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गणतंत्र भारत की खोज में…

“तुमि विद्या, तुमि धर्म
तुमि हृदि, तुमि मर्म
त्वम् हि प्राणा: शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गडी मन्दिरे-मन्दिरे” – बंकिमचंद्र चटर्जी

वंदेमातरम गीत की उपर्युक्त पंक्तियों में भारत की संप्रुभता को विद्या, धर्म, हृदय, मर्म, प्राण, शरीर, शक्ति, भक्ति तथा मंदिर के रूप में पूजा गया है। इसमें हमारे गणतंत्र दिवस की सुगंध दिखाई देती है। हम सभी जानते हैं कि प्रतिवर्ष 26 जनवरी को भारत में गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। वास्तव में गणतंत्र दिवस तो उस शरीर के समान है जो संविधान की आत्मा के बिना निस्तेज है। हमारी गणतंत्रता हजारों जातियों, भाषाओं और सभी धर्मों के लिए कोई सामान्य जिम्मेदारी नहीं थी। डॉ. अंबेडकर ने संविधान का मसौदा तैयार किया, समीक्षा की और दिन-रात संविधान का मसौदा तैयार किया। संविधान सभा ने 2 साल, 11 महीने, 17 दिन की बहस का आयोजन किया। कुल 7600 संशोधन निर्धारित किए गए थे। 2473 संशोधन पर चर्चा हुई। इसे 6 महीने के लिए सार्वजनिक चर्चा के लिए छोड़ दिया गया था। सुझावों को संशोधित किया गया। 30 जुलाई, 1948 से शुरू हुए दूसरे लंबे संवैधानिक सत्र के दौरान इस मसौदे को दूसरी बार पढ़ा गया था।
4 नवंबर, 1948 को, डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा के समक्ष संविधान प्रस्तुत किया। संविधान का मसौदा तैयार करने वाले सर बी.एन. राव ने एस.एन. मुखर्जी को याद किया। मसौदे में 315 लेख थे। 8 अध्याय थे। संविधान ने यह स्पष्ट किया कि संप्रभुता लोगों के पास होनी चाहिए और जनता के प्रतिनिधियों के साथ संसद देश की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार होनी चाहिए। संसद और सुप्रीम कोर्ट को सर्वोच्च दर्जा दिया गया। डॉ. अंबेडकर ने इसे अनुच्छेद 32 को संविधान की भावना बताया। उनके अनुसार देश का विकेंद्रीकरण होना चाहिए ताकि देश बहुत अधिक केंद्रित होने के बोझ के नीचे न दब जाए।
डॉ. अंबेडकर ने कहा, “इस प्रारूप संविधान में 1935 के भारत सरकार अधिनियम के सभी अच्छे पहलू शामिल हैं। यह अनुभवजन्य है। यदि इसे आकस्मिक रुकावटों से अनुमति प्रदान की जाती है तो इसमें संशोधन किया जा सकता है। इसके बावजूद संविधान के लागू होने के बाद स्थिति बिगड़ती है, तो यह संविधान का कारण नहीं होगा, बल्कि यह लागू करने वाले की नीयत का खोट होगा।”
भारतीय संविधान गणतंत्रता की प्रक्रिया का आधारभूत ढांचा है। इसमें अनुसूचित जातियों की सभी इच्छाएँ थीं। आरक्षण के विशेषाधिकार सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े समूहों के साथ-साथ अछूतों के लिए उपलब्ध थे। डॉ. अंबेड्कर ने एक सार्वभौमिक वयस्क मतदान और आरक्षण प्रणाली को अपनाने के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल की मांग की थी।
तीसरा और अंतिम सत्र, जो 14 नवंबर से शुरू हुआ था, संविधान द्वारा पढ़ा गया था। यही वह कन्वेंशन है जो संविधान की पुष्टि करता है। सबने मुक्त कंठ से संविधान व उसके निर्माता की सराहना की। गौरतलब है कि यहाँ डॉ. अंबेडकर की विद्वत्ता की महारत की सराहना नहीं की गई। शुक्र मनाइए कि वह तो टीटी कृष्णमाचारी थे जो संविधान की प्रारूप समिति में सदन को बताया कि संविधान अम्बेडकरवादियों की निष्ठा, कड़ी मेहनत और प्रतिभा से बना है।
