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जातिवाद और परिवारवाद से घायल भारतीय राजनीती

जातिवाद और परिवारवाद की बीमारी ने भारतीय राजनीति को चूस चूस कर नारंगी के छिलके की तरह दरकिनार कर दिया है और बर्तमान में भारतीयो के विकास रूपी सपनो का शीशमहल ढह सा गया है और इनके सामने अब समस्याओं का महासागर पड़ा है। सचमुच बुद्ध का भारत आज घायल हो के छटपटा रहा है। विश्व में शांति का संदेस बाँटने वाले अशोक की यह जन्मभूमि आज हिंसा की शोक और जातिवाद और परिवारवाद की राजनीती में डूबी है। नैतिकता नीलाम हो रही है। बौद्धिकता तटस्थाता अपना रही है। जनता हार रही है। नेता नेत धर्म बेच कर भी जात पात और बाप के नाम पर जीत रहे है। दल तो रोज बदलता है लेकिन जाती नहीं क्योकि इससे अपनी जात का वोट कट जाने का डर है। भारतीय विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतांत्रिक देश में परिवारवाद और जातिवाद की कल्पना नहीं की जा सकती है। वर्तमान समय में देश की राजनीति में जो माहौल बना हुआ है। वह लोकतंत्र में ही राजशाही व्यवस्था को जन्म देने वाला गूढ़ अर्थ बता रहा है। देश की राजनीति में कुछ राजनीतिक पार्टियों को छोड़ दिया जाए, तो सभी राजनीति दल अपने और परिवार और जाति को आगे बढ़ाने के लिए लोकतंत्र को ठेंगा दिखाकर राजनीति में परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं।
भारत में विद्यमान जातिवाद ने न केवल यहाँ की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धामिक प्रवृत्तियों को ही प्रभावित किया अपितु राजनीति को भी पूर्ण रूप से प्रभावित किया है । भारत उन देशों में से एक है जहाँ का चुनाव जातिवाद और परिवारवाद के मुद्दों पर होता है और यहाँ की जनता भी इन मुद्दों से अभी भी ऊपर नहीं आ सकी है। जनता को भुनाने में यहां के नेता भी कम माहिर नहीं है ज्योही वक्त मिलता है अपनी जाती को बिच में ला ही देते है। उनको जरा भी विकास की चिंता नहीं है और आदतन चुनाव में उस समय जब हम डिजिटल इंडिया का सपना देख रहे है वही देश की राजनीती में नेता चुनाव को जातिवाद का रूप देने से बाज नहीं आ रहे है। मंच पर जिस रूप में जाति उछला जाता है वो साफ कर चूका है की यहाँ का चुनाव में विकास के मुद्दे पर नहीं बल्की जातिवाद के मुद्दे मुख्य मुद्दों में शुमार है।
आजकल राजनीतिक नेता सत्ता प्राप्त करने के लिए जातीय संगठन उपयोग करते हैं और जातियों के रूप में उनको बना-बनाया संगठन मिल जाता है जिससे राजनीतिक संगठन मे आसानी होती है । राजनीतिक संस्थाएं भी जातिवाद से प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकी परिणामस्वरूप जाति का राजनीतिकरण हो गया । भारत की राजनीति में जाति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । केन्द्र ही नहीं राज्यस्तरीय राजनीति भी जातिवाद से प्रभावित है, जो लोकतान्त्रिक व्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक बात है क्योंकि राष्ट्रीय एकता एवं विकास मार्ग अवरुद्ध हो रहा है । नेताओ को इस समाज को बाँटने वाली राजनीति से आज भारत शर्मिंदा है और शर्म के कारण भारत अपने विकसित होने से आज भी कोसो दूर है। प्रत्येक राजनैतिक दल जातिवाद के सहारे चुनावी वैतरणी पार लगाने की कोशिश करता है। फिर चाहे पर राष्ट्रीय दल हो या क्षेत्रीय। जब चुनाव आते हैं तो जातिवाद की घिनौनी राजनीति शुरू हो जाती है। टिकट मांगने वाले अपनी जेब में जातिवाद के आंकड़े लेकर चलते हैं। राजनीतिक दल भी इसका ध्यान रखते हैं। यही कारण है कि अच्छे लोग चुनाव की राजनीति से दूर धकेल दिए जाते हैं और जातीय आंकड़ों पर खरे उतरने वाले लोगों पर राजनैतिक दल विश्वास जताते हैं।
