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झुनझुनाहट या सुन्नापन कहीं कार्पल टनल सिन्ड्रोम तो नहीं

विजय न्यूज़ ब्यूरो
नई दिल्ली। हाथों व कलाइयों संबंधित बीमारियों के बारे में जागरुकता पैदा करने के लिए गंगाराम हास्पिटल में डा. सतनाम सिंह छाबड़ा के मार्गदर्शन में एक वर्कशाप का आयोजन किया गया. जहां कार्पल टनल सिन्ड्रोम नामक बीमारी के बारे में जानकारी दी गई. लगभग सभी प्रकार की क्रियाओं को अंजाम देने के लिए हम अपने हाथों का ही प्रयोग करते हैं. सोचिए, वह स्थिति कितनी दर्दनाक होती है जब हमारे हाथ सही ढंग से कार्य करने की अवस्था में नहीं होते. कभी-कभी यदि आप अपनी अंगुलियों में गुदगुदी, जलन या सुन्नपन, हाथ में दर्द, अंगुलियां हिलाने डुलाने में कठिनाई, मुट्ठी बंद होने पर असहजता का अनुभव करते हैं तो यह स्थिति सामान्य नहीं है बल्कि एक नई बीमारी का अंदेशा है जिसे कार्पल टनल सिन्ड्रोम के नाम से जाना जाता है.

नई दिल्ली स्थित सर गंगाराम अस्पताल के न्यूरो एंड स्पाइन डिपाटमेंट के डायरेक्टर डा. सतनाम सिंह छाबड़ा का कहना है कि कार्पल टनल सिन्ड्रोम हाथ में उत्पन्न होने वाली एक दुखदायी बीमारी है. कार्पल टनल हड्डियों और कलाइयों की अन्य कोशिकाओं द्वारा बनाई गई एक संकरी नली होती है. यह नली हमारी मध्य नाड़ी की सुरक्षा करती है. मध्य नाड़ी हमारे अंगूठे, मध्य और रिंग अंगुलियों से जुड़ी होती है. लेकिन कार्पल टनल में जब अन्य कोशिकाएं जैसे कि लिगामेंट्स (अस्थि बधंक तंतु) और टेंडन सूज या फूल जाते हैं तो इस का प्रभाव मध्य कोशिकाओं पर पड़ता है. इस दबाव के कारण आप का हाथ घायल या सुन्न महसूस होने लग सकता है. इसमें नो टेंडन और मध्य नाड़ी में चलकर हाथों में हलचल और शक्ति पहुंचाती है.

दरअसल सी.टी.एस. औरतों में अधिक पाया जाता है. खासकर गर्भवती महिलाएं, गर्भ निधोरक गोलियों का सेवन कर रही महिलाएं, माहवारी से राहत पा चुकी महिलाएं, आर्थराइटिस के मरीज, हार्मोंस में वृद्धि से असामान्य शरीर वाले व्यक्ति, तनाव ग्रस्त लोग, शराब के आदी व मोटे लोग, सिलाई बुनाई करने वाले, अधिक गंभीर कार्य करने वाले व घंटों तक ड्राइविंग करने वाले लोगों में इस बीमारी का अधिक जोखिम रहता है.
डा.छाबड़ा ने यह भी बताया कि आधुनिक दौर में सी.टी.एस. से छुटकारा पाने के लिए एक सर्जरी भी की जाती है. जिसे कार्पल टनल रिलीज ऑपरेशन के नाम से जाना जाता है, जिसके दौरान ट्रांसवर्स कार्पेल लिगामेंट को काटा जाता है. जिससे दर्द से छुटकारा तो मिलता ही है साथ ही इससे कोशिकाओं को फैलाव के लिए अधिक स्थान मिल जाता है. साथ ही इन पर पडने वाला दबाव भी कम हो जाता है. हाथों व कलाइयों पर नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए, हाथों व कलाइयों पर अधिक दबाव डालने से बचना चाहिए. हाथों पर नियमित मसाज कराना चाहिए, कार्य करते समय छोटे-छोटे ब्रेक लेने चाहिए. हाथों पर बल डालते हुए नहीं सोना चाहिए. कार्य शुरू करने से पहले हाथों को गर्म कर लेना चाहिए. सही अवस्था में सोना चाहिए ताकि हाथों की नसों पर दबाव न पड़े, हाथों को बहुत कसकर नहीं बांधना चाहिए. जो लोग निरंतर कंप्यूटर के माउस और ट्रेकबाल्स का इस्तेमाल करते हैं उन्हें अपनी कलाई के जोड़ों को मोड़ कर रखने की बजाए अधिकतर सीधा रखकर काम करना चाहिए. जिन लोगों का अधिकतर समय डेस्क पर ही बीतता है तो कलाई पर पडने वाले दबाव को कम करने और पूर्ण आराम पाने के लिए उन्हें कार्यस्थल को भली-भांति जांच करके कार्य शुरू करना चाहिए. इस प्रकार की स्थिति में किसी भी तकिए, कुशन, व्यवस्थित की बोर्ड व ट्रे आदि का प्रयोग किया जा सकता है.

 

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