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बंजर भूमि को उर्वर बनाने की पहल

यह स्वागतयोग्य है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की 2.6 करोड़ हेक्टेयर बंजर भूमि को 2030 तक उर्वर बनाने का लक्ष्य सुनिश्चित किया है। उन्होंने वर्चुअल संवाद के जरिए संयुक्त राष्ट्र में मरुस्थलीकरण, सूखा व भूमिक्षरण विषय पर आयोजित उच्च स्तरीय संववाद को संबोधित करते हुए कहा कि भूमि और पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए पूरी मानवता को सामूहिक तौर पर जिम्मेदारी उठानी होगी। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत हमेशा से भूमि को अहमियत देता है और उसके लिए भूमि माता है। प्रधानमंत्री का संबोधन इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि देश की जनसंख्या और अन्न की मांग में तेजी से वृद्धि हो रही है। ऐसे में बंजर भूमि को उर्वर बनाकर दोनों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है। गौरतलब है कि भारत 2030 तक 2.1 करोड़ हेक्टेयर बंजर भूमि उर्वर बनाने का लक्ष्य रखा था जिसे प्रधानमंत्री ने बढ़ाकर 2.6 करोड़ हेक्टयर कर दिया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए रिमोट सेंसिंग और अंतरिक्ष विज्ञान सहित अन्य तकनीकों की सहायता ली जाएगी। विशेषज्ञों के मुताबिक वनारोपण के अलावा जैविक खेती के साथ-साथ माइक्रो इरिग्रेशन, जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग के जरिए भी भूमि की उर्वरता में सुधार लाकर बंजर भूमि को उर्वर भूमि में तब्दील किया जा सकता है। याद होगा गत वर्ष पहले काॅप सम्मेलन में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा था कि मरुस्थलीकरण रोकने के लिए नई दिल्ली घोषणा पत्र का मसौदा तैयार है जिसके जरिए सकारात्मक परिणाम दिखेंगे। उल्लेखनीय है कि विगत पांच वर्षों में हरियाली बढ़ाने के अनुपात में 24 प्रतिशत से अधिक का इजाफा हुआ है जो कि 15 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र है। आने वाले वर्षों में इस लक्ष्य को बढ़ाकर 33 प्रतिशत पर लाना है। एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया में करीब 40 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि है जिसका 29 प्रतिशत बंजर भूमि अकेले भारत में है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों पर गौर करें तो देश में कुल 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर जमीन में से तकरीबन 12 करोड़ 95 लाख 70 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 80 लाख 61 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर है। इसी तरह राजस्थान में एक करोड़ 99 लाख 34 हजार हेक्टेयर, मध्यप्रदेश में दो करोड़ एक लाख 42 हजार हेक्टेयर, आंध्र प्रदेश में एक करोड़ 14 लाख 16 हजार हेक्टेयर, बिहार में 54 लाख 58 हजार हेक्टेयर, कर्नाटक में 91 लाख 65 हजार हेक्टेयर, गुजरात में 98 लाख 36 हजार हेक्टेयर, महाराष्ट्र में एक करोड़ 44 लाख हेक्टेयर, उड़ीसा में 63 लाख 84 हजार हेक्टेयर, केरल में 12 लाख 79 हजार हेक्टेयर, जम्मू-कश्मीर 15 लाख 65 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर है। गौरतलब है कि अहमदाबाद स्थित स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर द्वारा मरुस्थलीकरण को लेकर तैयार किए गए एटलस पर नजर दौड़ाएं तो आज देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का तकरीबन एक-चैथाई क्षेत्रफल बंजर भूमि में तब्दील हो चुका है। साथ ही 30 प्रतिशत से अधिक भूमि की उर्वरता में कमी आयी है। गौर करें तो बंजर भूमि में वृद्धि के कई कारण हैं। मसलन सीमांत और अनुपजाऊ भूमि पर खेती-बाड़ी की घनघोर उपेछा, जंगलों में झाड़ियों को काटना और झूम खेती, खेती तथा जंगली क्षेत्रों में मिट्टी तथ नमी के संरक्षण में कमी, खानें खोदने, बिजली लगाने एवं अन्य औद्योगिक योजनाओं के क्रियान्वयन से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा है और भूमि की उर्वरता प्रभावित हुई है। चिकनी मिट्टी में अधिक सिंचाई, बेतहाशा बढ़ते पशुओं द्वारा अंधाधुंध चराई और जंगल के उत्पादों की बढ़ती मांग ने भी भूमि की उर्वरता में कमी और बंजर भूमि के विस्तार में