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एक नये दौर और एक नये भारत की झलक

इतिहास मे ऐसे दिन बहुत कम आतें हैं जब एक अकेला दिन ऐसा इतिहास रच दे जिसका इंतजार सदियों से किया जा रहा हो।नवम्बर महीने की 9 तारीख ने भारतवासियों के लिए एक ऐसा ही इतिहास रचा है।देश और अयोध्यावासियों का पांच सदी का इंतजार खत्म हुआ।सुप्रीम कोर्ट ने 500 साल से चले आ रहे विवाद का पटाक्षेप करते हुए अपने ऐतिहासिक सर्वसम्मत फैसले मे राम मंदिर निैमाण का रास्ता साफ कर दिया।अपने जन्मस्थान पर मालिकाना हक का मुकदमा लड़ रहे रामलला विराजमान को जन्मस्थली मिल गयी।अयोध्या पर बहुप्रतीक्षित फैसला आया है।संतुलित और सबकी भावनाओं को समाहित करने वाला फैसला जिसने हर किसी के साथ न्याय किया और देश की भावना को पूरा किया। सही मायने में यह फैसला ऐसा मील का पत्थर है जो देश की दिशा तय करेगा। वहीं गुरू नानक देव जी का 550 वां प्रकाश पर्व मना रहे सिख समाज की भी 72 साल की अरदास पूरी हो गयी।पाकिस्तान स्थित करतारपुर साहिब का रास्ता खुल गया और सिख भाईयों की वर्षो पुरानी आस,वहां स्थित गुरूदूारा जाने की पूरी हुई।सुप्रीम कोर्ट ने स़ंविधान के अनुच्छेद 142 मे प्रदत शक्तियों का प्रयोग करते हुये सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या मे 5 एकड़ जमीन देने का भी फैसला सुनाया।इस सबसे बढ़ कर 130 करोड़ भारतवासियों ने बड़ी खूबसूरती से कंधे से कंधा मिला कर समुदाय,जाति और मजहब की सीमाओं को तोड़ कर इस फैसले का स्वागत किया। समूची दुनियां के सामने एकता की अनुठी मिसाल पेश कर  ये जता दिया कि वह एक हें,वह भी ऐसे समय मे जब विदेशी मीडिया देश मे समुदायों कि एकता पर सवाल खड़े करता रहा हो।देशवासियों ने जता दिया कि इस फैसला से केवल देश जीता है, किसी संप्रदाय की जीत हार नहीं है। मानो फैसला लोगों के दिलों में उतर गया है।जमीन से जुड़े बहुत छोटे फैसले पर भी परिवारों मे मतभिन्नता रहती है, यह तो देश का सबसे पुराना और चर्चित मामला था।

बिना किसी लागलपेट के देखें तो इस फैसले का देश के सभी दलों और समुदायों ने जिस तरह एकजुट होकर स्वागत किया है, वह एक नये दौर की शुरूआत जैसा लगता है।अपवाद को छोड़ दें तो फैसले पर आरोपों-प्रत्यारोपों का न होना, अपने-अपने लाभ-हानि के हिसाब से राजनीतिक दलों का खेमों में न बंटना इस दलील को और मजबूती प्रदान करता है। ये क्या कम है कि असद्दुदीन ओवैसी की अनर्गल बयानबाजी को मुस्लिम नेताओं और आम मुसलमानों ने सिरे से
ही खारिज कर दिया। एक तरफ 6 दिसंबर 1992 का वो दिन देखिये जब बाबरी मस्जिद ढहा दी गई थी। इसके बाद पूरा देश हिंसा की आग मे जल उठा था। हिंदू-मुस्लिम एक दूसरे की जान के दुश्मन हो गये थे। कई हजार लोग मारे गए थे,देश के इतिहास में वो दिन किसी काले दिन से कम नहीं था। क्योंकि इस दिन ने हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोगों के बीच एक दीवार खींच दी थी। जाहिर है कि हिंदू मानते थे कि वहां राम मंदिर बनाया जाना चाहिए, लेकिन मुस्लिम समुदाय का मानना था कि वहां मस्जिद होनी चाहिए।अब 27 साल
