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क्या इंदिरा के अक्स से भी डरने लगी है कांग्रेस ..!

मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ का एक परिचय संजय गांधी के परम मित्र औऱ इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे वाला भी है।वही संजय गांधी जिन्होंने दिल्ली के तुर्कमान गेट पर अतिक्रमण हटवाने के लिए बुलडोजर चलवाया।अपनी मित्र रुकसाना सुल्ताना के जरिये मुस्लिम बस्तियों में नसबन्दी का हुक्म बेखौफ होकर तामील कराया।देश की जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए जिनके आदेश पर62 लाख भारतीयों की नसबंदी हुई।20 सूत्रीय कार्यक्रम के अभिन्न हिस्से में शामिल परिवार नियोजन को लेकर आज की कांग्रेस डरी हुई क्यों? पार्टी को डर है मुस्लिम वोट खिसकने का।इस तथ्य को शायद पार्टी भूल गई कि संजय गांधी के नसबन्दी अभियान के बाबजूद अगले आम चुनाव मे पार्टी को 159 सीट मिली थीं।आज यह आंकड़ा 52 है और इससे पहले 44 था।वह भी तब जब उसके पीएम देश के संसाधनों पर मुस्लिमों के पहले हक की वकालत करते है।साम्प्रदायिक लक्षित हिंसा कानून जैसा विधेयक बनाकर लाते है।सवाल यह है कि क्या मौजूदा कांग्रेस में मुल्क की नब्ज टटोलने वाला अब कोई नही रह गया क्या?जिस राष्ट्रीय सोच के साथ इंदिरा गांधी काम करती थी क्या उससे कोई लेनादेना नही रह गया उन्ही की पार्टी का?जनसंख्या नियंत्रण का मुद्दा एक ऐसा ही मामला है जिसे संजय गांधी उस दौर में भारत के लिए चुनौती के तौर पर समझ रहे थे ।फिर आज 45 साल बाद पार्टी इस मुद्दे पर साहस क्यों नही दिखा पा रही है? सुरसा की तरह बढ़ती जनसंख्या की चुनौती भारत के आर्थिक महाशक्ति बनने के सपने को जमीदोज कर रही है।दुखद पहलू यह है कि इस विषय पर कोई राष्ट्रीय सहमति कहीं नजर नही आ रही है। सेक्यूलर सियासी जमात के भय से मौजूदा केंद्र सरकार इस विषय पर निकट भविष्य में कोई कदम उठा पाएगी इसकी संभावना नजर नही आती है।सीएए के विरुद्ध जिस अंदाज में विपक्षी दलों ने देश मे माहौल खड़ा कर दिया है ।उसने केंद्र सरकार को सोचने पर विवश कर दिया है कि ऐसे संवेदनशील मसलों पर कैसे आगे बढ़ा जाए।इस बीच मप्र में जनसंख्या नियंत्रण आदेश को लेकर सरकार और बीजेपी के बीच छिड़ी जंग के बीच राज्य की स्वास्थ्य मिशन संचालक छवि भारद्वाज का अवकाश के दिन आनन फानन में ट्रांसफर कर दिया गया। मिशन संचालक ने राज्य के मैदानी स्वास्थ्य कर्मियों को पुरुष नसबंदी के टारगेट पूरा न करने पर वेतनवृद्धि रोकने के निर्देश दिए थे।पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने इस आदेश को ‘आपातकाल पार्ट दो’ की संज्ञा देकर कमलनाथ पर निशाना साधा था। मामले को तूल पकड़ने से पहले ही सरकार ने इस आदेश को वापिस ले लिया।समझा जा सकता है कि राजनीतिक दल इस विषय पर कैसे जनमत को मतदान व्यवहार के साथ जोड़ने पर उतारू है।असल में धारणा यह बना दी गई है कि जनसँख्या नियंत्रण कानून मुस्लिम विरोधी है।यही कारण है कि कमलनाथ ने इस मामले से कदम वापिस ले लिए।