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गूँगे भारत के बहरे लोग

संसद में राहुल गांधी ने तमिल भाषा के पक्ष में अपनी आवाज उठाई। उसके प्रति अपनी चिंता व्यक्त की। यह बड़ी प्रसन्नता की बात है कि इस बहाने कम से कम संसद में भाषा की बात तो छिड़ी, वरना आए दिन जात-पात, ऊँच-नीच और धार्मिक संकीर्णताओं में व्यस्त हमारे सांसद इस विषय पर कम ही बात करते हैं। हम सभी जानते हैं कि भाषा भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। अतः अभिव्यक्ति किसी भी भाषा में क्यों न हो उसे सुरक्षा प्रदान करने का दायित्व प्रत्यक्ष रूप से हमारे संविधान और परोक्ष रूप से हमारे संसद का है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के 73 वर्षों बाद भी भारत की अपनी कोई एक राष्ट्रभाषा नहीं है। संविधान की अष्टम सूची में 22 भाषाओं को राष्ट्रीय भाषाओं का दर्जा दिया गया है। किंतु ये सभी भाषाएँ संपूर्ण भारत का एक साथ प्रतिनिधित्व नहीं करती। हिंदी राजभाषा है। राजभाषा का महत्व केंद्र सरकार के कामकाज तक सीमित रहता है। लोग राजभाषा में नहीं राष्ट्रभाषा में बात करते हैं। इसीलिए महात्मा गांधी ने कहा था कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। उनके अनुसार हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है और हिन्दी हृदय की भाषा है। वे हिंदी के इतने बड़े पक्षधर थे कि उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि हिंदुस्तान के लिए देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहाँ हो ही नहीं सकता। इसीलिए वे प्रायः यह कहते हुए पाये गये कि हिन्दी भाषा के लिए मेरा प्रेम सब हिन्दी प्रेमी जानते हैं। उन्होंने हिंदी को राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बताया। उनके अनुसार हिन्दी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।
भारत के महापुरुष हमारे प्यारे बापू राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिंदी को भारत की आवाज बताई। इसके राष्ट्रभाषा न बनने पर देश को गूँगा बताया। हमारे देश की विड़ंबना कहिए या फिर दुर्भाग्य कि जहाँ महात्मा गांधी जैसे महापुरुष की बात को अनसुना, अनदेखा कर दिया गया हो वैसे देश में हमारी बात कौन सुनेगा? जिस तरह रोटी, कपड़ा और मकान हमारी मौलिक आवश्यकताएँ हैं उसी तरह हिंदी को मौलिक भाषा बनाने की आवश्यकता है। आज दुनियाभर के देश जैसे अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, चीन, रूस आदि की अपनी-अपनी राष्ट्रभाषा है और उसके लिए वे मर मिटते हैं, और एक हम हैं जो कि यही निर्णय नहीं कर पाये कि भारत की एक राष्ट्रभाषा क्या होनी चाहिए? आए दिन भाषाओं के नाम पर हम एक-दूसरे पर तलवारें तान लेते हैं। अब ऐसी स्थिति में एक राष्ट्रभाषा का सपना कैसे पूरा हो सकता है? सच तो यह है कि जिस तरह से राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है ठीक उसी तरह से महात्मा गांधी की बातों को अनदेखा, अनसुना करने वाला यहाँ के लोग बहरे नहीं तो और क्या कहलायेंगे? राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने की कल्पना महात्मा गांधी ने की थी। हालांकि महात्मा गांधी गुजराती भाषी थे। अंग्रेजी भाषा में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की थी, परन्तु वे राष्ट्र के विकास में राष्ट्रीय एकता में राष्ट्रभाषा के महत्व को समझते थे और उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के पीछे जो तर्क दिये थे उसमें सबसे मजबूत तर्क देश में हिंदी का व्यापक आधार होना था। गांधी जी का कहना था कि जो भाषा देश में सर्वाधिक बोली या समझी जा सकती है वह हिंदी है, और हिंदी के राष्ट्रभाषा बनने से हिंदी भारत सरकार की भाषा भी बनेगी तथा जन सामान्य राज्यों के विकास में अपना योगदान दे सकेंगे।
संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी संघ की राजभाषा, 344 के अनुसार राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद समिति, 345 के अनुसार राज्य की राजभाषा या राजभाषाओं, 346 के अनुसार राज्य और केंद्र के मध्य पत्रादि के लिए राजभाषा, 347 के अनुसार किसी राज्य की जनसंख्या के किसी भाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा के सम्बन्ध में विशेष उपबंध, 348 के अनुसार उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा, 349 के अनुसार भाषा से सम्बन्धित कुछ विधियाँ अधिनियमित करने के लिए विशेष प्रक्रिया, 350 के अनुसार व्यथा के निवारण के लिए अभ्यावेदन में प्रयोग की जाने वाली भाषा तथा 351 के अनुसार हिंदी