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घूंघट शोषण का प्रतीक है या मर्यादा का

घूंघट इज्जत और शर्म का प्रतीक है या गुलामी का इस पर देशव्यापी बहस शुरू हो गई है। भारत में शैक्षिक क्रांति के बाद महिलाएं घूंघट से बाहर निकली मगर उत्तर भारत में आज भी घूंघट का बोलबाला है। औरतें आज भी घूंघट से अपना मुंह ढकती हैं। विशेषकर ग्रामीण अंचलों में बड़ी संख्या में महिलाएं घूंघट में रहती है।
घूंघट प्रथा के विरोध का स्वर इस बार घूंघट प्रभावित राज्य राजस्थान से शुरू हुआ है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने घूँघट प्रथा पर जोरदार हमला बोलते हुए इस बुराई के खिलाफ अभियान चलाने पर जोर दिया है। गहलोत ने कहा बदलते जमाने के दौर में एक महिला को घूंघट में कैद करने का किसी समाज को अधिकार नहीं है। जब तक घूंघट रहेगा तब तक महिलाएं आगे नहीं बढ़ पाएंगी। अगर देश को मजबूत होना है तो महिला सशक्तिकरण बहुत जरूरी है और इसके लिए घूंघट प्रथा का हटना अनिवार्य है। गहलोत का कहना है कि इस प्रथा के दिन गए। वक्त बदल गया है पर कई गांवों में आज भी घूंघट प्रथा है। औरतें देश के निर्माण में बराबर योगदान दे पाएंगीं, अगर उनसे मुंह ढकने को न कहा जाए। गहलोत ने कहा, घूंघट हो या बुर्का, आधुनिक समाज में दुनिया चांद तक पहुंच रही है, मंगल ग्रह पर जा रही है तो इसका क्या तुक है।हमारे प्राचीन वेद एवं धर्मग्रंथों में पर्दा प्रथा का कहीं भी विवरण नहीं मिलता है। भारत में हिन्दुओं में पर्दा प्रथा इस्लाम की देन है। इस्लाम के प्रभाव से तथा इस्लामी आक्रमण के समय आक्रमणकारी दरिंदों से बचाव के लिये हिन्दू स्त्रियाँ परदा करने लगीं। भारतीय महिलाओं की सुंदरता से प्रभावित आक्रमणकारी अत्याचारी होते जा रहे थे। उस दौरान महिलाओं के साथ बलात्कार और अपहरण की घटनाएं बढने लगीं थी। बताया जाता है भारत में 1930 तक घूंघट अपने चरम पर था। लेकिन इसके बाद इसमें कमी आती गई। आज भी राजस्थान, हरियाणा, यूपी, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में यह प्रथा जीवित है।
भारत में महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा उपेक्षित ही रही हैं। इसका एक ज्वलंत उदाहरण है पर्दा प्रथा। जहाँ मुस्लिम समाज में महिलाओं को नकाब में रहना पड़ता है वहीँ हिन्दुओं में घूंघट प्रथा का साम्राज्य कायम है। घूंघट प्रथा निश्चित रूप से महिलाओं के विकास और चेतना को अवरुद्ध करती है। उसे गुलामों जैसा अहसास कराती है। जो स्त्रियां इस प्रथा से बंध जाती है। वे कई बार इतना संकोच करने लगती हैं कि बीमारी में भी अपनी सही से जांच कराने में असफल रहती हैं। इस प्रथा को समाज मे रखने के नुकसान बहुत हैं।
कुछ विद्वानों और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार रामायण और महाभारत में भी महिलाएं कहीं पर भी पर्दा अथवा घूंघट का प्रयोग नहीं करती थीं। अजंता और सांची की कलाकृतियों में भी स्त्रियों को बिना घूंघट दिखाया गया है। मनु और याज्ञवल्क्य ने स्त्रियों की जीवन शैली के संबंध में कई नियम बनाए हुए हैं, परंतु कहीं भी यह नहीं कहा है कि स्त्रियों को पर्दे में रहना चाहिए। ज्यादातर संस्कृत नाटकों में भी पर्दे का उल्लेख नहीं है। यहां तक कि 10वीं शताब्दी के प्रारंभ काल के समय तक भी भारतीय राज परिवारों की स्त्रियां बिना पर्दे के सभा में तथा घर से बाहर भ्रमण करती थीं। घूंघट के पक्षधरों का मानना है घूंघट भारतीय परंपरा में अनुशासन और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। आज भी राजस्थान में यह प्रथा गाँव से लेकर शहर तक में जीवित है। यह भी कहा जाता है हिन्दू धर्म में महिलाओं पर घूँघट के लिए दवाब नहीं डाला जाता बल्कि महिलायें स्वयं उस व्यक्ति से सम्मानस्वरुप पर्दा करती हैं जो रिश्ते में उनसे बड़ा होता है।
यह कहने में कोई संकोच नहीं होता है की घूंघट या बुरका एक सामाजिक कुरुति है। यह औरतों को गैर बराबरी का अहसास कराता है। पुरुष और नारी दोनों एक ही मानव समाज के अभिन्न अंग है। प्रतिबंध और कानून दोनो पर समान लागू होने चाहिए। यदि घूंघट प्रथा इज्जत और सदाचार की रक्षा के लिए है तो उसे पुरुष पर लागू किया जाना चाहिए क्योंकि दूराचार में पुरूष हमेशा आगे रहता है। यदि यह पुरूष के लिए आवश्यक नहीं है तो नारी पर भी लागू नहीं होना चाहिए। देश अब विकास के पथ पर बहुत आगे बढ़ चुका है। इस कुरीति से निकलने के लिए शिक्षा, साहस और जागरूकता की जरुरत है। इसके साथ समाज की सोच और रवैये को बदलना होगा तभी देश में महिलाएं सुख की साँस ले पाएंगी और पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर देश के विकास में योगदान दे पाएंगी।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 8949519406

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