आखिरकार, डॉ. अंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को अपनी बात रखी। उन्होंने कहा, “संविधान, जिसे तीन बार पढ़ा गया है, ने सभी सदस्यों की आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित किया है। अब यह सार्वभौमिक संविधान है। लेकिन एक ही समय में मैं एक बात बताना चाहूंगा: संविधान, चाहे संविधान कितना भी उदासीन क्यों न हो, उसका उद्देश्य संविधान लागू करना नहीं है। इतिहास के पन्ने के पलटकर देखेंगे तो पता चलेगा कि भारत ने हर बार अपने विश्वासघात के कारण अपनी स्वतंत्रता खोई थी। हमारे पास ऐसे कई उदाहरण हैं। स्वाभाविक है कि ऐसी घटनाएँ पुनः दोहरायी जा सकती है। देश को तोड़ने वाली ताकतें, जाति और धर्म, संविधान के पारित होने के बाद भी बरकरार हैं। इसके अलावा जब कई राजनीतिक दलों का जन्म होगा तो उनके अपने गुप्त अजेंडे हो सकते हैं। देश को उन राजनीतिक दलों से सावधान रहने की जरूरत है जो गैर-पक्षपाती माने जाते हैं। अन्यथा, भारत की स्वतंत्रता, एकता और संविधान को खतरा होगा। देश की जनता एक व्यक्ति को वे अधिकार नहीं दे सकते जो लोकतंत्र उन्हें देता है। उस व्यक्ति के लिए जितना हमारा सम्मान है, हमें उनके अपराधों में अपने संवैधानिक अधिकारों को नहीं छोड़ना चाहिए। सम्मान और विश्वास अलग हैं। कृतज्ञता, दासता अलग हैं। राजनीति में व्यक्तिगत पूजा के लिए कोई जगह नहीं है। अगर ऐसा होता है, तो लोकतंत्र निरर्थक हो जाएगा। लोकतंत्र के सफल होने के लिए, एक असमान प्रणाली आवश्यक है। कोई उत्पीड़ित, उत्पीड़ित वर्ग नहीं होना चाहिए। सामाजिक व्यवस्था की यह दरार खून की बूँदों को छिपा देती है। सटीक नियमों का पालन करने पर लोकतंत्र को कुचलना संभव नहीं होगा। 26 जनवरी 1950 से हम एक विडंबनापूर्ण जीवन जीने वाले हैं। हमें राजनीति में समानता, समान सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में असमानता मिलेगी। इस विरोधाभास को जल्द से जल्द हल किया जाना चाहिए। अन्यथा, दलितों को संविधान द्वारा प्रदान किए गए अधिकारों को धूल चटा दी जाएगी, जिसे बड़ी दृढ़ता के साथ तैयार किया गया था।“
डॉ. अंबेडकर ने 45 मिनट तक बात की। उसी दिन देश की जनता की ओर से संविधान को अपनाया गया था। ब्रिटिश इंडिपेंडेंस ऑफ इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट, जो 1857 से 1947 तक लागू था, 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। उसी दिन स्वतंत्र भारत गणतंत्र भारत के रूप में उभरकर आया। 15 अगस्त 1947 से 25 जनवरी 1950 तक भारत नियमों से बेलगाम था। किंतु 26 जनवरी 1950 से भारत जाति, धर्म, भाषा, लिंग अन्य सभी आधारों पर सुनियोजित ढंग से समायोजित होकर एक गणतंत्र देश बना।
यह हमारे लिए अत्यंत गर्व की बात है कि गणतंत्र बनने से लेकर आज तक हमने अनेक कीर्तिमान स्थापित किये हैं। किंतु इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि साक्षरता, राष्ट्रीय एकता, सर्वधर्मसमभाव, संगठन और आपसी निष्पक्ष सहभागिता जैसे मुद्दों पर कई बार निस्सहाय स्थिति में दिखाई देते है। आज देश के करोड़ों गरीब उस दिन की प्रतीक्षा में हैं जब वास्तव में उन्हें गणतंत्र देश रूपी वृक्ष के नीचे समानता एवं सन्तुलन की छाया मिल सकेगी। मूलभूत साधनों के फल मिल सकेंगे। आज भी करोड़ों लोग रोटी, कपड़ा और मकान की तलाश में दर-दर ठोकर खा रहे हैं। महिलाओं के प्रति अत्याचार, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, लूटपाट, गिरती आर्थिक स्थिति, महंगाई जैसे कई सवाल हमारे गणतंत्र को चुनौती देते रहते हैं। इन विसंगतियों एवं विषमताओं को दूर करने के साथ−साथ हमें संसद में होने वाले व्यवधान एवं न्यायपालिका में लंबित होते मामले, प्रदूषण, काला बाजारी भी अहम मुद्दे हैं। वास्तव में गणतंत्र की समस्या भी हम हैं और समाधान भी। अतः हमें ऐसे गण का निर्माण करना होगा जो तंत्र की सुख, शांति और समृद्धि के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दे।

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, तेलंगाना सरकार
चरवाणीः 73 8657 8657, Email: [email protected]
https://hi.wikipedia.org/s/glu8

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