वृद्धि की है। एक आंकड़े के मुताबिक देश के विभिन्न राज्यों में तकरीबन 10 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में बंजर भूमि का फैलाव है। उत्तरी भारत विशेष रुप से उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली की भौगोलिक क्षेत्रफल पर नजर दौड़ाएं तो यहां बड़े-बड़े मैदान मौजूद हैं जो उपजाऊ तो हैं किंतु पानी की कमी के कारण बंजर भूमि में तब्दील हो चुके हैं। इन इलाकों में अगर बारिश कम या अनियमित रुप से होती है तो बड़े क्षेत्रफल में कृषि नहीं हो पाती है और धीरे-धीरे यह भूमि बंजर होती जाती है। अगर कहीं ऐसी जमीनों के मालिक आर्थिक रुप से कमजोर या गरीब होते हैं तो स्थिति और गंभीर हो जाती है। पानी के अभाव में उनके लिए कृषि घाटे का सौदा बन जाता है। देश के बड़े इलाके में उथली मिट्टी पायी जाती है। उसका कारण यह होता है कि जंगलों में कृषि कार्यों के लिए भूमि का चयन बदलता रहता है और वर्षा ऋतु में धरती की उपजाऊ मिट्टी पानी के साथ बह जाती है। इस प्रकार मिट्टी के निरंतर कटाव के कारण मिट्टी में कंकड़-पत्थर रह जाते हैं जिनमें कृषि करना मुश्किल हो जाता है। राजस्थान की बात करें तो यहां खेतों में रेत के लहरियादार ढ़ेर बन जाते हैं जो कि बहुत ही अधिक अनुर्वर होते हैं और उनमें पानी को रोकने की क्षमता नहीं होती है। गर्मियों में बहुत जल्दी गरम हो जाते हैं और पौधों को नुकसान पहुंचता है। नतीजा यह होता है कि लोगबाग धीरे-धीरे कृषि कार्य करना बंद कर देते हैं और वह भूमि बंजर भूमि में तब्दील हो जाती है। दक्षिण भारत में ऐसी मिट्टियां पायी जाती हैं जिनमें घुलनशील नमक जैसे क्लोराइड, सोडियम सल्फेट, कैल्शियम और मैग्निशियम की मात्रा अधिक होती है। इन्हें लवणीय मिट्टियां कही जाती है। इन मिट्यिों का पीएच मान 8.2 से नीचे रहता है जिस कारण यह पूरी तरह से अनुपजाऊ हो जाती है और कृषि कार्य न करने के कारण धीरे-धीरे बंजर भूमि में तब्दील हो जाती है। ध्यान देना होगा कि मिट्टी के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों को बचाकर ही बंजर होती धरती को हरियाली से लहलहाया जा सकता है। बेहतर होगा कि अधिक पैदावार के लिए केमिकल खादों का इस्तेमाल के बजाए खेतों में अधिक फसल चक्र को तवज्जों दिया जाए। इसलिए कि उर्वरता बढ़ाने के मामले में फसल चक्र काफी लाभकारी साबित होता है। यहां यह भी ध्यान देना होगा कि बंजर भूमि में उर्वरता तभी बनी रहेगी जब मिट्टी के कटाव को रोकने का पुख्ता इंतजाम होगा। यह तथ्य है कि भारत में हर वर्ष तकरीबन 700 करोड़ टन मिट्टी कटाव की वजह से बर्बाद हो जाती है। इसी तरह बाढ़ की वजह से 90 लाख टन पोषक तत्व पानी के साथ बह जाते हैं। कीटनाशकों की वजह से हर वर्ष एक करोड़ 10 लाख वर्ग किमी क्षेत्र की उपजाऊ शक्ति नष्ट हो रही है। जबकि अच्छी पैदावार योग्य भूमि की एक सेंटीमीटर मोटी परत बनने में ढ़ाई सौ से तीन सौ साल लगते हैं। उचित होगा कि भूमि की उर्वरता बनाए रखने के लिए ठोस उपाय हो। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की ही मानें तो देश में बंजर भूमि का 50 प्रतिशत भूमि ऐसी है जिसे वैज्ञानिक तरीके से विकसित कर उर्वर बनाया जा सकता है। गौर करें तो यह भूमि गैर वनेतर भूमि है जो समुचित ढ़ंग से रखरखाव न होने के कारण बंजर हुई है। गौरतलब है कि बंजर भूमि के निवारण के लिए 1992 में केंद्र सरकार ने ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत बंजर भूमि विकास का गठन किया जिसका बाद में पुनर्गठन कर उसका नाम भूमि संसाधन विभाग कर दिया गया। ध्यान देना होगा कि बंजर भूमि के विकास के लिए सबसे पहले बंजर भूमि की पहचान जरुरी है। निजी बंजर भूमि लोगों की अपनी है। लेकिन जितनी भी बंजर भूमि सरकार या सार्वजनिक संस्थाओं के हाथों में है, उनका स्वामित्व स्पष्ट नहीं है। इनमें से कुछ भूमि पर तो लोगों ने नाजायज कब्जा जमा रखा है। इन भूमियों की स्थानीय जांच पड़ताल होनी चाहिए। इस भूमि का इस्तेमाल अनेक कामों में हो सकता है। मसलन सबसे उत्तम काम वनरोपण है। यह पर्यावरण के लिए लाभदायक तो है ही साथ ही ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए रोजगार का साधन भी है।

 

अरविंद जयतिलक

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