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अप्रत्याशित संकटों के अनुभवों से भावी सीख

अभावग्रस्त और संकटकालीन जीवन का अनुभव मानव जाति को भावी आपदाओं और उनसे उत्पन आनुषंगिक परिस्थितियों के कारण और निवारण हेतु लड़ाई लड़ने का हौसला अवश्य पैदा करता है।
करोना वायरस से उपजा संकट निरंतर भविष्य के प्रति गंभीरता और भयावहता के संकेत देता नजर आता है।इससे लड़ने के लिए शासन- प्रशासन और स्वास्थ्य प्रशासन रोज-रोज नए-नए उपाय खोजकर उसकी घोषणा भी कर रहा है।
प्रधानमंत्री की अपील पर जनता और प्रशासन ने एक दिनी “जनता कर्फ्यू” की सफलता मात्र को ही वायरस पर मिली जीत मानकर और जनता कर्फ्यू के मूलमंत्र”सोशल डिस्टेंसिंग”के निहितार्थ को दरकिनार कर आला अधिकारियों की थोड़ी अज्ञानता या लापरवाही से हम बे-काबू होकर सड़क पर उतर पड़े और जश्न मनाते हुए “जोश में होश खोना” की कहावत को चरितार्थ करने के साथ कोरोना वायरस की भावी गंभीरता के प्रति हमारी घोर लापरवाही प्रकट होते देर नहीं लगी।अन्य देशों में व्याप्त संक्रमण और स्वास्थ्य सेवाओं के मज़बूत ढांचे और अपने देश की जनसंख्या तथा स्वास्थ्य सेवाओं की वस्तुस्थिति का संदर्भ लेते हुए एक गहन सीख लेने की आवश्यकता है।अन्य देशों की तरह इस वायरस से हमारे देश में संक्रमण की स्थिति में यहां की स्वास्थ्य सेवाएं “ऊंट के मुंह में जीरा” भी साबित नहीं होंगी।
इस वायरस से उत्पन्न होने वाली गंभीर परिणामों से निपटने के लिए देश के प्रधानमंत्री द्वारा जनता से घर से लंबे समय तक बाहर कदम न रखने की पुनः अपील से यह आभास होता है कि देश की जनता को युद्ध जैसे हालातों से निपटने के समकक्ष तैयार रहने की आवश्यकता है।ऐसी स्थिति में सरकार द्वारा घोषित नीतियों- निर्देशों और स्वास्थ्य विभाग की एडवाइजरी का यथोचित पालन सुनिश्चित करना जनता के ही हित में है।गांव से लेकर शहर तक,बच्चे से लेकर बूढ़े तक सबको एकजुट होकर इस वायरस की लड़ाई के इस महायज्ञ में अपनी अपनी नागरिक जागरूकता और उत्तरदायित्व की आहुति डालने से ही विजय प्राप्ति की ओर कदम बढ़ाया जा सकता है।देश का प्रत्येक नागरिक यह सुनिश्चित करे कि सेहत और साफ सफाई के प्रति अनवरत सतर्कता,सम्मानजनक सामाजिक दूरी और जनजागृति ही संक्रमण से बचने के कारगर उपाय सिद्ध हो सकते है।इटली जैसे देश की मज़बूत स्वास्थ्य सेवाओंं का ढांचा इस संक्रमण का मुकाबला करने में सक्षम साबित नहीं हो सका है।ऐसे में भारत जैसे देश में सरकार और जनता के लिए सुरक्षात्मक सुझावों एवं उपायों का अमल करना और भी जरूरी हो जाता है।
देश में गंभीर खतरों के स्पष्ट और सन्निकट होने के संकेत होने के बावजूद यहां की जनता उसके गंभीर परिणामों को समझने में चूक और लापरवाही करती नजर आती है।यहां तक कि कुछ मरीज अस्पतालों से भाग जाते है या फिर अपने को एकांतवास (आइसोलेशन) में जाने में भी आनाकानी करते या कतराते हुए नजर आते हैं।इस प्रकार की हरकतों से उनकी घोर एवं आपराधिक लापरवाही के साथ अव्वल दर्जे की मूर्खता भी झलकती है।इस देश में कुछ लोग अपने लिए तो खतरा बने हुए ही है,वे दूसरों के लिए भी संकट पैदा कर रहें हैं।जब सम्पूर्ण सरकारी तंत्र इस संभावित संक्रमण के भावी खतरों से निपटने के लिए रात-दिन एक कर जंग जैसा लड़ रहा है,तो देश की जनता का भी न्यूनतम उत्तरदायित्व बनता है कि वह सरकार के दिशा-निर्देशों का पूरी सावधानी और संयम के साथ सम्यक अनुपालन सुनिश्चित करते हुए अपनी रहन-सहन की शैली और दिनचर्या कुछ दिनों के लिए बदलने कि आदत डाले क्योंकि” प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योर”।
