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स्वास्थ्य सुविधाओं की सुध लो सरकार

कोरोना संकट के बीच बदहाल स्वास्थ्य सुविधाएं, आॅक्सीजन की कमी, जीवन रक्षक दवाइयों का अकाल एवं लचर आपात व्यवस्था पर जेरेबहस लाजिमी है। और हो भी क्यों न। जब देश में राष्ट्रीय आपात जैसी स्थिति बनेगी तो विमर्श होगा ही। लेकिन गौर करें तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 के सुझावों पर अमल हुआ होता तो आज हालात इतने बदतर नहीं होते। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 में स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश, स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं का प्रबंधन, रोगों की रोकथाम और चिकित्सा सुविधाओं को उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया था। प्रति एक हजार की आबादी पर अस्पतालों में दो बिस्तरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ आपात स्थिति से निपटने की हरसंभव तैयारी करने की बात कही गयी। स्वास्थ्य प्रणाली के त्रि-आयामी एकीकरण की परिकल्पना की गयी जिसमें क्रास रेफरल, सह-स्थल और औषधियों की एकीकृत पद्धतियां शामिल की गयी। इस नीति में वित्तीय सुरक्षा के माध्यम से सभी सार्वजनिक अस्पतालों में निःशुल्क दवाएं, निःशुल्क निदान तथा निःशुल्क आपात तथा अनिवार्य स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं प्रदान करने का प्रस्ताव किया गया। लेकिन इस नीति पर अमल नहीं हुआ और नतीजा सामने है। मानवता को भीषण त्रासदी से गुजरना पड़ रहा है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली हो या छोटे-बड़े शहर हर जगह स्वास्थ्य सुविधाएं बदतर हैं। अब सर्वोच्च अदालत को संज्ञान लेते हुए केंद्र एवं राज्य सरकारों को ताकीद करना पड़ रहा है कि जनता को जरुरी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराएं। सच कहें तो स्वास्थ्य नीतियों के प्रति सरकारों की बेरुखी का नतीजा है कि आज भारत अपने पड़ोसी देशों मसलन चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान से स्वाथ्य सुविधाओं के मामले में कोसों पीछे है। भारत की आधी से अधिक आबादी श्वास संबंधी रोगों और फेफड़ों से जुड़ी शिकायतों से ग्रस्त है। प्रतिदिन तकरीबन साढ़े तीन करोड़ लोग डाॅक्टरों के पास स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों के निदान के लिए जाते हैं। इस तरह भारत विश्व की सर्वाधिक बीमारियों का बोझ उठाने वाले देशों में शुमार हो चुका है। आंकड़ों के मुताबिक विश्व की कुल 7.3 अरब की जनसंख्या के मुकाबले भारत की 1.3 अरब की आबादी में सालाना विश्व भर में होने वाली मौतों का 18 प्रतिशत मौतें भारत में होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट से उद्घाटित हो चुका है कि विश्व में असंक्रामक रोगों से मरने वाले लोगों की तादात लगातार बढ़ रही है और उसमें भारत की स्थिति बेहद नाजुक है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में हर वर्ष 1.6 करोड़ लोग कैंसर, मधुमेह और हृदयघात जैसे असंक्रामक रोगों की वजह से मर रहे हंै। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में असंक्रामक रोगों से 30 से 70 साल के बीच मरने वाले लोगों की आशंका 26.1 से बढ़कर 26.2 प्रतिशत हो गया है। तुलनात्मक रुप से यह आंकड़ा दक्षिण एशिया और अफ्रीका के कुछ देशों की तुलना में बेहद खराब है। रिपोर्ट के मुताबिक पी-5 देशों (चीन, फ्रांस, रुस, ब्रिटेन और अमेरिका) में केवल रुस की ही स्थिति (29.2 प्रतिशत के साथ) भारत से अधिक खराब है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने माना है कि असंक्रामक बीमारियों में कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग और सांस लेने में परेशानी संबंधी प्रमुख चार बीमारियां हैं। असंक्रामक रोगों की वजह से भारत ही नहीं विश्व की एक तिहाई आबादी भी मुश्किल में है। उसका कारण यह है कि इन असंक्रामक बीमारियों से निपटने के लिए अभी तक कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं। अच्छी बात यह है कि इस दिशा में पार्टनरशिप टू फाइट क्राॅनिक डिजीज (पीएॅसीडी) ने हाल ही में संकल्प दिशा स्वस्थ भारत की नाम से एक राष्ट्रीय रुपरेखा तैयार की है। इसका उद्देश्य देश में 2025 तक स्वस्थ भारत के संकल्प को हासिल करने में सहयोग देना है। चूंकि भारत में असंक्रामक रोगों से