राजनीती का एक दूसरा काला चेहरा है जिसका नाम हम परिवारवाद दे रहे है। एक जमाना था की राजा का बेटा राजा होता था और देश में लोकतंत्र इस लिए लाया गया कि लोगो का शाशन होगा लेकिन यहाँ भी कुछ खास परिवार के लोग ही राजा बन के ये साबित कर दे रहे है की अब भी कुछ खास नहीं बदला है और राहुल गांधी ,अखिलेश यादव, चिराग पासवान , तेजस्वी जैसे लोग इसके नमूने है जो राजा का बेटा राजा के नियति को चरितार्थ कर के देश को शर्मिंदा करते आये है। यहाँ पे शाषक का चुनाव मत को देख के नहीं बल्कि परिवार को देख के किया जाता है । तभी तो चुनाव के पहले ही घोषित कर दिया जाता है की कौन सीएम होगा, कौन पीएम जबकि संबिधान यह कहती है की चुनाव बाद चुन के आए जन प्रतिनिधि द्वारा संसदीय बोर्ड के अपने बैठक में निर्णय लेगी कि कौन पद के योग्य है। लेकिन अब योग्यता नही बल्कि परिवार देखा जाता है तभी तो देश में ऐसे दर्जनों नेता है जो बाप के नाम पे विधान सभा का टिकट पा लेते है । यह भारतीय राजनीति का नंगा नाच नही है तो और क्या है जहाँ का चुनाव जाती और परिवार विशेष पर होता है। परिवारवाद पनपने का सबसे बड़ा कारण यही है कि पार्टियां अपने जीतने की गुंजाइश बढ़ाने की कोशिश करती हैं। जो कैंडिडेट पहले जीता था उससे जुड़े कैंडिडेट को अगर आगे मैदान में उतारेंगे तो लोग पहचानेंगे. ये क्षेत्रीय स्तर पर पार्टी के लिए फायदेमंद साबित होता है। एक और कारण है कि कि पार्टियां अपने जीतने की गुंजाइश बढ़ाने की कोशिश करती हैं। जो कैंडिडेट पहले जीता था उससे जुड़े कैंडिडेट को अगर आगे मैदान में उतारेंगे तो लोग पहचानेंगे. ये क्षेत्रीय स्तर पर पार्टी के लिए फायदेमंद साबित होता है।
पहले राजनीतिक दल विचारों की नीव पर टिकी होती थी लेकिन अब राजनीति में विचारों का अस्तित्व समाप्त होने पर राजनीतिक दलों ने अपने अस्तित्व के लिए परिवार को आधार बना लिया है। कांग्रेस में नेहरू परिवार का प्रभुत्व था। अतः जो नेता कांग्रेस से विचारों की भिन्नता का बहाना बनाकर अलग हुए, उनके दल परिवार आश्रित हो गये। परिवारवाद के नाम पर नेहरू का विरोध लोहिया ने, इंदिरा गांधी का चरणसिंह ने, चरणसिंह का मुलायम और देवीलाल ने किया; पर आज इन सबके दल निजी दुकान बन कर रहे गये हैं। शरद पवार, उद्धव और राज ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल, ओमप्रकाश चौटाला, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, लालू और मुलायम सिंह यादव, महबूबा मुफ्ती, फारुख अब्दुल्ला, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, चंद्रशेखर राव, चंद्रबाबू नायडू, स्टालिन, केजरीवाल… आदि केवल नाम नहीं, एक राजनीतिक दल भी हैं।
यह देश अब जातिवाद और परिवारवाद से तंग आ चूका है और वक्त आ गया है की अब जनता को इन जात पात में बाँटने वाले और परिवार के ही लोगो को चुनाव लड़ाने वाले लोगो को मजा चखाये और इन्हें हरा कर ईनका मुँहतोड़ जाबाब दिया जाये ताकि ये नेता लोग भी इन ढकोसले मुद्दों से बाहर निकल कर विकास की बात करे और प्रति व्यक्ति आय और जीडीपी को मुद्दा बनाये। वोटरो को भी अब अपनी जिम्मेवारी लेनी चाहिए । जब पूरा विश्व विकास की बात करता है तो यहाँ की जनता जात पात मे ही उलझ के रह गई है। यहाँ की जनता अब भी कुम्भकर्नी निंद्रा नहीं तोड़ी तो यह घायल हिंदुस्तान और घायल होगा, कभी निर्भया कांड से तो कभी प्रियंका कांड से तो कभी तेजाब हमलो से ।
सचमुच होना तो अब यही चाहिए की-
” कागज की नहीं हम काठ की अब नाव चाहते है, जातिवाद से तंग आ चुके है हम विकास चाहते है,
माना कि है हम अपाहिज पर हौसला हैँ हममे- अब बैशाखिया न दीजो हम पावँ चाहते है।”

नृपेन्द्र अभिषेक नृप
स्वतन्त्र टिपण्णीकार

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