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जारी है लड़ाई : वैचारिक स्खलन को तोड़ती कवितायेँ

इधर हिन्दी कविता में जिस ‘वैचारिक स्खलन’ की चर्चा हो रही है, क्या वास्तव में यह कालखण्ड ‘वैचारिक स्खलन’ का है, या फिर कोई मूल्य निर्मित हो रहा है जिसका अभी तक कोई पदनाम देना संभव नहीं हुआ है | जरा विचार कीजिये, इस कालखण्ड में पूरी दुनिया में दक्षिणपंथी सरकारों का उभार और वामपंथी सरकारों का विघटन तेजी से हुआ है | इस स्थिति में क्या केवल सत्ता परिवर्तन हुआ है, वैचारिक या सांस्कृतिक परिवर्तन भी? जाहिर सी बात है, सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ वैचारिक और सांस्कृतिक परिवर्तन भी होता रहा है और इसका अपना इतिहास भी है| लेखक और पत्रकार इन दोनों ही स्थिति में सत्ता के पक्ष में थे और विपक्ष में भी | पक्षधर लेखक सत्ता का यशगान और विपक्ष की जालसाजी का विवरण देते रहे हैं | उनका मकसद आत्मप्रचार के साथ-साथ सुरक्षा का भी रहा है | यह केवल इस काल खण्ड की बात नहीं है, सत्ता के विपक्ष में बोलने और लिखने वाले लेखकों की हत्याएं होती रही हैं | कबीर सम्बन्धी किवन्दन्तियाँ में उन्हें सत्ता और धर्म के विरोध में बोलने पर दी जाने वाली सजा इसका एक उदाहरण है | और उदारवादी सत्ता के समय लेखकों को सत्ता के विरोध में बोलने की थोड़ी बहुत आज़ादी दी गई थी | कुम्भनदास, जाफर जटल्ली इत्यादि इसी परम्परा के कवि हैं जिन्हें उदारवादी सत्ता ने उनके लेखन के लिए न केवल सराहा है अपितु अपने दरबार में शामिल करने लिए प्रयत्न भी किया है किन्तु ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं | किन्तु सत्ता के विरोध में लिखने पर मृत्युदंड पाने वाले लेखकों की संख्या अधिक है | इस काल खंड में जिसे वैचारिक स्खलन कहा जा रहा है, निरंतर पत्रकारों/लेखकों की मृत्यु की सूचनाएं अधिकाधिक मिल रही हैं | इसका सीधा सम्बन्ध गैरलोकतांत्रिक सरकार यानि भारतीय जनता पार्टी की सरकार से है | सवाल यह उठता है कि जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार नहीं थी तो क्या लेखको को मृत्यु दंड नहीं दिया जाता था? आपका जवाब फांसीवादी/ उग्रवादी सरकार के पक्ष में होना चाहिए है जिसका अर्थ यह है की फांसीवादी/उग्रवादी ताकतें सर्वाधिक समय तक शासन करती रहीं हैं सुकरात को युवा लेखको को भड़काने पर जहर दे दिया गया था जबकि ब्रूनों को बीच चौराहे में जिन्दा जला दिया गया था | उग्रवादी विचार हमेशा रहें हैं हालाँकि इसे पूंजीवाद से जोड़कर देखा गया है |

हमें यह नहीं सोचना चाहिए की उग्रवाद और उदारवाद दो अलग अलग समय में उत्पन्न विचार है बल्कि एक ही समय की उपज हैं उनका ताकतवर चाहे वह ज्ञान की लड़ाई हो या फिर सत्ता की, होना उनकी उपस्थिति की पहचान है | इसी फांसीवादी ताकत ने स्पेनिश के बड़े कवि लोर्का को भी भरी जवानी में मार डाला था | अपनी कविताओं के जरिये लोर्का ने जिस विचार को तोड़ने का प्रयास किया ,दरअसल वह महत्वपूर्ण हैं | अपने एक पत्र में लोर्का ने लिखा है कि कविता मेरे लिए नैसर्गिक प्रत्यय नहीं है, मैं अपनी कविता में केवल प्रकृति की उदास आवाज शामिल नहीं करता, मुझे मनुष्यों की आवाज अधिक प्रिय है l| मैं चाहता हूँ कि मनुष्य की आवाज़ को अलग पहचान सकूं उसके नैसर्गिक आवाज़ को कविता का स्वर दे सकूँ | मुझे उदासी का बिम्ब अधिक पसंद है इसका अर्थ यह नहीं है कि उदासी ही मेरा अंतिम साध्य है |