का भाषा का प्रचार-प्रसार आदि प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने पर जोर देते हैं। किंतु दुर्भाग्य यह है कि इन्हीं अनुच्छेदों में राजभाषा संबंधी प्रावधानों का मनमाना अर्थ गढ़ने वाले कुछ भाषाविद् हिंदी को घात पहुँचाने का काम करते हैं। महात्मा गांधी ने जब राष्ट्रभाषा के प्रचार का काम शुरु किया था तो उसकी शुरुआत भी दक्षिण और तमिलनाडु से की थी। परंतु तमिलनाडु की राजनीति बहुत हद भाषाओं के ईर्द-गिर्द घूमती रहती है। वहाँ हिंदी भाषा का विरोध करने वालों तमिल के भक्त बनकर वोट बटोरने का काम करते हैं। यदि उन्हें अपनी भाषा के प्रति उतना ही प्रेम है तो क्यों न तमिल को देश की राष्ट्रभाषा बना दे? वे ऐसा नहीं करेंगे। वे जानते हैं कि देश में तमिल बोलने वालों की संख्या सीमित है।
स्व. डॉ. लोहिया ने जब अंग्रेजी हटाओ आंदोलन का सूत्रपात किया था तो उनका भी यह कहना था कि हिंदी और क्षेत्रीय भाषाएँ परस्पर बहनें हैं। राज्यों का काम-काज राज्य भाषा में हो और देश में हिंदी राष्ट्रभाषा के रुप में काम का आधार बने। उनका नारा था, ’’अंग्रेजी में काम न होगा फिर से देश गुलाम न होगा, चले देश में देशी भाषा’’ डॉ. लोहिया अंग्रेजी को साम्राज्यवाद और शोषण की भाषा मानते थे और यह निष्कर्ष तथ्यपरक भी है। देश में अंग्रेजी जानने वालों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम है। फिर भी अंग्रेजी गुलामी की दासतां अब भी हम पर रोब झाड़ रही है। देश के सर्वाधिक कार्यालय अंग्रेजी के बलबूते सामान्यों को नाको चने चबवा रहे हैं। जनसामान्य अंग्रेजी नहीं जानता इसलिए वह आए दिन किसी न किसी के चंगुल में फँस जाता है। अंग्रेजी किसी भाषा का नाम नहीं आज इसे गौरव व प्रतिष्ठा की भाषा के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है।
विश्व की भाषाओं पर विशेष अध्ययन करने वाली एथनोलोग टीम के अनुसार आज विश्व में हिंदी भाषी करीब 70 करोड़ लोग हैं। यह तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। 1.12 अरब बोलने वालों की संख्या के साथ अंग्रेजी पहले स्थान पर है। चीनी भाषा मेंडरिन बोलने वाले करीब 1.10 अरब हैं। 53 करोड़ और 27 करोड़ के साथ स्पैनिश और फ्रेंच का क्रमश: चौथा और पाँचवाँ स्थान है। जबकि भारत की अन्य भाषाएँ जैसे उर्दू 17 करोड़, मराठी 9.5 करोड़, तेलुगु 9.3 करोड़, तमिल 8.4 करोड़ और पंजाबी 8.3 करोड़ की संख्या के साथ क्रमशः 11वें, 15वे, 16वें, 19वें व 20वें स्थान पर हैं। अतः इस दृष्टि से देखा जाए तो हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने का पूरा अधिकार है।
हिंदी को राष्ट्रभाषा क्यों बनानी चाहिए तो इसके समाधान के लिए काफी विचार करने की आवश्यकता है। राष्ट्रभाषा के बिना स्वतंत्रता निरर्थक है। हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है। शंकरराव कप्पीकेरी के अनुसार राष्ट्रनिर्माण रूपी हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। वास्तव में इसका किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है। इसीलिए हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। यह राष्ट्रीय एकता की कड़ी है। इस कड़ी को क्षीण करने वाली विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता को दर्शाता है। अतः इस दासता से मुक्त होने के लिए हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाने की आवश्यकता है। यायावरी के लिए विख्यात राहुल सांकृत्यायन ने अपने व्यावहारिक निजी अनुभवों से यह सिद्ध कर दिखाया कि इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं। देश की एक राष्ट्रभाषा न होने से उसे समय-समय पर अपमानित होना पड़ता है। जबसे हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी है। इसका सम्मान करना भारतीय साहित्य का सम्मान करने के समान है। वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके। आज हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है। डॉ. फादर कामिल बुल्के के अऩुसार संस्कृत माँ, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है। यह चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। बल्कि सभी भाषाओं को अपने में समाहित करने का विशाल हृदय रखती है। यदि देश का विकास चाहते हैं तो हिंदी की उन्नति कामना के लिए पूरी लगन से काम करना चाहिए। यह भाषा भारतीय संस्कृति की आत्मा है। भारतीय साहित्य और संस्कृति को हिंदी की देन बड़ी महत्त्वपूर्ण है।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

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