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जिनपे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे

राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों बड़े पैमाने पर हुई साम्प्रदायिक हिंसा की गूँज पिछले दिनों देश की लोकसभा व राज्य सभा में भी सुनाई दी। विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा अमित शाह का इस्तीफा मांगा गया। संसद परिसर में महात्मा गाँधी की प्रतिमा के समक्ष विपक्षी नेताओं द्वारा धरना- प्रदर्शन किया गया। लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने सदन की कार्यवाही बार-बार स्थगित होने को लेकर सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार दिल्ली हिंसा पर चर्चा से भाग रही है। उन्होंने कहा कि राजधानी दिल्ली में हुई हिंसा के बाद जिस तरह के हालात बने हैं उसकी देश-विदेश में आलोचना हो रही। चौधरी ने कहा कि राजधानी में किसकी गलती से हिंसा हुई, इसे केंद्रित कर सदन में चर्चा होनी चाहिए. यह सिर्फ कांग्रेस पार्टी नहीं, पूरे हिंदुस्तान का मुद्दा है. इस विषय को लेकर सरकार भी अपनी बात रखे. अधीर ने आरोप लगाया कि दिल्ली हिंसा के पीछे साज़िश है और इसे उजागर करना हमारा फ़र्ज़ है। विपक्षी दलों के नेताओं के भारी शोरशराबे के बीच वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कई बिल पेश किए। सीतारमण द्वारा बिल पेश किये जाने के दौरान भी विपक्ष दिल्ली हिंसा पर चर्चा की मांग को लेकर अपना ज़ोरदार विरोध दर्ज कराता रहा। परन्तु लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने विपक्षी सांसदों को यह शिक्षा देते हुए लोकसभा पहले मंगलवार तक के लिए स्थगित करने का आदेश दे दिया फिर यह कहा कि-‘दिल्ली में एक बार स्थिति सामान्य होने पर बहस होगी। दिल्ली में स्थिति सामान्य बनाए रखने के लिए सभी राजनीतिक दलों का सामूहिक प्रयास होना चाहिए. उन्होंने विपक्षी सांसदों से कहा कि ये लोकतंत्र का मंदिर है, हम भी शांति चाहते हैं. आपको सदन से बाहर नारे लगाने का अधिकार है। विपक्षी दल दिल्ली हिंसा के लिए सीधे तौर पर न सिर्फ़ केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं बल्कि हिंसा न रोक पाने में भी सरकार व दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। इसीलिये विपक्ष द्वारा गृह मंत्री अमित शाह से इस्तीफ़ा दिए जाने की मांग भी लगातार की जा रही है। एन सी पी नेता शरद पवार ने तो साफ़ शब्दों में यह आरोप लगाया है कि दिल्ली हिंसा के लिए केंद्र सरकार ही ज़िम्मेदार है क्योंकि ‘संविधान के अनुसार दिल्ली में क़ानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की है. इसलिए दिल्ली में जो कुछ हो रहा है उसकी 100 फ़ीसदी ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की है, पवार ने आरोप लगाया कि भाजपा दिल्ली में विधानसभा चुनाव हारने के बाद विभाजनकारी राजनीति कर रही है।
उधर केंद्रीय सत्ता की ओर से अभी तक दंगा पीड़ितों की ख़बर लेना या उन्हें पुनर्स्थापित करना तो दूर अभी तक सत्ता और विपक्ष एक दूसरे पर हिंसा भड़काने के आरोप प्रत्यारोप में ही व्यस्त दिखाई दे रहे हैं। प्रधानमंत्री व गृह मंत्री द्वारा अभी तक दिल्ली दंगा पीड़ितों के पास जाकर उन्हें सांत्वना देना तो दूर ट्वविटर या मीडिया के माध्यम से भी उनके आंसू पोछने की ज़रुरत नहीं महसूस की गयी है। हिंसा फैलाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाला ‘गोली मारो’… जैसा भड़काऊ नारा लगवाने वाले जिस कपिल मिश्रा के विरुद्ध उच्च न्यायलय ने एफ़ आई आर दर्ज करने का आदेश दिया था उस न्यायमूर्ति मुरलीधर का स्थानांतरण तो किया ही गया साथ साथ कपिल मिश्रा को विशेष सुरक्षा भी दे दी गयी। इस प्रकार के अनेक ऐसे उदाहरण हैं जो इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए पर्याप्त हैं कि सरकार, दिल्ली हिंसा के प्रति तथा हिंसा फैलाने वालों के प्रति कैसा रुख़ रखती है।और सरकार का ‘सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास’ जैसा लोकलुभावन नारा दरअसल सच्चाई के कितना विरुद्ध है। हिंसा के एक हफ्ते बाद अब तक 47 लोगों की मौत हो चुकी है। दिल्ली पुलिस ने इस संबंध में 369 प्राथमिकियां दर्ज की हैं और 1,284 लोगों को हिरासत में लिया है। परन्तु पुलिस की दंगों में दंगाइयों का साथ देने व उसके दंगाइयों के साथ स्वयं हिंसा में शामिल होने की जो अनेक वीडीओ सामने आ रही हैं उनपर कौन और कब कार्रवाई करेगा इसका कोई उत्तर नहीं है।
