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भगवान या विज्ञान

कबीरदास ने कहा था कि दुःख के समय सभी भगवान को याद करते हैं पर सुख में कोई नहीं करता। यदि सुख में भी भगवान को याद किया जाए तो दुःख करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। किंतु विडंबना यह है कि कोरोना के चलते चाहे आप सुख में या फिर दुःख में भगवान को याद कर लें, वो आपको बचाने वाला नहीं है। आज सभी धर्मों के प्रार्थना घर इस लाइलाज महामारी के चलते बंद पड़े हैं। तस्लीमा नसरीन के शब्दों में कहना हो तो मक्का से वैटिकन तक कोरोना ने यह साबित कर दिया है कि इंसान पर संकट की घड़ी में भगवान मैदान छोड़ देते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रार्थना घर लंबी छुट्टी के मूड़ में हैं।
आज स्थिति यह आ गयी है कि मक्का में सब कुछ ठप्प पड़ा है। पता नहीं शीघ्र ही आरंभ होने वाले रमजान उपवास के दौरान अदा की जाने वाली प्रार्थनाओं के समय स्थिति सामान्य हो पाएगी भी या नहीं? काबा का चक्कर लगाने के रिवाज ‘तवाफ़’ से लेकर उमरा (तीर्थयात्रा) तक, मक्का में सबकुछ ठप्प है। मदीना की तीर्थयात्रा पर रोक लगा दी गयी है। हो सकता है कि वार्षिक हज भी स्थगित कर दी जाए। अनेकों मस्जिदें जुमे की नमाज़ स्थगित कर चुकी हैं। कुवैत में विशेष अज़ानों में लोगों से घर पर ही इबादत करने का आग्रह किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर पोप का ईश्वर से संवाद बंद हो चुका है। विश्व के पुराने नगरों में एक रोम, जहाँ से कभी ईसाई धर्मगुरुओं के फरमान जारी हुआ करते थे, आज कोरोना की दहशत का जीता-जागता उदाहरण बनकर उभरा है। रोम इटली की राजधानी है। रोम के राजाओं ने ईसाई धर्मगुरुओं के लिए वाटिकन सिटी नाम से एक छोटे से द्वीप की स्थापना की। आज हश्र यह है कि वाटिकन सिटी की प्रार्थनाएँ खैर दुनिया की तो दूर इटली के लोगों की जान नहीं बचा पा रही हैं। माना जाता है कि पोप भगवान से संवाद कर सकते हैं, तो फिर वो इस समय ऐसा कर क्यों नहीं रहे हैं? यहां तक कि वे दैव संपर्क से किसी चमत्कारी दवा की जानकारी ला सकते हैं। फिर वे असमर्थ क्यों हैं? इसके बजाय वायरस का प्रकोप फैलने के डर से वैटिकन की हालत खराब है और पोप जनता का सामना करने के बजाय कन्न काट रहे हैं। वैटिकन में अनेक ईसाई धार्मिक त्यौहार मनाए जाते हैं। जैसे होली वीक, गुडफ्राइडे और ईस्टर आदि-आदि। दुर्भाग्यवश ये सारे भावी कार्यक्रम रद्द कर दिए गए हैं और धार्मिक सभाओं पर रोक लगा दी गई है। कोरोना का कोई सबसे बड़ा शिकार हुआ है तो वह है- इटली। कोरोना के मारे भगवान जहाँ-तहाँ दुबके पड़े हैं। पुजारी मंदिरों में प्रतिमाओं को मास्क लगा रहे हैं। न भजन न कीर्तन। मस्जिदों की अजाँ, गिरजाघर से निकलने वाला घंटा नाद ये सभी कोरोना के मृत्युतांडव से निकलने वाले हाहाकार में दबे पड़े हैं।
आज हम एक बार फिर दोराहे पर आकर खड़े हैं। जहाँ वही सवाल दोहराया जा रहा है जो हमेशा से संकट की घड़ियों में दोहराया जाता रहा है- भगवान बड़ा या विज्ञान? किंतु जिस तरह पिछले कुछ दिनों से स्थितियाँ बदली हैं, उससे तो यही लगता है कि अब भगवान नहीं विज्ञान की आवश्यकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि धर्म के ठेकेदारों को अच्छी तरह मालूम है कि ऊपरवाला हमें नोवेल कोरोना वायरस से बचाने नहीं आएंगे। यदि कोई बचा सकता है तो वे हैं वैज्ञानिक, जो इस समय रामबाण उपचार ढूंढने में व्यस्त हैं। धर्म पर भरोसा करने वाले अंधविश्वासियों को इस घटनाक्रम से सर्वाधिक आश्चर्य होना चाहिए। आज इन्हीं अंधविश्वासियों से पूछना चाहि कि कैसे दानपेटी में चढ़ावा चढ़ाने से कोरोना का इलाज हो सकता है। वे लोग जो कोई सवाल पूछे बिना झुंड बनाकर भेड़चाल की प्रवृति दिखाते हैं, ना उन्हें ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण चाहिए, ना ही तार्किकता और मुक्त चिंतन में उनका भरोसा है, क्या आज उन्हें यह बात नहीं कचोटती होगी कि जिन धार्मिक संस्थाओं को इस महामारी के समय उनकी सहायता के लिए आगे आना चाहिए था, वे अपने दरवाज़े बंद कर चुके हैं? क्या धार्मिक संस्थाओं का वास्तविक उद्देश्य सामान्य लोगों की सहायता करना नहीं है? ये सारे ऐसे कई सवाल हैं जो सवाल कम बवाल ज्यादा लगते हैं। बहुतों के लिए भगवान संरक्षक के समान हैं, और सलामती के लिए वे उनकी सालों भर पूजा करते हैं। किंतु जब मानवता संकट में होती है, तो आमतौर पर सबसे पहले मैदान छोड़ने वाले भगवान ही होते हैं।
