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पतुरिया

चारपाई पर बैठे ठाकुर देवेन्द्र सिंह ने कल्लू कोरी को पाँच हजार देते हुए अपनी मूछों पर हाथ फेरते हुए विनम्र भाव से कहा-देख, कल्लू फूलन तेरी ही नहीं मेरी भी बेटी है। फिलहाल ये रख, बाकी जो कमी-बेशी होगी, उसे हम पूरी करने के लिए तेरे साथ हमेशा खड़े हैं।’
’हुजूर अभी तो बहुत टेम है, बिटिया की शादी के।’ देवेन्द्र के सामने जमीन पर बैठा कल्लू, लगभग रिरियाते हुए बोला।
’देखते-देखते ही सब टाइम निकल जायेगा कल्लू भैया। तीन महीने होता भी कितना है।… तेरी बेटी, मेरी बेटी है,तू अपनी बेटी की शादी की सारी टेन्शन हम पर छोड़,बस तू प्रधानी का पर्चा भर। खर्चा जो लगे,वो बताना। तू मेरे छोटे भाई जैसा है।’ अपनेपन की घनघोर आत्मीयता बरसाकर ठाकुर साहब चले गये।
कल्लू कोरी के घर कई दिनों से ही गाँव के रईस ठाकुरों का आना-जाना लगा था। वह कल्लू जिसके घर रौब-रूतबे वाले ठाकुरों की परछाई तक न पड़ती थी,जो सीधे मुँह उससे कभी बात न करते थे, वही लोग कल्लू का हाल-चाल जानने के लिए आते और कुछ न कुछ दे कर चले जाते। न चाहते हुए भी,कल्लू को मन मार कर लेना पड़ता। दबंग ठाकुरों के पैसे लौटना या सिरे से मना करना उसकी हैसियत न थी? क्योंकि मजूरी-धतूरी उन्हीं के खेत-खलिहानां में ही करना है। फिर जल में रह कर मगर से बैर आखिर कौन करे? पाँच हजार की ग्राम सभा में मात्र 250 मतदाता दलित थे,बाकी सब स्वर्ण थे,जिसमें ठाकुरों की संख्या सर्वाधिक थी।जिनकी पूरी ग्राम सभा में तूती बोलती थी,यही सब अब तक ग्राम प्रधान होते चले आए थे। पहली बार ग्रामसभा की दलित सीट तय होने से, कल्लू को दलित समुदाय से, खड़े होने के लिए, पूरा-पूरा समर्थन मिल रहा था।.. पर ठाकुरों के आगे क्या उसकी चल पाएगी? क्या उसके पिछड़े समुदाय का भला हो पाएगा? आधी रात के सन्नाटें में बिस्तर पर पड़ा यही सब कल्लू गहनता से सोच-विचार रहा था, तभी गाँव की रामलीला के बाद होने वाली उस नौटंकी का दृश्य,उसकी आँखों के सामने अनायास नाचने लगा,जिसमें रंडी-पतुरिया नाचने के लिए बुलाई जातीं थीं और नाचते हुए उन रंडी-पतुरियों पर, ठाकुर जब नोट लुटाते,तो ठाकुरों की ओर वह सब कामुक नाज-ओ-अदा से ठुमका लगा-लगा कर शुक्रिया अदा करतीं थीं। अब वही रंडियाँ उसकी आँखों के सामने बराबर नाचने लगीं। अब सामने ठाकुर अट्टहास करते हुए उन पर नोट लुटाने लगे। देखते ही देखते, अब उन नाचती हुई रंडियों में वह भी एक रंडी बन चुका था, झूम-झूम कर नाच रहा था, गाँव के दबंग ठाकुर उस पर नोट लुटा रहे थे…अब वह छटपटाने लगा।पसीना-पसीना होने लगा।उसकी हलक सूखने लगी। दिलोदिमाग में अजीब ज्वार-भाटा उठने लगा। फिर खासी बेचैनी से चीखा-मैं रंडी नहीं हूँ-पतुरिया नहीं हूँ।

सुरेश सौरभ

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