एक विचारणीय बात यह है की क्या कारण है फांसीवादी समय में कविताओं के स्वर में गहरी उदासी परिलक्षित होती है | लोर्का स्वयं उदास कवितायेँ लिखते थे |
संतोष पटेल की कवितायेँ इस वैचारिक स्खलन को तोड़ती हैं | और नया आख्यान रचने का प्रयास करती हैं हालाकि वे रघुवीर सहाय की परम्परा के कवि हैं अर्थात उनकी कवितायें अखबारी या सूचनाओं के संग्रहण/ विवरण की हैं | किन्तु इसका यह अर्थ नहीं समझ लेना चाहिए की अखबारी कविताओं का कोई काव्य लालित्य, सौन्दर्यबोध और काव्यशिल्प नहीं होता या शिल्प के आधार पर ये कवितायेँ कमजोर होती हैं | किन्तु यह विचार केवल काव्यधारा की समुचित विकासयात्रा को खंडित करने वाला है| मैंने पहले ही कहा है की संतोष पटेल रघुवीर सहाय की परम्परा के कवि हैं | “जारी है लड़ाई” की अधिकाँश कवितायें इसी प्रवृत्ति की कवितायें हैं इन कविताओं में चाहे ई डब्लू एस पर लिखी गई कविता “नव दलित’’ हो या फिर सबरीमाला मंदिर पर हुए स्त्री आन्दोलन और उसका परिणाम पर लिखी गई कविता ‘ और वर्षों पुरानी परम्परा टूट गई’ हो या फिर मीडिया के बदलते स्वर को देखकर लिखी गई कवितायेँ इसी तरह की कवितायेँ हैं –
टेलीविजन
जो अब नंगा सच नहीं दिखाता
हाँ वह झूठ का नंगापान जरुर परोसता है…
(टेलीविजन कविता से)
अखबारी कवितायेँ तात्कालिक जरुर होती हैं किन्तु समय के अनुसार इनकी प्रासंगिकता बनी रहती है | इसीलिए ये कवितायें समयातीत होती हैं, इससे कवि के कालातीत होने का भान होता है | तात्कालिक कवितायें प्रधानतः स्थूल होती हैं, उनमें सूक्ष्मता का भाव नहीं झलकता | ‘सोफिया निकोलायवना शिल’ को पत्र लिखते हुए ‘रिल्के’ ने चेखव के सन्दर्भ में लिखा है कि चेखव एकदम आधुनिक कलाकार हैं क्योंकि उसने रोजमर्रा की स्थूल घटनाओं के विस्तार को अपनी कलाकृति में प्रस्तुत करने की मंशा रखी | ठीक इसी तरह से संतोष पटेल अपनी कविताओं में रोजमर्रा की समस्याओं, भावुक कर देने वाली घटनाओं, संसद में राजनीतिक दलों के अमर्यादित बर्ताव, लूट-घसोट, प्रेम और दृढ इच्छाशक्ति का समावेश करते हुए अपने समकाल से वापस लौटकर इतिहास के अलिखित पृष्ठों को रेखांकित करते हैं | यही उनकी कविता का कैनवास है और इतिहासबोध भी | हालाँकि वे यह सब रचते हुए अपने अर्जकपन को नहीं भूल पाए यही कारण है कि मिथक से यथार्थ की ओर या देवालयों से कार्यालयों या गलियों की ओर लौटते समय कविता के पात्र व्यवसाय करते हुए मिल जायेंगे | इस संग्रह की तीन कवितायेँ प्रमुखता से अर्जकबोध की कवितायें हैं जिनमें – ‘माउन्टेन मैन दशरथ माँझी’, ‘घंटियाँ’, ‘एक गिरमिटिया का हिन्दू बन जाना’ जो सृजन के साथ व्यवसाय से जुड़ी है | हालाँकि पहली कविता का बहुत हिस्सा सुदृढी और वंचित मजदूर के ग्लोरिफाई का है, किन्तु इस हिस्से को छोड़ दें तो पूरी कविता मार्मिक है | ‘घंटियाँ’ कविता देवालय की घंटी से लेकर गली गली रामदाने का लड्डू भेजने वाले व्यक्ति के ठेले की घंटी तक का विवरण है | यह पूरी कविता अपने आप में समाज के वर्गों को व्याख्यायित करने वाली कविता है | वर्गों में केवल टकराव या शोषण नहीं बल्कि उनके बीच मिथकीय चेतना और अर्जकपन का विभेद भी मिलता है | मंदिर का पुजारी आमजन को मूर्ख बनाकर अपना जीवन चलाता है और आम व्यवशायिक भी, फर्क दोनों की चेतना का है | ओरहान पामुक ने अपने उपन्यास ‘माई नेम इज़ रेड’ में जिस मिथकीय- रोजमर्रा के जीवन को व्याख्यित किया है उसका अप्रत्यक्ष विवरण इस कविता में है किन्तु बहुत संभव है कि संयोगवश प्रसंग मिलते जुलते हों, कवि ने इस पर निगाह न डाली हो |
