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क़ुदरत की सबसे बड़ी नेमत माँ

‘माँ’ कहने को तो यह बहुत-ही छोटा शब्द है, पर
अपने अंदर यह समंदर की गहराई समेटे हुए है।
माँ शब्द के मायने बहुत ही गहरे है। चाहे कितना भी कुछ कह दूं या लिख दूँ इसे सही से परिभाषित करने में खुद को असमर्थ पाती हूँ। ‘माँ’ एक जादुई शब्द है, जो अपने-आप मे एक दुनिया समेटे हुए है। माँ, कुदरत की वह अनमोल कृति है, जिसके गोद में सर रखकर हम सारी थकान भूल जाते है, जिसके आँचल में हमे हरपल दुनिया की हर धूप में से हमे बचाती है, जिसकी मुस्कान हमारे सारे गम भूला देती है । जो दुनिया की सारी बालाएं अपने सर लेकर हर बुरी नज़रों से हमे दूर रखती है।

इस धरती पर खुदा की सबसे बड़ी नेमत है माँ। किसी ने सच ही कहा है “रब हर जगह नही हो सकते इसलिए उन्होंने मां को बनाया”। माँ, खुदा का दिया वह अनमोल तोहफा है, जो बिना हमारे कुछ बताए भी हमारी मन की सारी बातें जान लेती है, जिसने परवरिश देने का कोई प्रशिक्षण नही लिया, लेकिन उनके परवरिश का तरीका सबसे बेहतर है। वो हमे दुनिया के हर तकलीफ से हमे दूर रखती है। कई बार खुद आधा पेट खाकर हमारा पेट भरती है तो कई बार खुद गीले बिस्तर पर सोकर हमारी नींद पूरे करवाती है। हमेशा, दिन-रात की परवाह किये बिना , घड़ी की काँटों की तरह अनवरत चलते रहती है। फिर भी, उसके लब पर कोई शिकायत नही होती। बिना चेहरे पर कोई शिकन लाए वह सबकी फ़रमाइशें पूरी करती रहती है।

हमारे जीवन की पहली शिक्षिका मां ही होती है । हमारे अंदर सुसंस्कार का बीज सर्वप्रथम परिवार में पड़ता है और इसमें माँ की भूमिका सबसे अहम होती है। वो हमे सही-गलत में भेद करना सिखाती है । वह हमारी सबसे बड़ी हमदर्द और सबसे अच्छी साथी होती है। उनका साथ हमे बड़े से बड़े तूफ़ान का सामना करने के योग्य बनाता है। माँ एक सच्ची मार्गदर्शक के रूप में हमेशा हमारे साथ रहती है। वह हमें सही और ग़लत में अंतर करना सिखाती है। वह त्याग की प्रतिमूर्ति होती है। अपने बच्चों के लिए वह अपनी बड़ी से बड़ी खुशियाँ भी क़ुर्बान कर देती है। अपने औलाद की बेहतरी के लिए वह खुशी-खुशी सारे त्याग कर जाती है। जब भी कभी कोई मुसीबत पड़ती है उस वक़्त हमारी रक्षा को वह ढाल बनकर हमारे सामने खड़ी हो जाती है।

आज के बदलते वक़्त के साथ उनकी ज़िम्मेदारियाँ भी बढ़ी हैं। पहले संयुक्त परिवार होने के कारण बच्चों की परवरिश सारे लोग मिल-जुल कर करते थे मगर आज के समय में बढ़ती जरूरतों की मांग ने एकल परिवार को बढ़ावा दिया है, जिसके वजह से ज्यादातर महिलाएं नौकरीपेशा होने के वजह से घर और बाहर दोनों की दोहरी ज़िम्मेदारियां निभा रही हैं। दोहरी ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबकर वह खुद के लिए समय नही निकाल पाती। परिणामस्वरूप कई तरह की बीमारियां , मसलन अवसाद, एनीमिया आदि की चपेट में आ जाती हैं। हमे भी चाहिए कि उनके मन को समझें, उनकी इज़्ज़त करें। कई बार सबकी खुशियों और फरमाइशों को पूरा करते-करते वह खुद की स्वास्थ्य के साथ भी समझौता कर जाती हैं, जो कि गलत बात है। इसलिए हमें भी चाहिए कि उनका खयाल रखें। चाहे कितनी भी व्यस्त दिनचर्या हो , वक़्त निकाल कर उनसे बाते करें, उनकी पसंद-नापसन्द को जाने। उनके साथ वक़्त बिताए। उन्हें कभी भी अकेला महसूस न होने दे। बीच-बीच मे उनके लिए कुछ ऐसा भी करे कि उन्हें खास महसूस हो। कुछ भी करके उनके त्याग और ममता का कर्ज नही उतारा जा सकता मगर अपने छोटे-छोटे प्रयासों से हम उनकी ज़िंदगी मे खुशियाँ बना कर जरूर रख सकते हैं।

मोनिका राज

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