बाद 2019 के 9 नवम्बर का दिन देखिये जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या का फैसला कर दिया है और अपना फैसला सुना दिया है।जिसमे राम मंदिर निर्माण का शांतिपूर्ण रास्ता निकल गया और यह भी साफ हो गया कि अयोध्या में पांच एकड़ भूमि में शायद देश की सबसे बड़ी मस्जिद बनेगी। माहौल कितना खुशगवार है कि दोनों समुदाय के लोग मंदिर और मस्जिद के निैमाण मे सहयोग के लिए तैयार हैं। यानी ये कहना गलत नही होगा कि इसमे केवल देश जीता है, किसी संप्रदाय की जीत हार नहीं है।
आज उस अयोध्या की कल्पना की जा सकती जिसने 491 सालों से एक लम्बा विवाद झेला है। यह सामान्य विवाद नही था। यह एक समुदाय की आसथा को लेकर बड़े टकराव का कारण भी था। मुगल बादशाह बाबर के आदेश पर उसके सेनापति ने मीर बाकी ने 21 मार्च 1528 को अयोध्या मे बने भगवान राम के मंदिर को ध्वस्थ कराया था। ताजा फैसले को देख कर तो लगता है कि वैसे तो ये मसला काफी पहले ही हल हो जाना चाहिए था। लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि बात बिगड़ती गयी, हर स्तर पर कोशिश तो बहुत की गयी लेकिन कोई पक्ष पूरे से कम पर राजी नही हुआ। लेकिन ये सब अब बीते कल की बात हो गयी। इस मामले से जुड़े लोग भी ये समझ गए हैं कि सालों क्या और दशकों क्या, सदियों तक भी कोर्ट-कचहरी में फंसे रहने का कोई मतलब नहीं है। मामले के एक मुस्लिम पक्षकार इकबाल अंसारी भी राम मंदिर को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुश हैं। वह भी ये मानते हैं कि यह देश का एक अहम मसला था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी आसानी से खत्म कर दिया है। इकबाल अंसारी जैसी सोच रखने वाले करोड़ों लोग भी इस बात को समझ
रहे हैं कि कोर्ट-कचहरी में फंसे रहने और हिंदू-मुस्लिम की लड़ाई से कुछ हासिल नहीं होगा।इसी लिए घर के अंदर और पड़ोस में छिपे दुश्मनों को यह साबित कर दिखाया कि वह दूसरों के बहकावे में आने वाले नहीं हैं। इतने पुराने विवाद की इस तरह शांति से हल होते देखना सचमुच में नये भारत की झलक देता है।विवादित अयोध्या जैसे ही निर्विवादित बनी, शाम होते ही नगर, गलिया, मंदिर और घर दीपों से गुलजार हो उठे। व्यापारी, बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे सब की खुशी दीपों की जलती हुई लौ से प्रकट हुई।  समूची अयोध्या
अलौकिक श्रृंगार मे नजर आई।लेकिन काबिलेगौर बात ये रही कि जश्न का कोई भोंड़ा प्रदर्शन नहीं हुआ जो कि आज अनियंत्रित भीड़ की एक ख़ासियत बन चुका है। ये अयोध्या के आम लोग थे और उन्होंने जश्न मनाया लेकिन बहुत संयमित होकर जैसे वो बताना चाहते हों कि वो अपने मुसलमान पड़ोसियों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते है।यानी अयोध्या के लोगों ने भी कोर्ट के फैसले को शांति और भाईचारे के संदेश के रूप में ही समझा। वैसे ये कहना बहुत बड़ी बात है कि फैसला हिंदू मुसलमान के भेद को ख़त्म कर देगा और देश को एक बार और हमेशा के लिए एक सूत्र में जोड़ देगा। लेकिन बदलते समय मे फिलहाल ये उम्मीद की जानी चाहिए। वैसे इस फैसले का राजनीतिक मतलब नही निकाला जाना चाहिए लेकिन भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश मे भविष्य मे इसका राजनीतिक
