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हंसी, ठिठोली, राग-रंग, हुल्लड़ और मौजमस्ती का त्योहार है होली

होली हंसी, ठिठोली, मजाक, रंग-राग, आनंद-उमंग, दिल्लगी और हुल्लड़ का त्योहार है। होली का पर्व हो और मौजमस्ती ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। होली और हास्य-मस्ती का चोली-दामन का साथ है। होली का पर्व समसामयिक मुद्दों पर कटाक्ष और व्यंग्य सहित मनोरंजन का एक विशेष साधन है। हर कोई इस रंग में सरोबार होना चाहता है। इस दिन किसी के हाथ में पिचकारी है तो कोई बाल्टी में रंग भरकर उड़ेल रहा है। कोई ढोल-नगाड़े लेकर मस्ती में सराबोर है तो कोई अपनी ही धुन में नाचता नजर आता है। सब अपनी अपनी मस्ती में सराबोर होते है। होली त्योहारों का त्योहार है। खूब मौज-मस्ती होती है इस दिन। न कोई बड़ा और न कोई छोटा। आप हर किसी के गले मिलते हैं, उसे रंगों से सराबोर करते हैं और उससे वह बात भी कह देते हैं जो आप किसी न किसी लिहाज के चलते साल भर नहीं कह पाते। होली का उत्सव हमें कंक्रीट के जंगल से बाहर निकालता हैं, उमंग और उल्लास को आसमान तक उछालता हैं। काटों में शरारत, फूलों पर खुमार, रंगपर्व ले आया मौसम का उपहार। मौसम का असर ऐसा कि पत्थर दिल भी बहकता है। होली के अजब गजब निराले हैं रंग है कुछ चटख, कुछ फीके तो कुछ बदरंग। बदलते समय के साथ सारी चीजें ही बदल गई हैं। अधिकांश लोगों को तो उत्सव-उल्लास के लिए समय ही नहीं मिलता। कई लोग अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को ढकोसले या पोंगापंथ की संज्ञा देकर, उनसे किनारा कर रहे हैं।
होली राग रंग और मौज मस्ती का बांका त्योहार है। इक्कीसवीं सदी में हास्य व्यंग्य की विधा का नया कलेवर नई दिशा की ओर संकेत कर रहा है। वह समाज की विसंगतियों का आईना है। जनभावनाओं की हसरत नापने के लिये थर्मामीटर का काम करता है। हमारे तथाकथित लोकतंत्र में जितने पाखंड विद्रूप हैं, जितनी विसंगतियाँ हैं, सियासत में छल-प्रपंच का पासा खेला जा रहा है उसका चित्रण करने के लिये गंभीर गाढ़े शब्दों में रचे गये साहित्य की जरूरत नहीं है। बेरोजगारी, जनसंख्या विस्फोट, जाति विद्वेष, धार्मिक उन्मांद के दम घोंटू वातावरण में हास्य व्यंग समाज को ऑक्सीजन देने का काम करता है। इस बहाने समाज का तनाव कम होता है और उसे राहत मिलती है। हास्य व्यंग्य की यह धारा वेदों के जमाने से लगातार हमारे देश मे बह रही है।


होली हमारे लिये सांस्कृतिक और पारंपरिक उत्सव हैै। होली का त्योहार जैसे-जैसे नजदीक आता है वैसे-वैसे लोगों में खिलन्दड़ भाव के साथ एक अनोखा और अद्भुत उन्माद छा जाता है। विशेषकर उत्तर भारत के मैदानी राज्यों में होली बहुत धूमधाम के साथ मनाई जाती है। होली रंग बिरंगा पर्व है। रंग और पिचकारी लेकर युवा निकल पड़ते हैं और एक-दूसरे पर अबीर, गुलाल और रंग डालकर होली मनाते हैं। हर तरफ लोग मस्ती में झूमते व एक दूसरे पर अबीर-गुलाल लगाते व रंगों की वर्षा करते दिखाई देते हैं। यह त्योहार सामाजिक समानता, राष्ट्रीय एकता और अखण्डता तथा विभिन्नता में एकता का साक्षात प्रतीक है। होली मनाते समय जात-पांत, छोटा-बड़ा का भी कोई भेद नहीं होता। अमीर-गरीब, बच्चे, युवा बुजुर्ग सभी मिल-जुल कर यह त्योहार मनाते हैं। होली रंगों के साथ गीत-संगीत और नृत्य का अनूठा त्यौहार है। इसे एकता, प्यार, खुशी, सुख, और जीत का त्योहार के रुप मे भी जाना जाता है। यह हर्षोल्लास परस्पर मिलन व एकता का प्रतीक है । इस पर्व के अवसर पर लोग आपसी वैमनस्य को भुलाकर मित्र बन जाते हैं । यह त्योहार अमीर और गरीब के भेद को कम कर वातावरण में प्रेम की ज्योति प्रज्वलित करता है । निसंदेह होली का पर्व हमारी सांस्कृतिक धरोहर है ।
एक समय था जब देश में फागुन का महीना चढ़ते ही फिजा में होली के रंगीले और सुरीले गीत तैरने लगते थे। महीने भर बाकायदा इनकी महफिलें जमती थीं। गावं से शहर तक ढोल-मजीरे के साथ फगुआ के गीत गाए जाते थे। लेकिन समय की कमी, बदलती जीवनशैली और कई अन्य कारणों से हमारी यह सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपरा दम तोड़ रही है। पहले होली के मौके पर महामूर्ख सम्मेलन आयोजित होते थे और अखबारों में नामी-गिरामी लोगों को उपाधियां दी जाती थीं। अब यह परंपरा भी आखिरी सांसें ले रही है।
इस साल कोरोना वायरस ने होली का रंग फीका करने का प्रयास किया है। रही सही कसर सोशल मीडिया ने निकाल दी है जिस पर हर समय डरावने सन्देश प्रसारित हो रहे है। इसके बावजूद होली का यह बांका पर्व कोरोना पर विजय हासिल कर अपने बांकेपन का एहसास कराएगा ऐसा देशवाशियों को विश्वास है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी .32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 8949519406

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