संतोष पटेल की कविताओं में अखबारीपन के साथ साथ बहुजन आन्दोलनों, दलितों वंचितों की यातना का स्वर भी मिलता है या यूँ कहिये की “जारी है लड़ाई” सत्ता के विरोध में बहुजनों और वंचितों की वकालत करता है | उसमें आक्रोश का स्वर भी है और कविता का अखबारीपन भी | यहाँ लोर्का की उदासी भी है,और गोर्गी का संगीत भी | इन दोनों ही स्थितियों में संतोष पटेल वे जल्दीबाजी नहीं करते अपितु कुम्भकार की भांति बहुत ही करीने से कविता का निर्माण करते हैं | आक्रोश की कविताओं में से माउंटेन मैन माझी पर लिखी गई कविता इसका महत्वपूर्ण उदहारण है | जहाँ वह पहले दो प्रेमियों के क्रियाकलाप का उल्लेख करते हैं और बाद में उसकी उपयोगिता को समझाने का प्रयास करते हैं | इस अर्थ में वे माझी को अधिक श्रेष्ठ बताते हैं –
क्योंकि दशरथ मांझी
आज व्यष्टि से समष्टि का परिचायक
बन चुका है
और बन चुका है
व्यक्तिवाचक से भाववाचक
लाखों अभावों के बाद भी …
(माउनटेन मैन दशरथ से)
प्रेम की कविताओं में यातना और सामाजिक भेदभाव मौजूद है | यह कहिये कि वे यातना को अंक लिए प्रेम के पारखी कवि हैं | उनमें करुणा और प्रेम का भाव किसी अन्य के उपजाए नहीं हैं, अपने हृदय के विराट और सघन बगीचे को करुणा की छोटी छोटी मंजरियों में तब्दील किये बैठे हैं, वे अपने समकाल में प्रेम के अनूठे कवि हैं जिनमें कबीर, घनानंद और दिनकर का संयुग्मन एक साथ हुआ है | यही कारण है उनका प्रेमी मन कोर-दर-कोर बड़े कुतूहलता से प्रेम की तलाश करता है| यहीं उनका मानव मन विराट ह्रदय में परिवर्तित हो जाता है | वे नगर में जहाँ जीवन की जटिलताएं अधिक हैं, हिंसा और व्यभिचार का नंगानाच के बजाए प्रेम और करुणा का निश्छल जलधारा उसके पोर-पोर में भर देना चाहते हैं | ‘प्रेम’, ‘प्रेम करना इतना आसान नहीं है’ और ‘ऑनर किलिंग’ मानव मन को बचा लेने की कवितायेँ हैं | ज्ञानेंद्रपति की ‘ट्राम में एक याद’ की तरह ‘देखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी है/ देखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है’ जैसा एकालाप नहीं है बल्कि हिंसा और विभेद की जगह प्रेम का संलाप है | इसे वह क्रांति कहते हैं-
प्रेम
अपरिसीम / सौन्दर्य से परिपूर्ण
भावनाओं के बीज से अंकुरित
एक मूलभूत क्रांति… (प्रेम कविता से.. )
दर’असल संतोष पटेल हिन्दी कविता इस कालखंड के ऐसे कवि हैं जो लगातार सत्ता और ब्राहमणवाद के विरोध में लिख रहे हैं | इसके लिए वे सूचनाओं का सहारा लेते हैं और फिर उसको काव्य शिल्प में पिरोने का प्रयास करते हैं | ‘पहली शिक्षिका’ से लेकर ‘जननायक’ की परिकल्पना उन्हें जनतंत्र के कवि-नायक की घोषणा करती है | वे ऐसे कठिन साधक हैं जिनकी कविताओं में प्रवेश करना दिनचर्या के उस दरवाजे से प्रवेश करना है जहाँ जीवन की तमाम विषमतायें भी हैं और बहुजनों की चिंताएं भी ..कविताओं में वैचारिक स्खलन को तोड़ने का प्रयास है | किन्तु कविताओं में उत्साह या आनन्द नहीं है,बल्कि वैचारिकता का पीला प्रकाश…इन्हीं के बीच वह नये विचार को गढ़ने का प्रयास करते हैं …

सुशील द्विवेदी
संपादक हस्तांक
मो .9015603769

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