पुजारी मुंह पर मास्क पहने घूम रहे हैं। साथ ही देवी-देवताओं के चेहरों पर भी लगा दिए गए हैं। दूसरी ओर वाट्सप विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम के द्वारा डरे-डराए भक्तों के डर के साथ व्यापार किया जा रहा है। इधर-उधर के कुछ कथन उठाकर गोमूत्र और गोबर के नाम पर कोविड-19 से रक्षा के दावे किए जा रहे हैं। चूँकि भारत में अंधविश्वासियों की संख्या अधिक है, डर का यह व्यापार बदस्तूर जारी है। कुछ लोगों के लिए यह महामारी पैसा कमाने का सुअवसर है। जान सबको प्यारी होती है। इसी जान का वास्ता देकर लोगों की जेबें ढीली की जा रही हैं। तिरुपति और शिरडी साई बाबा के मंदिरों में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती थी, किंतु आलम यह है कि ये मंदिर अब पाबंदियों के घेरे में हैं। पूजा और आरती बड़ी स्क्रीनों पर दिखाये जा रहे हैं।
सरकार को चाहिए कि वह धार्मिक संस्थाओं को दिए जाने वाले अनुदान और सब्सिडी पर रोक लगाकर इसके स्थान पर अस्पताल का निर्माण करवाएँ। अधिक से अधिक रोग परीक्षण केंद्र खुलवाएँ। नर्सों और डॉक्टरों की अधिक संख्या में नियुक्ति की जाए। धार्मिक स्थलों को संग्रहालयों, विज्ञान अकादमियों, प्रयोगशालाओं और कला विद्यालयों में बदल दिया जाना चाहिए ताकि उनका जनता की भलाई के काम में इस्तेमाल हो सके। प्रकृति ने बार-बार दिखलाया है और विज्ञान ने बार-बार साबित किया है कि कोई भगवान नहीं है और धर्म एक परिकथा मात्र है। हालांकि बहुत से लोग, विशेष रूप से दुनिया के अधिक विकसित हिस्सों में, खुद को धर्म के चंगुल से निकालने में कामयाब रहे हैं।
किंतु आज स्थिति इसकी उलट है। जहाँ कहीं भी गरीबी है, सामाजिक असमानताएं हैं, स्त्री-विरोध और बर्बरता है, वहाँ भगवान और पूजा-पाठ पर अतिनिर्भरता देखी जा सकती है। दुनिया भर के पोप, पुजारी, मौलवी और अन्य धार्मिक नेता लोगों की पसीने की कमाई खाते हैं, लेकिन संकट की घड़ी में वे उनका साथ नहीं देते। यदि यह बात साथ न देने तक ही सीमित रहती तो अधिक नुकसान नहीं होता। इसके विपरीत वे लोगों को झूठ और अवैज्ञानिक तथ्यों की घुट्टी पिलाते हैं, बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार करते हैं और समय-समय पर स्त्री-विरोधी फतवे जारी करते हैं। भला ऐसे संस्थान किस काम के हैं? इन सारे धर्मों ने नुकसान पहुंचाने के अलावा सदियों से और किया ही क्या है? महिलाओं के निरंतर उत्पीड़न, दंगे, विभाजन, खून-खराबे और द्वेष फैलाने के अलावा इनकी क्या भूमिका रही है?
लोगों में भगवान के नाम पर जो आस्था बनी है, उसे बदलने की आवश्यकता है। समय आ गया है कि विज्ञान को भगवान का रूप देकर लोगों को संकट की इस घड़ी से उबारने की आवश्यकता है। समय-समय पर डार्विन और कॉपरनिकस ने अपने विकासवाद और अंतरिक्ष-ब्राहांड के सिद्धांतों के माध्यम से भगवान के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए विज्ञान की महत्ता को उजागर किया है। समय रेत की भांति मुट्ठी से फिसलता जा रहा है। इस महामारी के समय हमें यह प्रण लेना होगा कि अधिक से अधिक चिकित्सा केंद्रों की स्थापना की जाए। अधिक से अधिक प्रयोगशालाएँ खुलवाई जाएँ। नर्सों और चिकित्सकों की भर्ती करवाई जाए। चिकित्सा की अलग-अलग शाखाओं जैसे अलोपैथी, होमियोपैथी, नैचुरोपैथी, आयुर्वेद, यूनानी चिकित्सा को बढ़ावा दिया जाए। यदि दुनिया भर के धार्मिक संस्थानों की दानराशि को इस पर खर्च किया जाए तो एक से बढ़कर एक कारनामे देख सकते हैं। रोगों का उपचार अल्लाह, देवता या भगवान नहीं करते, बल्कि डॉक्टर, वैज्ञानिक हमें उनसे छुटकारा दिलाते हैं। हमारी रक्षा अलौकिक शक्तियाँ अथवा एलियन आकर नहीं करते, बल्कि हम ही करते हैं। विज्ञान एक दृष्टिकोण है जो पूर्णतः तार्किकता और प्रायोगिक तथ्यों पर आधारित है। इसीलिए विज्ञान को भगवान बनाने की घड़ी आ गयी है। यही वह भगवान है जो हमें कोरोना जैसे महामारी से बचा सकता है।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

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