नामुमकिन है। फैमिली की बुनियाद उनके बीच का प्यार है जो सबको एक साथ जोड़ कर रखता है। अक्सर देखा जाता है परिजन रहते एक छत के नीचे है मगर उनमें आपसी बातचीत नहीं हो पाती है। इससे परिवार में घुटन और तनाव के साथ असुरक्षा का भाव रहता है। यदि एक दिन में एक घंटे भी परिजन साथ बैठ कर बातचीत करलें तो परिवार की खुशियां द्विगुणित हो सकती है।
महानगरीय संस्कृति ने परिवार व्यवस्था को मटियामेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है फलस्वरूप मानव को अनेक संकटों का सामना करना पड़ रहा है। विशेषकर परिवार विघटित होने से समाज व्यवस्था गड़बड़ाने लगी है। भारत में संयुक्त परिवार प्रणाली बहुत प्राचीन समय से ही विद्यमान रही है। साधारणतः संयुक्त परिवार वह है जिसमें पति-पत्नी, सन्तान, परिवार की वधुएँ, दादा-दादी, चाचा-चाची, अनके बच्चे आदि सम्मिलित रूप से रहते है। संयुक्त परिवार में माता-पिता, भाई-बहन के अतिरिक्त चाचा, ताऊ की विवाहित संतान, उनके विवाहित पुत्र, पौत्र आदि भी हो सकते हैं। संयुक्त परिवार से घर में खुशहाली होती है। साधारणत पिता के जीवन में उसका पुत्र परिवार से अलग होकर स्वतंत्र गृहस्थी नहीं बसाता है। यह अभेद्य परंपरा नहीं है, कभी-कभी अपवाद भी पाये जाते हैं। ऐसा भी समय आता है, जब रक्त संबंधों की निकटता के आधार पर एक संयुक्त परिवार दो या अनेक संयुक्त अथवा असंयुक्त परिवारों में विभक्त हो जाता है।
संयुक्त परिवार में विकास कर रहे बच्चों में सोहार्द की भावना होती है अर्थात् मिलनसार तथा किसी भी भेदभाव से मुक्त होते हैं। परिवार के मुखिया की बात मानने के साथ ही संयुक्त परिवार के सदस्य जिम्मेदार और अनुशासित होते हैं। परिवार चाहे संयुक्त हो या एकल, इसकी खुशियां सदस्यों की सोच और व्यवहार पर ही निर्भर करती हैं। हर परिवार के सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष हैं। सुरक्षा की दृष्टि से संयुक्त परिवार की खूबियां है तो सुविधा की दृष्टि से एकल परिवार के भी अपने फायदे हैं। बदलते वक्त और जरूरत के हिसाब से परिवार संयुक्त और एकल परिवार का रूप लेते हैं। सुरक्षा, और सुविधा, दोनों ही दृष्टियों से संयुक्त परिवार के अपने फायदे हैं। संयुक्त परिवार में अगर कभी किसी को कोई दिक्कत होती हैं तो सभी सहायता के लिए पूरा परिवार ही जुट जाता है। बच्चों को छोड़कर ऑफिस या कहीं बाहर जाना है तो भी निश्चिंतता के साथ जा सकते हैं। यहां बच्चों की जिम्मेदारी सिर्फ माता-पिता की नहीं बल्कि पूरे परिवार की होती है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी .32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 8949519406

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