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गुरु नानक ने इंसानियत को दुनिया का सबसे बड़ा धर्म बताया

सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव की 550 वीं जयंती देश और दुनिया में भारी उत्साह के साथ मनाई जा रही है। गुरु नानक देव की जयंती उनके अनुयायी उत्सव के रूप में मनाते हैं। यह त्योहार न केवल भारत में बल्कि ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका सहित संसार के बहुत से देशों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। उनके जन्मदिन को सिख धर्म के लोग प्रकाश पर्व के तौर पर मनाते हैं जो कि इस साल 12 नवंबर को है। इस अवसर पर करतारपुरा कॉरिडोर शुरू होने से सिखों में दोहरी खुशी का संचार हो रहा है। अब सिख संगत गुरु नानक देवजी के पाकिस्तान के नरोवाल जिले के गांव करतारपुर स्थित गुरुद्वारा करतारपुर साहिब के दर्शन करने जा सकेंगे। प्रकाश पर्व पर दुनियाभर में गुरुद्वारों को सजाया गया है और वहां लगातार भजन – कीर्तन चल रहे हैं। गुरु नानक का जन्म कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा 1526 ई में हुआ था। इसी कारण है हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा को प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है।
महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानन्द सहित अनेक महापुरुषों ने कहा था आप अहंकार छोड़ दीजिये, सुखों की अनुभूति होना प्रारम्भ हो जाएगा। धर्मपुस्तक, देवालय और प्रार्थना की कोई आवश्यकता नहीं, यदि हमने अहंकार त्याग दिया है। गुरु नानक देव की शिक्षा का सार भी यही था अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है। इसलिए अहंकार कभी नहीं करना चाहिए बल्कि विनम्र होकर सेवाभाव से जीवन गुजारना चाहिए। मगर आज हम अपने महापुरुषों के बताये मार्ग पर न चलकर अपने मन और भाव में अहंकार पाले हुए है जो समाज और राष्ट्र को पतन के मार्ग की ओर धकेल रहा है। हमारे साधु संतों ने सदा सर्वदा समाज को भलाई का मार्ग दिखाया था। इसी परम्परा का निर्वहन करते हुए गुरु नानक देव ने समाज को झूठ, प्रपंच और अहंकार को त्याग कर सामाजिक एकता इंसानियत और भाईचारे का पाठ पढ़ाया था।
सुख और दुःख पर गुरु नानक देव के विचार बहुत स्पष्ट और अनुकरणीय है। नानक देव का कहना था इस सृष्टि में दुख ही दुख व्याप्त है। कुछ लोग अपने आप को सुखी समझते हैं, लेकिन देखा जाए तो वे भी किसी न किसी दुख से दुखी हैं। गुरु नानक का यह कथन न केवल शाश्वत सत्य अपितु अजर अमर है। आज भी हमारा समाज दुखों के महासागर में गोते खा रहा है। अमीर से गरीब तक समाज का हर तबका किसी न किसी कारण दुखी है।
गुरु नानक देव ने ही इक ओंकार का नारा दिया यानी ईश्वर एक है। ईश्वर सभी जगह मौजूद है। हम सबका पिता वही है इसलिए सबके साथ प्रेमपूर्वक रहना चाहिए। उनका कहना था किसी भी तरह के लोभ को त्याग कर अपने हाथों से मेहनत कर और न्यायोचित तरीकों से धन का अर्जन करना चाहिए। कभी भी किसी का हक नहीं छीनना चाहिए बल्कि मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से जरूरतमंदों की भी मदद करनी चाहिए। धन को जेब तक ही सीमित रखना चाहिए। उसे अपने हृदय में स्थान नहीं बनाने देना चाहिए अन्यथा नुकसान हमारा ही होता है। स्त्री-जाति का आदर करना चाहिए। गुरु नानक देव, स्त्री और पुरुष सभी को बराबर मानते थे। तनाव मुक्त रहकर अपने कर्म को निरंतर करते रहना चाहिए तथा सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। संसार को जीतने से पहले स्वयं अपने विकारों और बुराईयों पर विजय पाना अति आवश्यक है।
इनके उपदेश का सार यही था कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिये हैं। मूर्तिपूजा, बहुदेवोपासना को अनावश्यक कहते थे। हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके विचार का प्रभाव था। कुछ लोगों ने तत्कालीन शासक इब्राहीम लोदी से नानक देव की शिकायत की। जिस पर नानक देव को कारावास में डाल दिया गया। पानीपत की लड़ाई में जब इब्राहीम हारा और बाबर के हाथ में राज्य गया तब कारावास की यंत्रणा से रिहाई मिली। गुरुनानक का व्यक्तित्व असाधारण था। उनमें पैगम्बर, दार्शनिक, राजयोगी, गृहस्थ, ,सुधारक, कवि, संगीतज्ञ, देशभक्त, बंधुत्व आदि सभी के गुण विद्यमान थे। उनमें विचार-शक्ति का अपूर्व सामंजस्य था। उन्होंने पूरे देश की यात्रा की। लोगों पर उनके विचारों का बहुत प्रभाव पड़ा। उनकी रचना जपुजी का सिक्खों के लिए वही महत्त्व है जो हिंदुओं के लिए गीता का है।
गुरु नानक सन् 1539 ई॰ में अमरत्व को प्राप्त हो गए। परन्तु उनके उपदेश और शिक्षा अमरवाणी बनकर हमारे बीच उपलब्ध हैं जो आज भी हमें जीवन में अहंकार त्याग कर सादा जीवन और उच्च विचारों को अपनाने लिए प्रेरित करती हैं ।

– बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
क्.32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218

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