निपटने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है लिहाजा ऐसे में इस ब्लू प्रिंट से राज्यों को स्वास्थ्य संबंधी मामलों को प्राथमिकता देने में मदद मिलेगी। अगर इसे जमीनी शक्ल दिया जाता है तो भारत में हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और मस्तिष्क आघात से मरने वाले लोगों की संख्या कम होगी। हालांकि भारत सरकार असंक्रामक रोगों से निपटने के लिए भारी धनराशि खर्च की जा रही है लेकिन उसके अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिल रहे है। चिकित्सकों का कहना है कि अगर इन बीमारियों पर शीध्र ही नियंत्रण स्थापित नहीं किया गया तो यह बीमारी राष्ट्रीय आपदा का रुप ग्रहण कर सकती है और इससे निपटना आसान नहीं रह जाएगा। सरकार की कोशिश यह है कि 30 वर्ष से ज्यादा उम्र के व्यक्तियों में गैर संचारी रोगों को लेकर ज्यादा से ज्यादा जागरुकता पैदा किया जाय और व्यापक स्तर पर उनका शारीरिक परीक्षण कराया जाए। निःसंदेह यह एक सार्थक कहद होगा। लेकिन जानकर हैरानी होगी कि गत वर्ष सरकार ने 30 वर्ष से अधिक सात करोड़ लोगों के परीक्षण की योजना बनायी लेकिन अभी तक उस दिशा में दो कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सका है। अगर इस योजना को आकार दिया जाए तो देश की एक बड़ी आबादी को स्वास्थ्य के प्रति जागरुक करने में मदद मिलेगी। भारत के महापंजीयक द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा जा चुका है कि देश के 35 से 64 वर्ष के आयु वर्ग के लोगों में 42 फीसदी मौत की वजह असंक्रामक रोग है। अगर इन रोगों के लक्षणों को समझ लिया जाय तो इस पर नियंत्रण पाने में आसानी होगी। ऐसा माना जाता है कि असंक्रामक रोगों का जितना जल्दी इलाज शुरु होता है वह उतना ही लाभकारी होता है। सरकार को चाहिए कि वह असंक्रामक रोगों की दवाइयों की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण लगाए। सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक सुधार के लिए शहरों के साथ-साथ गांवों पर ज्यादा फोकस बढ़ाना चाहिए। इसलिए कि असंक्रामक रोगों से मरने वालों की ज्यादा तादाद गांवों में है। गांवो में स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढ़ांचा पूरी तरह चरमराया हुआ है। गांवों में स्थापित अस्पताल जर्जर हैं। न तो वहां डाॅक्टर हैं और न ही दवाइयां। ऐसी स्थिति में भला असंक्रामक रोगों से कैसे निपटा जा सकता है। विडंबना यह है कि गांव के लोगों को तब तक असंक्रामक रोगों के बारे में जानकारी नहीं होती जब तक कि वह पूरी तरह उसके चपेट में नहीं आ जाते है। जब तक उन्हें अपनी बीमारियों के बारे में जानकारी मिलती है तब तक बीमारियां गंभीर रुप धारण कर चुकी होती हंै। चूंकि गांवों में इन रोगों के इलाज की बेहतर सुविधा नहीं है लिहाजा उन्हें शहर की ओर रुख करना पड़ता है। उचित होगा कि सरकार गांवों में बेहतर और सस्ता इलाज की सुविधा उपलब्ध कराए ताकि लोगों को असामयिक मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सके। निःसंदेह पिछले कुछ वर्षों में कैंसर जैसी घातक बीमारियों के उपचार में नई तकनीक और दवाइयां ईजाद हुई हैं लेकिन ये इतनी अधिक महंगी हैं कि आमलोगों की पहंुच से बाहर हैं। यहां ध्यान देना होगा कि नशाखोरी विशेष रुप से तंबाकू और शराब के कारण भी बीमारियां बढ़ रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि तंबाकू के सेवन से प्रतिवर्ष 60 लाख लोगों की मौत होती है और तरह-तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ता है। स्वीडिश नेशनल हेल्थ एंड वेल्फेयर बोर्ड और ब्लूमबर्ग फिलांथ्रोपिज की रिसर्च से भी उद्घाटित हो चुका है कि धुम्रपान से हर वर्ष 6 लाख से अधिक लोगों की मौत होती है। मरने वालों में तकरीबन 2 लाख से अधिक बच्चे और युवा होते हैं। अब शराब पर भी रोक लगाने की मांग तेज हो रही है। यह तथ्य है कि हर वर्ष हजारों लोगों की मौत शराब पीने और उससे उत्पन होने वाली बीमारियों की वजह से होती है। आज जरुरत इस बात की है कि भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं गंभीर बीमारियों से निपटने के लिए समन्वित रुप से असरकारक कार्यक्रम तैयार करें। इसलिए कि गंभीर बीमारियों का बढ़ता दायरा न सिर्फ जिंदगी को मौत में बदल रहा है बल्कि सामाजिक व आर्थिक विकास कार्य में भी विध्न डाल रहा है।

 

अरविंद जयतिलक

 

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