इन सब के बीच कुछ ऐसी वीडिओज़ भी सामने आ रही हैं जो बेहद चिंताजनक हैं। इन वीडिओज़ में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है की एक ओर जहाँ कई हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में जनजीवन सामान्य बनाने की दिशा में काम करते हुए अनेक शांति समितियां गठित की गयी हैं तथा हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे के पक्षधर लोग एक दूसरे को सहयोग दे रहे हैं,एक दूसरे के आंसू पोछने का काम कर रहे हैं वहीँ कई दक्षिणपंथी तथाकथित ‘बौद्धिक’ लोग सत्ता के संरक्षण में इसी हिंसाग्रस्त दिल्ली में वर्ग विशेष के विरुद्ध ज़हर उगलने का अपना ‘धंधा’ बदस्तूर जारी रखे हुए हैं। ये लोग अभी भी लोगों को सांप्रदायिकता एकता व हिन्दू मुस्लिम भाईचारे के विरुद्ध भड़का रहे हैं। अपने ज़हरीले भाषणों में वह समुदाय विशेष के विरुद्ध नफ़रत का ज़हर लगातार बो रहे हैं। उन्हें जिहादी व लव जिहादी बता रहे हैं। मुसलमानों के व्यवसायिक व सामाजिक बहिष्कार की अपीलें सोशल मीडिया पर की जा रही हैं। एक प्रतिष्ठित अप्रवासी हीरा व्यापारी के अनुसार जयपुर की नगीने की मण्डी मै तीस हज़ार करोड़ सालाना का नगीना मुस्लिम कारीगरों द्वारा तराशा जाता है मुसलमान जो हीरा तराशते हैं,अधिकांश हिंदू हीरा व्यापारियों द्वारा पूरी दुनिया में वही हीरा बेचकर धन कमाया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक़ मुस्लिम कारीगर लगभग तीस हज़ार करोड़ रूपये सालाना का नगीना तराशता है। तो क्या सांप्रदायिक दक्षिणपंथी सोच इस तरह के अनेक कारोबारों को भी नफ़रत की आग की भेंट चढ़ना चाहती है? देश की अर्थव्यवस्था पहले ही वेंटिलेटर पर पहुँचने को है ऊपर से सांप्रदायिकता का व्यवसायिक स्तर पर भी इस्तेमाल करना निश्चित रूप से देश को बर्बाद करके ही छोड़ेगा । इसी नफ़रत फैलाने की एक और वीडीओ इन्हीं ट्रोलर्स द्वारा पोस्ट की गयी जिसमें यह बताया गया की ‘ये उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के पहले का वीडियो है और मुसलमानों को हिंसा भड़काने के लिए पैसे बांटे जा रहे हैं ‘। परन्तु जब बीबीसी ने इस वीडीओ की पड़ताल की तो पाया है कि वीडीओ में किये जा रहे दावे के मुताबिक़ दिल्ली में हिंसा भड़काने के लिए पैसे नहीं बांटे गए. बल्कि ये पैसे हिंसा में पीड़ितों की मदद के लिए बांटे गए, साथ ही ये वीडियो शिवपुरी से भाग कर बाबूनगर पहुंचे शरण लेने वाले परिवारों का है. जिन्हें खाना और दूध और कपड़े भी बांटे जा रहे हैं न कि दंगा फैलाने के लिए धनराशि। यह मदद हिन्दू, सिख तथा मुस्लिम समाज के मानवतावादियों द्वारा पहुंचाई जा रही थी।
पूरी दिल्ली, हमारा देश और पूरी दुनिया यह समझ चुकी है कि दिल्ली में दंगाई पूरी तैयारी से आए या लाए गए। मस्जिदें, दरगाह व मुसलमानों के पवित्र धर्मग्रन्थ क़ुरान आदि जला कर उनकी भावनाओं को भड़काने की पूरी कोशिश की गयी। हर जगह ‘जय श्री राम’ के नाम के नारों का सहारा लिया गया। सत्ता व सत्ता संरक्षित पुलिस की शह पर इंसानियत के ख़ून बहाने को साक़िब लखनवी ने अपने इस शेर में कितने सुंदर तरीक़े से बयान किया है
बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मेरे ।
जिनपे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे।।

निर्मल रानी

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