अब स्पष्ट हो चुका है कि एक देश की गलती सम्पूर्ण विश्व के लिए कितना बड़ा और गंभीर संकट बन सकता है।ऐसी विषम स्थिति में ही”वसुधैव कुटुंबकम्”विचार की सार्थकता मालूम होती है।मानव को मानव की सुरक्षा के साथ पशु-पक्षियों और पेड़- पौधों की भी रक्षा करने के धर्म का पालन करना है।संकट के समय अधिकांश लोग अक्सर स्वार्थ केन्द्रित होने लगते हैं,ऐसी संकट की घड़ी में सक्षम और साधन संपन्न लोगों को अपने संसाधनों को गरीब और विपन्न लोगों के साथ सामाजिक साझा करने की भी जरूरत है।समानता,विनम्रता,परस्पर निर्भरता और प्रतिबद्धता जैसे जीवन के मूलभूत मूल्यों को मानने और पालन करने का वक्त है।देश के प्रत्येक नागरिक से उसकी साधन संपन्नता,क्षमता,योग्यता और सामर्थ्य से यथासंभव दूरी बनाए रखते हुए सामाजिक सहयोग की अपेक्षा है।कुछ न करने की स्थिति में हम लोग जागरूकता के माध्यम से जनता में उत्पन्न भय और दहशत को कम करने का न्यूनतम उत्तरदायित्व तो निभा ही सकते हैं।
सरकारी तंत्र का मनोबल बढ़ाने के लिए उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव प्रकट करने के साथ मानव जाति के कृत्यों से उपजे इस संकट की घड़ी से प्रकृति और पर्यावरण के छिपे संदेश से भी समझने और सीख लेने का वक़्त आ चुका है।विकास की अंधी दौड़ को जीतने की होड़ में हम उसकी सेहत और सौंदर्य से लगातार खिलवाड़ करने से बाज नहीं आ रहे हैं।मानव जाति को प्रकृति के प्रति अपने संबंधो की संवेदनाओं को पुनर्जागृत कर अपनी व्यापक एवं परिपक्व सोच का परिचय देने की भी आवश्यकता है।क्योंकि,अब ऐसी महामारियां और प्रकृति/पर्यावरण का असामान्य व्यवहार का घटित होना सामान्य लक्षण सा बनता नजर आ रहा है।
अर्थ जगत के जानकारों के हिसाब से इस महामारी के भावी संकटों से निपटने में देश के मानव एवं वित्तीय संसाधनों की अप्रत्याशित बर्बादी और लंबे समय तक लॉक डाउन रहने से देश को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है जिसका अभी अवलोकन, मूल्यांकन और विश्लेषण करना जल्दबाजी होगी।मेरे विचार में पहले से ही देश कि डूबी चल रही अर्थव्यवस्था को एक और बड़ा झटका लगने की स्थितियां बनकर उभर चुकी हैं,जिसकी भरपाई करने और उबरने में लंबा समय लगना निश्चित है।
आइए हम सब लोग सामूहिक संकल्प और सौगंध को एक बार फिर दोहराएं कि सरकार और स्थानीय प्रशासन द्वारा समय समय पर दिए गए सुझावों और निर्देशों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करते हुए सामूहिक जनसहयोग और शक्ति के बल पर भारी बर्बादी से पहले इस लड़ाई को जल्द से जल्द जीतने में अवश्य सफल होंगे।

नन्द लाल वर्मा
एसोसिएट प्रोफेसर
वाई डी पीजी कॉलेज
लखीमपुर खीरी (यूपी)262701
Mob.9415461224

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