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भारतीयों ने लॉकडाउन के दौरान अपने द्वारा किये गये छोटे-छोटे कामों का खुलासा किया 

गोदरेज समूह के हालिया शोध ‘लिटल थिंग्स वी डू’ उन चीजों में पिछले वर्ष के लॉकडाउन के दौरान भारत के सर्जनात्मक और परोपकारी पक्ष को उजागर किया

मुम्बई. गोदरेज समूह के हालिया शोध ‘द लिटिल थिंग्स वी डू’ ने यह खुलासा किया कि महामारी और इसके कारण लगाए गए लॉकडाउन के सीधे परिणाम के तौर पर आधा से ज्यादा भारतीय (52%) पर्यावरण के प्रति जागरूक हुए – साथ ही साथ नये पौधे उगाने, खरीददारी करते और ऊर्जा संरक्षण के प्रति ज्यादा सचेत हुए।

जब पूरा देश नये म्यूटेटेड वायरस और उसके कारण राज्यों के द्वारा लगाए जाने वाले संभावित लॉकडाउन को लेकर ऊहापोह की स्थिति में हो तो यह शोध इस देश के जिम्मेदार नागरिकों और संगठनों को देश के समर्थन में खड़े होने की याद दिलाता है। ‘द लिटिल थिंग्स वी डू’ अध्ययन ने रोज़मर्रा की दिनचर्या, आदतों और हाल भाव का विश्लेषण किया जो हमारे नागरिकों द्वारा 10 महीने के लॉकडाउन के दौरान उनकी जिंदगी को अधिक सह्य बनाने के लिए अपनाए गए। इस अध्ययन ने यह खुलासा किया कि इस दौरान 44% लोगों ने सामुदायिक कार्यों जैसे वॉलेंटियर करने और सुविधाओं से वंचित रहने वाले लोगों की मदद करने का काम किया। 


आंकड़ों के अनुसार, इस तालाबंदी और अन्य प्रतिबंधों ने भारतीयों के रचनात्मक पक्ष को भी उजागर करने का काम किया है। पांच में से एक से ज्यादा भारतीय (22.87%) अब खाना पकाने, चित्रकारी, स्केच बनाने और दूसरे अन्य रचनात्मक शौक को पूरा कर पाने में सक्षम हैं जो उन्हें खुशी प्रदान करती है।  लगभग एक तिहाई (23.19 प्रतिशत) ने लॉकडाउन के दौरान पुस्‍तकें पढ़ने या संगीत सुनने में सुख का अनुभव किया। 

ये निष्कर्ष एस ई एमर श द्वारा रे उस दूसरे शोध के अनुरूप ही हैं जो यह दर्शाता है कि 2020 में फरवरी और मार्च के बीच में “केक को कैसे बेक करना है” जैसे खोज में 238.46% की आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई थी। अप्रैल में ऐसे की-वर्ड्स वाले खोजों की संख्या में 81% की वृद्धि दर्ज की गई और उसके अगले माह में यह बढ़कर 190% तक पहुंच गई। 

देशभर में लागू इस बंदी के दूसरे भी फायदे भारतीय परिवार को हुए। शोध में शामिल 36 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बीच की बड़ी दूरी के समाप्त हो जाने के कारण अपने परिवार के सदस्यों के साथ ज्यादा समय व्यतीत करने का दावा किया जबकि 29% अब पूरे दिन में खुद को तनावमुक्त और जिंदगी और काम के बीच के संतुलन बनाए रखने के लिए नियमित अंतराल पर थोड़ा ब्रेक लेते हैं। 19% ने यह दावा किया कि वे अपने कार्य में ज्यादा सक्षम हैं और भटकाव की अनुपस्थिति के कारण कार्य को आवंटित समय के भीतर पूरा कर पा रहे हैं जबकि 16% लोगों का यह मानना है कि वर्क फ्रॉम होम ने उनके समय प्रबंधन की क्षमता में सुधार किया है।