यह जानते हुए भी कि पार्टी के 20 सूत्रीय कार्यक्रम में जनसंख्या नियंत्रण एक महत्वपूर्ण हिस्सा था औऱ पार्टी को संजय इंदिरा युग में इस विषय पर आगे बढ़ने में कोई दिक्कत नही थी।तमाम वैश्विक रिपोर्ट बताती रही है कि अगले कुछ सालों में भारत दुनिया का सर्वाधिक आबादी सम्पन्न देश होगा।मानव विकास सूचकांक के पैमाने पर भारत की मौजूदा स्थिति जो चिंताएं खड़ी करती है उसके मूल में बुनियादी वजह जनसंख्या ही है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 5 ट्रिलियन इकोनॉमी का सपना भारत को दिखाते है लेकिन यह तभी संभव है जब मानव संसाधन के मोर्चे पर उत्पादकीयता जापान या चीन की तर्ज पर सुनिश्चित की जाए।
यूएनडीपी भारत यूनिट के निदेशक फ्रांकाईन पिकप के अनुसार शिक्षा, स्वास्थ्य,रोजगार और पोषण पर भारत को बुनियादी रूप से बृहत काम की आवश्यकता है।जाहिर है चुनौती बेहद कठिन है खासकर गरीबी,भूख और स्वास्थ्य के मोर्चे पर सरकारी प्रयास परिणामोन्मुखी नही रहे है।जनसँख्या नियंत्रण ही एक ऐसा उपाय है जिसे मजबूत इच्छाशक्ति से अपनाकर भारत को मानव विकास सूचकांक में ऊपर लाया जा सकता है।कमलनाथ यह काम मप्र से शुरू कर सकते है लेकिन उन्होंने शिवराज की धमकी से कदम वापिस ले लिए।जबकि उन्हें खुद शिवराज सिंह से सवाल करना था कि स्वर्णिम मप्र का जो आंदोलन उन्होंने सीएम रहते चलाया था वह कैसे पूरा होगा?
बेहतर होता मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री इस मामले मे अपनी विफलता को स्वीकार करते और इस मामले पर कमलनाथ को युक्ति युक्त समर्थन का एलान करते। कमलनाथ भी इसे विमर्श का विषय बना सकते थे लेकिन उन्होंने तुष्टिकरण की गली पकड़ना बेहतर समझा।यह सही है कि संजय गांधी के नसबंदी अभियान का व्यापक दुरुपयोग भी हुआ।2 हजार लोग उस समय जबरिया नसबंदी के चलते मारे गए थे।कतिपय कांग्रेस नेताओं और अफसरों ने इस अभियान के जरिये विरोधियों को निशाने पर लिया।लेकिन यह भी तथ्य है कि अगर उस समय इस अभियान को निष्पक्षता औऱ सहमति के साथ चलाया जाता तो आज का भारत जनसंख्या की इस अनुत्पादकीय त्रासदी से पीड़ित न होता।यह भी एक सुनियोजित चुनावी जुमला है कि जनसंख्या नियंत्रण केवल मुस्लिमों तक सीमित है हकीकत तो यह है कि भारत की दलित,आदिवासी वर्ग में आज भी परिवार नियोजन का विचार कारगर नही है।तमाम रिपोर्ट बताती है कि गरीब और अशिक्षित हिन्दुओं में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है।सर्वाधिक कुपोषण औऱ भूख जनित रोगियों की संख्या हिंदुओ के बीच है।इसलिये यह डर खड़ा किया जाता रहा है कि जनसंख्या नियंत्रण केवल मुसलमान आबादी को सीमित करने के लिये है।असल मे 1977 के बाद से भारत में जिस तेजी से अल्पसंख्यकबाद की राजनीति हावी हुई है उसने राष्ट्रीय महत्व के सभी विषयों को पीछे धकेल दिया है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि स्वाभाविक शासक दल यानी कांग्रेस इस विमर्श औऱ आचरण की अगुआ बन गई है।उन तथ्यों को भूलकर जो कभी इंदिरा गांधी के सशक्त हथियार हुआ करते थे।

डॉ अजय खेमरिया

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