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न्यायप्रिय व धर्मनिरपेक्ष शासक थे ‘छत्रपति शिवाजी’

मराठा शासक छत्रपति शिवाजी का नाम एक बार फिर चर्चा में आ गया है। ‘छत्रपति शिवाजी’ के नाम से जुड़ा ताज़ा विवाद छिड़ा है एक ऐसी पुस्तक को लेकर जिसका शीर्षक है ‘आज के शिवाजी- नरेंद्र मोदी’। इस पुस्तक के लेखक जय भगवान गोयल पहले शिवसेना में थे परन्तु शिवसेना से निकाले जाने के बाद वे भारतीय जनता पार्टी में अपने उज्जवल राजनैतिक भविष्य के लिए संघर्षरत हैं। बहरहाल पिछले दिनों दिल्ली स्थित बीजेपी कार्यालय में इस पुस्तक का विमोचन दिल्ली बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी, भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और दिल्ली के प्रभारी श्याम जाजू और पूर्व सांसद महेश गिरी सहित कई अन्य भाजपा नेताओं की मौजूदगी में किया गया । परन्तु इस पुस्तक के विमोचन के तत्काल बाद से ही इस पुस्तक के शीर्षक तथा लेखक द्वारा शिवाजी की तुलना नरेंद्र मोदी से किये जाने की आलोचना होने लगी। ख़ास तौर पर उस शिवसेना द्वारा अधिक तीखी प्रतिक्रियाएं दी गईं जो स्वयं शिवाजी के नाम पर मराठा राजनीति करती रही है। शिवसेना सहित,कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी एन सी पी की ने भी इस पुस्तक के प्रकाशन व विमोचन की आलोचना की। हालांकि बीजेपी “यह लेखक की निजी किताब है. इसका बीजेपी से कोई लेना-देना नहीं है”,कहकर स्वयं को इस विवाद से अलग रखने की कोशिश कर रही है।
पुस्तक लेखक का कहना है कि “जिस तरह शिवाजी महाराज मुग़लकाल में अपने स्वाभिमान को बनाए रखते हुए काम करते थे, 70 साल में पहली बार ऐसा कोई प्रधानमंत्री आया है जो उसी तरह काम कर रहा है और इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इस किताब के बारे में सोचा।”सवाल यह है कि लेखक द्वारा इस पुस्तक में व्यक्त किए गए उसके ‘उदगार’ कितने सही हैं? क्या शिवजी की तुलना नरेंद्र मोदी से करना तर्क सांगत है ?क्या एक शासक के रूप में शिवाजी की नीयत और नीतियां वैसी ही थीं जैसी आज के मोदी शासन में दिखाई दे रही हैं?धर्म अथवा जाति से संबंधित अनेक विवादित फ़ैसलों को लेकर आज जिस तरह देश में जगह जगह बेचैनी व विरोध प्रदर्शन दिखाई दे रहे हैं क्या शिवजीके समय भी यही स्थिति थी ? ख़ास तौर पर यदि हम मुसलमानों के ही संबंध में बात करें तो क्या शिवजी की भी मुसलमानों के प्रति धारणा ऐसी ही थी जैसी आज के सत्ताधारियों ने बनाई हुई है? इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमें छत्रपति शिवा जी महाराज के व्यक्तिगत जीवन व उनकी शासन शैली को समझना बेहद ज़रूरी है। केवल हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा के प्रतीक के रूप में शिवजी को देखना भले ही स्वयंभू शिवा जी भक्तों को राजनैतिक लाभ पहुंचा देता हो परन्तु ऐसी कोशिशें उस महान शासक के महान व उच्च कोटि के व्यक्तित्व,उनके आदर्शों व उनकी छवि को प्रभावित करती हैं। आइये संक्षेप में शिवजी के व्यक्तित्व के बारे में जानने की कोशिश करते हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज पूर्णतयः एक धर्मनिरपेक्ष शासक थे तथा वे सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान करते थे।