गुणा-भाग निकाला जायेगा। सबसे पहले ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भारी नाराजगी व्यक्त कर इस की शुरूआत कर दी है। इसके पीछे अपना राजनीतिक मकसद हल करना चाहतें होगें।होगें।शायद इसी लिए उन्होने कह दिया कि उन्हें 5 एकड़ जमीन की भीख की जरूरत नहीं है। हम अपने अधिकार के लिए लड़ रहे
थे,जमीन के लिए नहीं। उन्होने और भी बहुत सी बातें कहीं जिसका यहां जिक्र जरूरी नही।अच्छी बात ये रही कि उनके बयानों को मुसलमानों ने ही गम्भीरता से नही लिया। अगर विचारधारा की राजनीति वालों के नजरिये से देखेगें तो ये एक मुकाम हासिल करने जैसा लगता है। यानी सब कुछ प्लस-प्लस ही है। अयोध्या मे भव्यभव्य मंदिर बनना विचारधारा की राजनीति करने वाले दलों कर अरमान था।था।धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाले दलों ने भी एक स्वर मे फैसले का स्वागत किया है। अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का
कांग्रेस पार्टी ने स्वागत करते हुए कहा कि वो हमेशा से राम मंदिर के पक्ष में थे। यहां ये नही भूलना चाहिए कि कांग्रेस की ही सरकार के दौर मे मंदिर का ताला खोला गया था। कोर्ट ने फैसले मे सन 1949 मे भगवान राम की मूर्ती रखने का जिक्र कर के ये भी बताया है कि क्या होना चाहिए था और क्या नही । एक खास बात ये भी कि अदालत ने विवादित बाबरी मस्जिद के नीचे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई की जिस रिपोर्ट को फैसले की एक कड़ी माना है,उस खुदाई मे पुरातत्वविद के के मोहम्मद की बड़ी भूमिका थी। मोहम्मद वर्ष 1976-77 मे पुरातत्वविद बीबी लाल के नेतृत्व मे अयोध्या मे खुदाई करके साक्ष्य एकत्र करने वाली टीम के सदस्य थे। उन्होने बड़ी साफ
गांई से नीचे मंदिर होने की बात स्वीकार की थी।एसआई के पूर्व निदेशक के के मोहम्मद भी इस फैसले से खुश हैं और उनका कहना है कि अब वह खुद को दोष मुक्त महसूस कर रहे है। ये भी बताया जाता है कि अयोध्या मे खुदाई मे 137 मजदूर लगाये गये थे जिसमे 52 के करीब मुसलमान थे। दरअसल देश के न्यायिक इतिहास में भी यह ऐतिहासिक घटना है जो देश के राजनीतिक, सामाजिक और
सांस्कृतिक सरोकारों को एकजुटता के सूत्र में भविश्य मे बांधेगी। ये कहना भी गलत न होगा कि ऐसा संवेदनशील मामला भी अदालत के स्तर पर सार्थक और निर्णायक तरीके से निपट सकता है तो यह भारत के लिए गौरव बढ़ाने वाली बात है।दुनिया को देश की न्यायिक व्यवस्था का भी लोहा मानना पड़ेगा। मामले की अहमियत को इस तरह से समझी जा सकती है कि भावी सीजेआइ ने इसे दुनिया के
सबसे बड़े मामलों में से एक बताया था। यहां संघ प्रमुख का ये बयान भी काबिलेगौर है, संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि आंदोलन संघ का काम नहीं है।अयोध्या आंदोलन में तो संघ अपवाद के रूप में जुड़ गया था। इस बयान के गहरे संकेत हैं। जो ये साफ करता है कि देश फिलहाल किसी भी अन्य विवाद में उलझना नही चाहता है।बहाहाल ये सभी जानते हैं कि यदि 130 करोड़ लोग आपसी रंजिश और मतभेदों को भूल एकजुट होकर राष्ट्रनिर्माण में जुटे तो भारत को विश्व गुरू बनने से कोई रोक नहीं सकता है।बीते 9 नवम्बर को सारे देश ने
यह कर दिखाया है।उम्मीद है कि आगे भी यही जज्बा बरकरार रहेगा और ऐसे विवादों को कोई तूल नही देगा।

– शाहिद नकवी –

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