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जी.डी.पी. यानी गरीबी दिवालिया और पागलपन!

एक दिन भजनखबरी से उसका दोस्त टाइमपास टकला पूछ बैठा कि यह जीडीपी क्या होता है? भजनखबरी ने थोड़ी देर सोचने के बाद कहा – अरे यार! यह भी कोई पूछने वाला सवाल है? देश में जो भी कुछ दिखाई देता है, वह जीडीपी है। टाइमपास टकले को यह जवाब सुनकर संदेह हुआ। उसने फिर पूछा – इसका मतलब मैं, तुम, यह, वह सब जीडीपी है? यहाँ तक कि कुत्ता, बिल्ली, सुअर भी? भजनखबरी ने आश्चर्य के साथ कहा – हाँ! मैं, तुम, यह, वह, कुत्ता, बिल्ली, सुअर सब जीडीपी है। ऐसा इसलिए कि हम अपने लिए जो भी सामान इस्तेमाल करते हैं, वह जीडीपी कहलाता है। एक जमाने में जब हम खाने, पीने, उठने, बैठने, धोने, रहने, घूमने-फिरने के लिए जो भी सामान उपयोग करते थे, वही तो जीडीपी था! अब हमारा इतना भाग्य कहाँ, जो इन सामानों का इस्तेमाल कर सकें। अब तो ये चीज़ें सपने में भी आने से मना करने लगी हैं। कुत्ते के लिए पिडिग्री का बिस्कुट हो, बिल्ली को नहलाने वाला महंगा साबुन या फिर सुअर को खिलाया जाने वाला आहार, सब जीडीपी है। जहाँ तक जीडीपी की समझ है तो हममें और जानवरों में सिर्फ इतना फर्क है कि हम समझकर भी बेवकूफ बने रहते हैं, जबकि जानवर नासमझी में अपने भोलेपन से सबका दिल जीत लेते हैं। वैसे तो जीडीपी का मतलब ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्शन (सकल घरेलू उत्पाद) होता है लेकिन हम-तुम जैसे लोगों के लिए पैदा होने से पहले और मरने के बाद तक जिन-जिन चीज़ों की जरूरत पड़ती है, उसे गरीबी दिवालिया और पागलपन कहते हैं। इसका हिसाब करने वाला सरकार के बहकावे में आकर कभी कम तो कभी ज्यादा दिखा देते हैं, इसे राष्ट्रीय सांख्यकी आयोग कहते हैं। ये लोग हर 3 महीने में और साल में एक बार जीडीपी का पूरा आंकड़ा अकड़कर या फिर सिकुड़कर हमारे मुँह पर ऐसे फेंक देते हैं जैसे हम यही आंकड़े खाकर जिंदा रहेंगे।
टाइमपास टकला इतना सब कुछ सुनने के बाद भी अनमना सा रहा। भजनखबरी ने कहा – अरे यार! तू भी जिसके पीछे पड़ जाता है, उसे छोड़ता नहीं है। ले सुन – जीडीपी पता लगाने के तीन तरीके होते हैं। एक, कमाने के जरिए। इसमें होता यह है कि हम जो मजदूरी एवं वेतन पाते हैं (जो अभी बेरोजगारी से खो बैठे हैं) उसमें लगान फिर शुद्ध ब्याज फिर कंपनियों के लाभ और फिर परोक्ष कर लगाने के बाद जो मूल्य का नुकसान होता है उसे पहला तरीका कहते हैं। दूसरा, खर्च करने का तरीका (जो अभी शून्य है। पूरा का पूरा पैसा खर्च हुए एक युग गुजर गया। अब रुपए पर गांधी जी की शक्ल भी याद नहीं है।) यानी खरीदे हुए सामान का हम उपभोग फिर निवेश फिर सरकारी खर्च और फिर निर्यात-आयात कर अपना बोरिया बिस्तर लपेटकर दुनिया से विदा होते हैं। तीसरा और आखिरी तरीका सभी उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं का अंतिम मूल्य जोड़ कर इसे ज्ञात किया जाता है। जो इस समय इतना है कि हम खुद को बेच दें तो भी नहीं खरीद सकते। यहाँ अंतिम मूल्य का अर्थ है कि जैसे पहले हम पिसे फिर हमारी चटनी बनायी गयी और हमारी चटनी से कुछ डुबोकर खाया जाता तो जीडीपी बढ़ता है। हम तो चटनी बनकर भी बेकार हैं। यहाँ हमारा अंतिम मूल्य शून्य है। अब तू ही बता देश का जीडीपी कैसे बढ़ेगा, बल्कि ऐसे डूबेगा जिसे ढूँढ़ने के लिए हड़प्पा-मोहनजोदाड़ों की तरह फिर से खुदाई करनी पड़ेगी।

(डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’)

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