परन्तु अंग्रेज़ों ने देश को हिंदू व मुसलमानों को बांटने की साजि़श की। बांटो और राज करो की नीति पर चलते हुए अंग्रेज़ों ने अपने वफ़ादार अंग्रेज़ व मराठा इतिहासकारों द्वारा इतिहास में कई ऐसी बातें लिखवाईं जिनसे भारतीय समाज को धर्म के आधार पर विभाजित करने में उन्हें सफलता हासिल हुई। सत्ता व शासन के चाटुकार व ख़ुशामदपरस्त लेखक कल भी मौजूद थे और आज भी हैं। जहाँ तक शिवा जी का प्रश्न है तो सर्वधर्मसंभाव तथा धर्मनिरपेक्ष विचारधारा की शिक्षा शिवाजी को विरासत में हासिल हुई थी। इतिहास के मुताबिक़ शिवाजी के दादा मालोजी जोकि अहमदनगर रियासत में एक सुप्रतिष्ठित फ़ौजी कमाण्डर थे, उन्हें शादी के दस वर्षों तक कोई सन्तान नहीं हुई थी। जबकि उनके छोटे भाई के घर आठ संतानें थीं। मालोजी ने पुत्र प्राप्ति के लिए तीर्थ, व्रत, पूजा-पाठ आदि सब कुछ कर डाला परंतु उन्हें संतान की प्रप्ति नहीं हुई। अन्त में किसी शुभचिन्तक की सलाह मानकर वे अहमदनगर क़िले के बाहर स्थित सूफ़ी फ़क़ीर शाह शरफ़ की मज़ार पर गए और सन्तान के लिए शाह शरफ़ पीर से मन्नत व दुआयें मांगीं। उसी वर्ष मालोजी के घर एक पुत्र पैदा हुआ तथा अगले ही वर्ष दूसरे पुत्र ने भी जन्म ले लिया। मालोजी को इस बात का पूरा विश्वास हो गया कि उन्हें शाह शरफ़ बाबा के आशीर्वाद से ही दोनों पुत्र प्राप्त हुए हैं। तभी उन्होंने अपने बड़े बेटे का नाम शाहजी और छोटे बेटे का नाम शरफ़ जी रख दिया। छत्रपति शिवाजी उसी पीर के आशीर्वाद का परिणाम अर्थात् शाहजी की सन्तान थे।
शिवाजी महाराज क़ुरआन शरीफ़, मस्जिदों, दरगाहों तथा औरतों का बहुत आदर करते थे। एक बार शिवाजी के एक हिन्दू सेनापति ने सूरत शहर को लूटा तथा वहां के मुग़ल हाकिम की सुन्दर बेटी को क़ैद कर उनके दरबार में लाया। शिवाजी के समक्ष उस सुन्दर कन्या को पेश करते हुए सेनापति बोला कि- ‘महाराज मैं आपके लिए यह नायाब तोहफ़ा लाया हूं।’ शिवाजी अपने कमाण्डर की इस हरकत को देखकर ग़ुस्से से आग बबूला हो गए तथा अपने उस हिन्दू सेनापति को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा- ‘तुमने न सिर्फ़ अपने मज़हब की तौहीन की बल्कि अपने महाराज के माथे पर कलंक का टीका भी लगाया।’ फिर क़ैद करके लाई गई मुग़ल हाकिम की सुन्दर बेटी की ओर देखकर शिवाजी बोले- ‘बेटी, तुम कितनी ख़ूबसूरत हो। काश मेरी मां भी तुम्हारी तरह ख़ूबसूरत होती तो मैं भी तुम्हारे जैसा ही ख़ूबसूरत होता।’ उसके पश्चात शिवाजी ने ढेर सारे तोहफ़े देकर उस मुसलमान शहज़ादी को अपनी एक फ़ौजी टुकड़ी की सुरक्षा में उसके माता-पिता के पास आदर सहित वापस भेज दिया। इतना ही नहीं शिवाजी ने अपने उस सेनापति की करतूत के लिए सूरत के मुग़ल हाकिम से माफ़ी भी मांगी। शिवाजी की फ़ौज को उनका आदेश था कि लड़ाई के दौरान किसी भी मस्जिद को कोई नुक़सान नहीं पहुंचे और यदि कहीं कोई क़ुरान शरीफ़ मिल जाए तो उसे आदर सहित मेरे पास लाया जाए। इस प्रकार प्राप्त किये गये कुरान शरीफ़ को शिवाजी प्राय: मुसलमान क़ाज़ियों को तोहफ़े के रूप मे पेश कर दिया करते थे।
