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जाने किस महफिल में आयेंगे

अब कहां वो किस महफिल में आयेंगे।
किस नजर से उन्हें देखें वो नहीं आ पायेंगे।।
गीत गजल कविता के लिखे पन्नों में याद कर पायेंगे।
जिंदगी की राह में कुछ पल उनकी बातों में गुजारेंगे।।
खोई खोई निगाहें भी भटकेंगी लेकिन वो नहीं आयेंगे।
गमगीन गम के मातम में जीने की राह बनायेंगे।।
मंसूर की बहार तो उजड़ चुकी लेकिन स्मृति अभीशेष हैं।
जाने सूखे हुए पत्तों की बयार में दिलों की पुकार अभी शेष हैं।।
छा गया है सन्नाटा साहित्यका वो पुजारी जाने खो गया जैसे।
जाने आज चिराग बुझ गया जीवन का राग चुप हो गया जैसे।।
भारती रो पड़ेगा यें दिल ये आँख नम हो उसे तलासेगी।
होंगे नहीं मंसूर चाहें जिधर देखों यहां अपनी नजरें भटकेंगी।।

मंगल व्यास भारती
गढ़ के पास , चूरू राजस्थान

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