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हास्य-व्यंग्य : चलो सेमिनार-सेमिनार खेलते हैं…

मेरे एक अच्छे मित्र हैं। ऊँचे पद पर काम करते हैं। उनकी पत्नी भी काफ़ी पढ़ी-लिखी हैं। शिक्षण के क्षेत्र में कार्यरत हैं। दोनों के प्रति मेरे हृदय में सम्मान की कोई कमी नहीं है। वे भी मुझे उसी सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। हुआ यूँ कि एक दिन मेरे मित्र ने वाट्सएप, फेसबुक समूहों के माध्यम से पत्नी के महाविद्यालय में आयोजित होने वाले सेमिनार की सूचना दी। सेमिनार का विषय साहित्यिक कम व्यक्ति विशेष अधिक था। अब मैं आपको क्या बताऊँ? सेमिनार जिस व्यक्ति पर था उसकी प्रासंगिकता कुछ वर्षों पहले तक कुछ खास नहीं थी। इस बीच उसके सितारे क्या चमके, वह फर्श से अर्श पर पहुँच गया। इसे संयोग कहें या प्रासंगिकता, वह व्यक्ति अब इस सेमिनार का मुख्य विषय बन चुका था।
मुझे सेमिनार के विषय से आपत्ति थी। यह आपत्ति एक क्षण या एक दिन की नहीं बल्कि कई महीनों के घटनाक्रम के कारण थी। चूँकि वे मेरे अच्छे मित्र हैं, सो मैंने सोचा क्यों न फोन कर विषय चुनने का कारण ही पता लगा लूँ। मैंने फोन किया। संबोधन की औपचारिकताओं के बाद असली मुद्दा उठा। मैंने पूछ ही लिया कि क्या यह विषय साहित्यिक दृष्टि से उपयोगी है? इस पर मेरे मित्र ने कहा कि जिस व्यक्ति विशेष पर यह सेमिनार हो रहा है उनकी लिखी कई पुस्तकें हैं। यह सूची हमें उस व्यक्ति विशेष पर किए गए पीएच.डी. शोधों से प्राप्त हुई है। काफी सोचने-समझने के बाद ही विषय का चयन हुआ है। हम काफी आश्वस्त हैं। यदि आपको कोई आपत्ति है तो आप अपना शोध प्रपत्र प्रस्तुत कर जता सकते हैं। मित्र की बातों से मैं दुविधा में पड़ चुका था। मुझे यह समझ में नहीं आ रहा था कि सेमिनार के लिए विषय चुना गया है या फिर विषय के लिए सेमिनार। जो भी है, मैंने भी सभी लोगों की तरह मित्र को सेमिनार की सफलता के लिए आशा व्यक्त करते हुए फोन काट दिया।
अब सवाल यह उठता है कि क्या किसी एक व्यक्ति द्वारा कई पुस्तकें लिखा जाना सेमिनार आयोजन करने का मापदंड हो सकता है? अगर यही मापदंड है तो मुक्तिबोध जैसे लेखकों पर सेमिनार होना ही नहीं चाहिए। जबकि सच्चाई यह है कि मुक्तिबोध पर देश-विदेश में असंख्य सेमिनार, कार्यशालाएँ, शोध आदि हुए हैं, हो रहे हैं और होंगे। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण था कि मुक्तिबोध के जीवनकाल में उनकी कविता की कोई किताब नहीं प्रकाशित हो पाई। उनके जीवित रहते उनकी सिर्फ एक किताब छपी, वह थी ‘एक साहित्यिक की डायरी।’ उनकी कालजयी रचनाएँ ‘जैसे चाँद का मुँह टेढ़ा’ तथा ‘अँधेरे में’ तो अचेतावस्था में प्रकाशित हुई थीं। अतः मेरे मित्र का यह कहना कि फलाँ व्यक्ति की लिखी हुई कई सारी पुस्तकें हैं, यह सेमिनार आयोजन का मापदंड कतई नहीं हो सकता। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि जिस किसी व्यक्ति विशेष या विषय पर सेमिनार आयोजित किया जाता है, में इन बातों का अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि क्या विषय साहित्यिक कोटि का है? क्या उसमें साहित्यिक गुणवत्ता है? क्या ऐसा साहित्य सच्चे अर्थों में समाज को संबोधित कर सकता है? मेरे मित्र ने फोन पर मुझसे पूछा था कि किसी को साहित्यकार कहने का मापदंड क्या होना चाहिए? तो मैं उन्हें जवाब में यह उद्धरण देना चाहता था- “साल 2008 में भारतीय ज्ञानपीठ ने जब मुक्तिबोध की एक कृति ‘विपात्र’ छापी तो उसके परिचय में लिखा- लघु उपन्यास, या एक लम्बी कहानी, या डायरी का अंश, या लम्बा रम्य गद्य, या चौंकाने वाला एक विशेष प्रयोग- कुछ भी संज्ञा इस पुस्तक को दी जा सकती है, पर इन सबसे विशेष है यह कथा-कृति, जिसका प्रत्येक अंश अपने आप में परिपूर्ण और इतना जीवन्त है कि पढ़ना आरंभ करें तो पूरी पढ़ने का मन हो, और कहीं भी छोड़ें तो लगे कि एक पूर्ण रचना पढ़ने का सुख मिला।” इसी प्रकार उपन्यास सम्राट प्रेमचंद