हैदराबाद (सिन्ध) से आकर केलसी में बसे बाबा याक़ूत एक बड़े सूफ़ी सन्त थे। उनका मानना था कि ईश्वर, अल्लाह एक ही हैं तथा कुल इन्सान आपस में भाई-भाई हैं। शिवाजी बाबा याक़ूत शहरवर्दी के इतने बड़े भक्त व मुरीद थे कि उन्होंने बाबा को 653 एकड़ ज़मीन जागीर के रूप में अता की तथा वहां एक विशाल ख़ानक़ाह का निर्माण करवाया। शिवाजी की मृत्यु के एक वर्ष बाद ही बाबा याक़ूत का भी देहान्त हो गया था। जब भी शिवाजी किसी युद्ध के लिए जाते थे तो अपनी विजय के लिए बाबा याक़ूत से दुआएं व मुरादें मांगकर जाते थे। अपने फ़रमान में शिवाजी ने लिखा भी है–‘हज़रत बाबा याक़ूत बहवत थोरू बे’ अर्थात् बाबा याक़ूत बहुत बड़े सूफ़ी-सन्त हैं। एक अन्य मुस्लिम सूफ़ी संत मौनी बुआ जो कि पाड़ गांव में रहते थे, उन पर भी शिवाजी को अत्यधिक विश्वास था तथा वे मौनी बुआ के बहुत बड़े भक्त थे। युद्ध के लिए जब शिवाजी कर्नाटक मोर्चे पर जाने लगे तो उन्होंने मोर्चे पर जाने से पहले मौनी बुआ के पास जाकर उनका आशीर्वाद लिया। इतिहास कभी भी विश्वास के उस दस्तावेज़ को झुठला नहीं सकता जो हमें यह बताता है कि शिवाजी के सबसे विश्वासपात्र सहयोगी एवं उनके निजी सचिव का नाम मुल्ला हैदर था। शिवाजी के सारे गुप्त दस्तावेज़ मुल्ला हैदर की सुपुर्दगी में ही रहा करते थे तथा शिवाजी का सारा पत्र व्यवहार भी उन्हीं के ज़िम्मे था। मुल्ला हैदर शिवाजी की मृत्यु होने तक उन्हीं के साथ रहे। शिवाजी के अफ़सरों और कमाण्डरों में बहुत सारे लोग मुसलमान थे। इसके बावजूद कुछ अंग्रेज़ व मराठा इतिहासकारों ने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि शिवाजी का लक्ष्य हिन्दू साम्राज्य स्थापित करना था। परंतु ‘पूना महज़र’ जिसमें कि शिवाजी के दरबार की कार्रवाईयां दर्ज हैं उसमें 1657 ई में शिवाजी द्वारा अफ़सरों और जजों की नियुक्ति किए जाने का भी उल्लेख किया गया है। शिवाजी की सरकार में जिन मुस्लिम क़ाज़ियों और नायब क़ाज़ियों को नियुक्त किया गया था उनके नामों काज़िक्र भी ‘पूना महज़र’ में मिलता है। जब शिवाजी के दरबार में मुस्लिम प्रजा के मुक़द्दमे सुनवाई के लिए आते थे तो शिवाजी मुस्लिम क़ाज़ियों से सलाह लेने के बाद ही फ़ैसला देते थे। शिवाजी के मशहूर नेवल कमाण्डरों में दौलत ख़ान और दरिया ख़ान सहरंग नाम के दो मुसलमान कमाण्डर प्रमुख थे। जब यह लोग पदम् दुर्ग की रक्षा में व्यस्त थे उसी समय एक मुसलमान सुल्तान, सिद्दी की फ़ौज ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। शिवाजी ने अपने एक ब्राह्मण सूबेदार जिवाजी विनायक को यह निर्देश दिया कि दौलत ख़ान और दरिया ख़ान को रसद और रुपये पैसे फ़ौरन रवाना कर दिए जाएं। परन्तु सूबेदार विनायक ने जानबूझ कर समय पर यह कुमुक (सहायता)नहीं भेजी। इस बात से नाराज़ होकर शिवाजी ने विनायक को उसके पद से हटाने तथा उसे क़ैद में डालने का हुक्म दिया। अपने आदेश में शिवाजी ने लिखा कि- ‘तुम समझते हो कि तुम ब्राह्मïण हो, इसलिए मैं तुम्हें तुम्हारी दग़ाबाज़ी के लिए माफ़ कर दूंगा? तुम ब्राह्मïण होते हुए भी कितने दग़ाबाज़ हो, कि तुमने सिद्दी से रिश्वत ले ली। लेकिन मेरे मुसलमान नेवल कमाण्डर कितने वफ़ादार निकले, कि अपनी जान पर खेलकर भी एक मुसलमान सुल्तान के विरुद्घ उन्होंने मेरे लिए बहादुराना लड़ाई लड़ी।’ शिवाजी के जीवन,उनके शासन तथा उनके द्वारा जारी किए गए कई आदेशों से यह प्रमाणित होता है कि वह सम्प्रदाय या धर्म के आधार पर कभी भी पक्षपात नहीं करते थे। शिवाजी सही मायने में एक सच्चे धर्मनिरपेक्ष तथा राजधर्म निभाने वाले शासक थे। लिहाज़ा शिवाजी महाराज की किसे से भी तुलना किये जाने से पहले उसकी नीयत और नीतियों की तुलना भी ज़रूरी है।

तनवीर जाफ़री

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