गोदरेज समूह की एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर और चीफ ब्रांड ऑफिसर, तान्या दुबाश ने इसको बहुत सारे मौकों और, बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में हमारे नागरिकों के स्वभाव में लचीलेपन, परोपकार की भावना और उस परिस्थिति में स्वयं को ढाल लेने की क्षमता के बारे में जानकारी देने वाले एक रोचक और अनोखी अंतर्दृष्टि प्रदान करने वाले शोध के रूप में परिभाषित किया।  उन्‍होंने कहा, “हमारा शोध यह खुलासा करता है कि छोटी चीजें और रोजमर्रा की आदतें लोगों के कल्याण हेतु एक बड़ा अंतर पैदा कर सकता है। महामारी की इस परिस्थिति ने प्रायः नजरअंदाज किये जाने वाले उन संस्कारों और रीति रिवाजों की महत्ता को उजागर किया है जो हमारे समग्र स्वास्थ्य और खुशहाली में एक बड़ी भूमिका निभाते हैं।” 

उन्होंने आगे कहा, ”यह उन नए प्रयासों के सकारात्मक पक्ष को भी उजागर करता है साथ ही लंबे समयावधि से चले आ रहे आदतों का पुनर्मूल्यांकन करता है। 36.16% उत्तरदाताओं ने बुरी आदतों को छोड़ने का दावा किया है जबकि 58.22% अब योग, टहलने और दौड़ने जैसे उन गतिविधियों में संलग्न हो चुके हैं जो उनके मानसिक और शारीरिक फिटनेस को बढ़ावा देने का काम करता है।”

तान्या ने बताया कि लिटिल थिंग्स वी डू’ शोध को इस बात को प्रदर्शित करने की प्रतिबद्धता के साथ पूरा किया गया है कि छोटे छोटे योगदान और उनके कारण होने वाले प्रभाव किस तरह से हमारे जीवन पर एक अमिट छाप छोड़ सकते हैं।

इस शोध से प्राप्त कुछ अन्य तथ्य:

  • 55% उत्तरदाताओं ने छोटी छोटी चीज़ों जैसे सैनिटाइजर, खाने के पैकेट, पुराने कपड़े, कम्बल, स्वास्थ्य संबंधी डिवाइसेज आदि जरूरतमंदों को दान किये 
  • सुविधाओं से वंचित लोगों के लिए 40% लोगों ने वित्तीय दान किये।

 

  • ‘छोटी छोटी चीज़ों’ के बारे में निर्णय लेते हुए पुरुषों और महिलाओं की अलग अलग प्राथमिकताएं हैं:
    • 18.90 महिलाओं की तुलना में 31.74% पुरुष उत्तरदाताओं ने लॉकडाउन के दौरान अपने परिवार को खुश रखने की खातिर उनके साथ समय बिताने को ज्यादा महत्व दिया 
    • 11.97% पुरुषों की तुलना में 32.84% महिलाएं खाना बनाने को आराम और खुशी प्रदान करने वाले स्रोत के रूप में माना 
    • 21.54% महिलाओं की तुलना में 29.23% पुरुषों ने आराम के लिए टीवी चालू किया 

 

  • लॉकडाउन के दौरान सोशल मीडिया ने भी इसे खुशी के स्रोत के रूप में देखा:
    • 46.42% लोग सोशल मीडिया के जरिए अपने दोस्तों और परिवार से जुड़े रहे

    • 23.27% लोगों ने मजेदार मीम्स और वीडियोज देखे और इंस्टाग्राम पर लाइव कंसर्ट में शामिल हुए
    • 19.08% उत्तरदाताओं ने सोशल मीडिया पर कंटेंट बनाते हुए अपने रचनात्मक पक्ष को उजागर किया
    • 11.24% लोगों ने इंफ्लुएंशर्स द्वारा खुद के बनाए गए वीडियो की मदद से खाना बनाना, पेंटिंग इत्यादि जैसा नया कौशल सीखा

 

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