ने कहा था- “साहित्य का उद्देश्य जहाँ आनन्द का स्रोत बन जाता है, वहीं वह साहित्य हो जाता है। जिज्ञासा का सम्बन्ध विचार से है, प्रयोजन का सम्बन्ध स्वार्थ-बुद्धि से। आनन्द का सम्बन्ध मनोभावों से है। साहित्य का विकास मनोभावों द्वारा ही होता है । एक दृश्य या घटना या काड को हम तीनो ही भिन्न- भिन्न नजरो से देख सकते है । हिम से ढंके हुए पर्वत पर ऊषा का दृश्य दार्शनिक के गहरे विचार की वस्तु है, वैज्ञानिक के लिए अनुसन्धान की, और साहित्यिक के लिए विह्वलता की। विह्वलता एक प्रकार का आत्म-समर्पण है। यहाँ हम पृथक्ता का अनुभव नही करते । यहाँ ऊँच-नीच, भले-बुरे का भेद नहीं रह जाता।“
आजकल सेमिनार के नाम पर ‘कुछ भी’ चल रहा है। अब तो कभी-कभी लगता है कि सेमिनारों के लिए महीने के दिन कम पड़ने लगे हैं। स्थिति ऐसी होती है कि एक ही दिन दो-दो-तीन-तीन जगह सेमिनार होते हैं। सेमिनार न हुआ कि कुंभ का मेला हो गया। अब देखिए न हमारे मित्र ने जिस व्यक्ति विशेष पर सेमिनार का प्रचार-प्रसार किया उस व्यक्ति की डिग्री ही फर्जी है। पता चला कि जो डॉक्टरेट की डिग्री मिली है वह हॉनररी है। डिग्री तो दूर साहब जिस विश्वविद्यालय से यह डिग्री दी गयी वह विश्वविद्यालय ही फर्जी है। इसका पता एक आरटीआई के द्वारा लगा। हमारे मित्र ने इस बात को अधिक तवज्जो नहीं दी। मैंने एक जगह फर्जी डिग्री की दिल को छू लेने वाली कहानी पढ़ी थी, जिसका सार था- स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कई राजाओं को प्रजातंत्र रास नहीं आया। चूँकि वे अशिक्षित थे, सो उन्हें शिक्षा का मूल्य पता नहीं था। किसी ने उन्हें बताया कि फलाँ डिग्री खरीद लेने से आप फलाँ डिग्रीधारी कहलाएँगे। आपको नाम-सम्मान मिलेगा। फिर क्या था, ऐसे ही एक राजा ने घोड़े पर सवार होकर डिग्री विक्रेता के पास से डिग्री खरीद ली। उसे लगा कि अब वह फलाँ डिग्रीधारी हो गया। वह फूला न समा रहा था। जबकि दूसरी ओर राजा को यह भी लगा कि वह तो शिक्षित हो गया लेकिन घोड़ा अनपढ़ ही रह गया। वह फिर से डिग्री विक्रेता के पास जाकर अपने घोड़े के योग्य डिग्री की माँग करता है। इस पर डिग्री विक्रेता जो जवाब देता है वह आज के समाज के लिए करारा तमाचा है। वह कहता है, “यह डिग्री घोड़ों के लिए नहीं साहब गधों के लिए है।” अब आप ही बताइए जिस व्यक्ति विशेष की डिग्री ही फर्जी है उसकी रचनाओं (यदि उसने लिखी हैं तो) में साहित्य की खोज रूई की थान में सूई ढूँढ़ने के बराबर है।
कुल मिलाकर मैं यही कहना चाहता हूँ कि सेमिनार के नाम पर विषयों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए। ऐसा न हो कि सेमिनार मात्र नामधारी रह जाएँ और ज्ञान और बुद्धि वृद्धि के नाम पर सामने वाले को चूना लगाया जाए। आजकल सेमिनार के नाम पर जो रुपये ऐंठे जा रहे हैं उसके उपयुक्त न्याय करने की आवश्यकता है। इसके विपरीत मुख्य अतिथि, वक्ता के साथ फोटोबाजी, चाय-नाश्ता, देख-दिखावा करना आजकल सफल सेमिनार के सूचक माने जाते हैं। वास्तव में सेमिनार व्यावहारिक कार्य की श्रेणी में आते हैं। वे निर्धारित विषयों पर प्राप्त ज्ञान को व्यवस्थित, गहरा और समेकित करने के लिए तैयार किए जाते हैं। एक सेमिनार पाठ के पाठ्यक्रम में सक्रिय भागीदारी के साथ, एक छात्र, शोधार्थी, शिक्षक उपलब्ध जानकारी के व्यावहारिक अनुप्रयोग के कौशल को प्राप्त कर सकता है, व्यक्तिगत गुणों को विकसित कर सकता है और अपने बौद्धिक स्तर में सुधार कर सकता है। इसके अतिरिक्त, व्यावहारिक अभ्यास भविष्य के विशेषज्ञों के प्रशिक्षण का एक अभिन्न अंग हैं, क्योंकि वे भविष्य में पेशेवर गतिविधियों को पूरा करने के लिए अपरिहार्य रूप से बुनियादी सैद्धांतिक अनुभव प्राप्त करने की अनुमति देने में सहायक होते हैं।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
(https://google-info.in/1132142/1/डॉ-सुरेश-कुमार-मिश्रा-उरतृप्त.html)

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