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कहीं यह वित्तीय आपातकाल की दस्तक तो नहीं ?

पिछले दिनों देश में कोरोना संकट से उत्पन्न आर्थिक संकट को ध्यान में रखते हुए केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने घोषणा किया कि अगले एक साल तक सभी मंत्रियों व सांसदों के वेतन में 30 फीसदी की कटौती की जायेगी। इतना ही नहीं देश के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व राज्यों के राज्यपालों ने भी स्वेच्छा से अपने वेतन का 30 फीसदी कटौती का फैसला किया है। इसके साथ ही सांसदों को प्रति वर्ष मिलने वाला 10 करोड़ के सांसद निधि को भी अगले दो वर्षों के लिए स्थगित कर दिया गया है। देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों व सांसदों के वेतन भत्तों में 30 फीसदी की कटौती इस बात का साफ संकेत है कि आने वाले दिन देश के लिए आर्थिक रूप से कितने भारी होने वाले हैं। इन घोषणाओं एक सवाल लाजिमी है कि कहीं देश में वित्तीय आपातकाल की दस्तक तो नहीं है?
गौरतलब है कि सांसदों वेतन में कटौती से सरकार को एक साल में 8 हजार करोड़ की बचत होगी। दूसरी ओर मोदी सरकार द्वारा सांसद निधि को दो साल के लिए स्थगित रखने से 1 लाख करोड़ की राशि की बचत होगी जिसे कनसोलिडेटेड फंड आॅफ इंडिया में जमा किया जायेगा जिसका इस्तेमाल कोरोना से लड़ने व पुनर्वास के लिए किया जा सकता है। गौरतलब है कि सांसद निधि की शुरूआत 1993 में तत्कालीन पी वी नरसिम्हा सरकार ने थी जो उस समय गौरतलब है कि सांसद निधि की शुरूआत 1993 में तत्कालीन पी वी नरसिम्हा सरकार ने 25 लाख रूपये से की थी। बहरहाल बिहार सरकार ने भी अपने मंत्रियों व विधायकों के वेतन में 15 फीसदी की कटौती का ऐलान कर दिया है।
बहरहाल भारतीय संविधान में तीन तरह के आपातकाल का प्रावधान है। अनुच्छेद 352 के तहत अगर सरकार को लगता है कि युद्ध, बाहरी हमले या सशस्त्र विद्रोह के कारण देश या उसके किसी भूभाग की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है तो वह राष्ट्रीय आपातकाल लगा सकती है। देश के आजादी के 73 साल में 1962 के चीन युद्ध के समय,1971 में पाकिस्तान के युद्ध के समय तथा 1975 में आंतरिक गड़बड़ी का हवाला देकर राष्ट्रीय आपातकाल लगाया गया था। दूसरी तरह का आपातकाल अनुच्छेद 356 के तहत किसी राज्य की संवैधानिक मशीनरी के नाकाम हो जाने पर इसे राज्यों में लागू किया जा सकता है। पिछले कई वर्षों के दौरान कई राज्यों में इसका इस्तेमाल किया गया है।
हालांकि आजाद भारत के 73 वर्ष के इतिहास में कभी भी वित्तीय आपातकाल की घोषणा नहीं की गई है पर, संविधान में इसका भी प्रावधान है। संविधान के अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपात की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा तब की जाती है, जब राष्ट्रपति को पूर्ण रूप से विश्वास हो जाए कि देश में ऐसा आर्थिक संकट बना हुआ है, जिसके कारण भारत के वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा है। अगर देश में कभी आर्थिक संकट जैसे विषम हालात पैदा होते हैं, सरकार दिवालिया होने के कगार पर आ जाती है, भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त होने की कगार पर आ जाए, तब इस वित्तीय आपात के अनुच्छेद का प्रयोग किये जाने का प्रावधान है।
गौरतलब है कि बीते 26 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में एक एनजीओ सेंट्रल फार अकाउंटेबिलिटी एंड सिस्टमैटिक चेंज (सीएएससी) की ओर से वकील विराग गुप्ता ने एक याचिका दायर की है जिसमें मांग की गई है कि कोरोनावायरस को फैलने से रोकने के लिए देशभर में वित्तीय आपातकाल घोषित किया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि कोरोना वायरस की महामारी के दौरान राज्यों व स्थानीय आॅथोरिटी की द्वारा की जा रही मनमानी को देखते हुए कानून के शासन को संरक्षित करने की दरकार है। साथ यह भी कहा गया है कि लाॅकडाउन से एक मायने में कहीं भी आने जाने के अधिकार सहित अन्य मौलिक अधिकार निलंबित हो गये हैं। ऐसे में वित्तीय आपातकाल की घोषण कर देनी चाहिए।
हालांकि इन खबरों के बीच पिछले दिनों कोरोना संकट से लड़ने के लिए पैकेज की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि मोदी सरकार का अभी वित्तीय आपातकाल लगाने की कोई योजना नहीं है। लेकिन देश के आर्थिक जानकारों की मानें तो देश के आर्थिक हालात इकोनोमिक इमरजेंसी की इशारा कर रहे हैं। रिजर्व बैंक के पूर्व चेयरमैन रघुराम राजन के अनुसार देश अब तक के सबसे बड़े आर्थिक आपातकाल के दौर से गुजर रहा है।
बहरहाल बात करें वित्तीय आपाकतकाल की तो अनुच्छेद 360 के अंतर्गत यदि आपातकाल लागू किया जाता है इसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में कमी करने के अधिकार मिल जाते हैं जिसमें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश भी शामिल होते हैं। केंद्र को वित्तीय मामले में इससे भारी राहत मिलती है। सभी राज्यों के वेतन भत्तों और पेंशन को रोका या कम किया जा सकता है। 2019-20 के लिए यह राशि लगभग 9 लाख करोड रुपए है जबकि केंद्र के असैन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्तों का खर्च लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपए है। वर्तमान मे ंसरकार को 11.5 लाख करोड़ रुपए खर्च करना पड़ता है। यदि इसमें 20 फीसदी की भी कमी की गई तो सरकार को 2.30 लाख करोड़ रुपए की बचत होगी जिससे कोरोना संकट से लड़ने में मदद मिल सकती है।
यद्यपि मोदी सरकार अपने कठोर फैसले के कारण जानी जाती है लेकिन देश में वित्तीय आपातकाल सरीखा फैसला सरकार की लोकप्रियता को घटाने वाला साबित हो सकता है। इसलिए मोदी सरकार हरसंभव इस फैसले को टालने या इससे बचने का ही प्रयास करेगी। हालांकि यह बहुत कुछ अब सुप्रीम कोर्ट में सीएएससी के द्वारा इस संबंध में दायर याचिका पर दिये गये निर्णय पर भी निर्भर करेगा।

विश्वजीत राहा (स्वतंत्र टिप्पणीकार)
न्यू बाबू पाड़ा, दुमका, झारखंड
8789945606

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