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जुड़वाँ भाई है शराब और अपराध

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने शराब को सभी पापों की जननी कहा है। गांधीजी कहते हैं शराब शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आर्थिक दृष्टि से मनुष्य को बर्बाद कर देती है। शराब के नशे में मनुष्य दुराचारी बन जाता है। शराब के बारे में बताया जाता है कि यह एक अरबी का शब्द है जिसका अर्थ शर-माने, बुराई और आब माने पानी अर्थात् वह पानी जो बुराइयों की जड़ है। रम, विस्की, चूलईया, महुआ, ब्रांडी, जीन, बीयर, हंड़िया, आदि सभी एक है क्योंकि सब में अल्कोहल होता है। इन सभी को हम शराब कहते है। शराब को सभी प्रकार के अपराधों का कारक माना जाता है। शराब के कारण आए दिन अपराध हो रहे हैं। युवा शराब के कारण भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। महिलाएं प्रताड़ित हो रही है। चोरी, हत्या, दुष्कर्म, दुर्घटना आदि शराब के कारण ही हो रहे हैं।
भारत में शराब ने उत्पात मचा रखा है। एक सरकारी अध्ययन रिपोर्ट को गहनता से देखें तो पता चलेगा शराब की पहुँच घर घर हो गयी है। हो भी क्यों नहीं, सरकार खुद शराब के धंधे को बढ़ावा दे रही है। लाइसेंस बाँट कर राजस्व एकत्रित कर कल्याणकारी योजनाओं का सञ्चालन कर रही है। ऐसे में शराबियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। देश में बच्चे से बुजुर्ग तक शराबी बनता जा रहा है। इसी कारण अपराधों में भी बढ़ोतरी होती जा रही है। सच तो यह है सरकार शराब से होने वाली बड़ी कमाई से हाथ धोना नही चाहती। केन्द्र ओर राज्य सरकार शराब से मिलने वाले राजस्व से कई कल्याणकारी योजनाए चलती है जिसमे अस्पताल भी शामिल है इसीलिए सरकारे शराब से होने वाले नुकसान होने की बड़ी वजह जानते हुए भी शराब पर प्रतिबंद नही लगा सकती है ।
हमारे समाज में नशे को सदा बुराइयों का प्रतीक माना और स्वीकार किया गया है। इनमें सर्वाधिक प्रचलन शराब का है। शराब सभी प्रकार की बुराइयों की जड़ है। शराब के सेवन से मानव के विवेक के साथ सोचने समझने की शक्ति नष्ट हो जाती है। वह अपने हित-अहित और भले-बुरे का अन्तर नहीं समझ पाता। शराब के सेवन से मनुष्य के शरीर और बुद्धि के साथ-साथ आत्मा का भी नाश हो जाता है। शराबी अनेक बीमारियों से ग्रसित हो जाता है। अमीर से गरीब और बच्चे से बुजुर्ग तक इस लत के शिकार हो रहे हैं।
एक सर्वे के मुताबिक भारत में गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लगभग 37 प्रतिशत लोग नशे का सेवन करते हैं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल है जिनके घरों में दो जून रोटी भी सुलभ नहीं है। जिन परिवारों के पास रोटी-कपड़ा और मकान की सुविधा उपलब्ध नहीं है तथा सुबह-शाम के खाने के लाले पड़े हुए हैं उनके मुखिया मजदूरी के रूप में जो कमा कर लाते हैं वे शराब पर फूंक डालते हैं। इन लोगों को अपने परिवार की चिन्ता नहीं है कि उनके पेट खाली हैं और बच्चे भूख से तड़फ रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। ये लोग कहते हैं वे गम को भुलाने के लिए नशे का सेवन करते हैं। उनका यह तर्क कितना बेमानी है जब यह देखा जाता है कि उनका परिवार भूखे ही सो रहा है। युवाओं में नशा करने की बढ़ती प्रवृत्ति के चलते शहरी और ग्रामीण अंचल में आपराधिक वारदातों में काफी इजाफा हो रहा है। शराब के साथ नशे की दवाओं का उपयोग कर युवा वर्ग आपराधिक वारदातों को सहजता के साथ अंजाम देने लगे हैं। हिंसा ,बलात्कार, चोरी ,आत्महत्या आदि अनेक अपराधों के पीछे नशा एक बहुत बड़ी वजह है । शराब पीकर गाड़ी चलाते हुए एक्सीडेंट करना, शादीशुदा व्यक्तियों द्वारा नशे में अपनी पत्नी से मारपीट करना आम बात है ।
आजादी के बाद देश में शराब की खपत 60 से 80 गुना अधिक बढ़ी है। यह भी सच है कि शराब की बिक्री से सरकार को एक बड़े राजस्व की प्राप्ति होती है। मगर इस प्रकार की आय से हमारा सामाजिक ढांचा क्षत-विक्षत हो रहा है और परिवार के परिवार खत्म होते जा रहे हैं। हम विनाश की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। देश में शराब बंदी के लिए कई बार आंदोलन हुआ, मगर सामाजिक, राजनीतिक चेतना के अभाव में इसे सफलता नहीं मिली। सरकार को राजस्व प्राप्ति का यह मोह त्यागना होगा तभी समाज और देश मजबूत होगा और हम इस आसुरी प्रवृत्ति के सेवन से दूर होंगे।

बाल मुकुन्द ओझा
डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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