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ज्योतिबा फुले : सामाजिक समरसता के सूत्रधार

भारतवर्ष ऋषियों की तपोभूमि है। सिद्ध साधकों की पुण्य धरा है। समाज सुधारकों के अविरल प्रवाह ने भारत के आंगन का सिंचन कर समरसता के सुवासित सुमन खिलाये हैं। मां भारती की अर्चना आराधना में किसी ने मंगल गीत गाये हैं तो किसी ने संगीत के स्वर अर्पित किये। कहीं बेला-गुलाब-जूही ने सुगंध बिखेर लोकजीवन को खुशी प्रदान की है तो कहीं मदार, आक, शंखपुष्पी ने भी अपने होने की सार्थकता सिद्ध की है। कहीं कबीर ने सामाजिक ताने-बाने की चादर की कमियों को काढ़ समरसता के रंग भरे तो कहीं नानक-मीरा ने समाज की रूढ़ियों-बंधनों को तोड़ मानवता के पल्लवन के लिए पर प्रशस्त किया। इस सांस्कृतिक-सामाजिक यात्रा के विकास क्रम में अनेकानेक महापुरुषों ने अपनी सांसों की समिधा अर्पित कर सामाजिक क्रांति यज्ञ को सफल बनाया। अपने विचार नवनीत से स्नेहिल परिवेश निर्मित कर सबके समान रूप से बढ़ने और जीवन गढ़ने के अवसर सुलभ कराये। इस कड़ी में हम ज्योतिबा फुले का नाम बड़े आदर-सम्मान से लेते हैं। फुले ही वह महान सामाजिक चिंतक हैं जिन्होंने महिला शिक्षा के महत्व को समझते हुए देश का पहला बालिका विद्यालय पुणे में स्थापित किया था।
         ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे के निकट एक ग्राम में हुआ था। मां का प्यार-दुलार ज्यादा न मिल सका क्योंकि एक वर्ष का होने से पहले ही मां ने अपनी सांसें पूरी कर काया त्याग दी। माता की नेह छाया से वंचित बालक ज्योति पिता गोबिंदराव की देखरेख में बढ़ने लगा। पढ़ने की उम्र होने पर एक स्कूल भेजा गया, लेकिन वहां उसके लिए कोई जगह न थी। फलत: स्कूल छोड़ना पड़ा। संयोग से पालन-पोषण करने वाली धाय सगुनाबाई ने बच्चे की प्रतिभा एवं पढ़ने की ललक को देखते हुए घर पर कुछ छुटपुट प्रयास एवं  प्रबंध किए। बालक ज्योतिबा पड़ोसियों से भी विभिन्न विषयों पर वार्तालाप करता तो बड़े बुजुर्ग भी उसकी समझ, प्रतिभा और चतुराई को देखकर दंग रह जाते थे। इसी बीच 13 वर्ष की कच्ची उम्र में उसका विवाह सावित्रीबाई के साथ हो गया। परिवार का पुश्तैनी व्यवसाय फूलों की खेती करना और फूल, गजरा, माला बनाकर विक्रय करना था। दोनों उसी काम में लग गये। सावित्रीबाई जब खेत पर खाना देने जातीं तो ज्योतिबा वहीं मेंड़ पर ही धूल में अंगुली से वर्ण बनाकर अक्षर बोध कराते। धीरे-धीरे सावित्रीबाई पढ़ना-लिखना सीख गई। ज्योतिबा की पढ़ाई अधिक नहीं हो सकी थी फिर भी उसने कठिन प्रयासों से मैट्रिक कर लिया था। पिता चाहते थे कि वह सरकारी सेवा में आकर आरामदायक जीवन यापन करे। पर ज्योतिबा के मन में कुछ और ही चल रहा था। यह वह काल था जब समाज में जाति-पांत के आधार पर एक गहरा विभाजन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था। स्वाभाविक रूप से उसका प्रभाव ज्योतिबा के मन पर पड़ता रहा होगा। लेकिन एक घटना ने युवक ज्योतिबा को झकझोर कर रख दिया, जब एक ब्राह्मण मित्र लड़के की बारात में उसे उचित मान-सम्मान न दिया गया। यह घटना ज्योतिबा के जीवन में परिवर्तनकारी मोड़ लाने में सिद्ध हुई। युवा मन सामाजिक ताने-बाने को समझने के प्रति गंभीर हो गया। वह इस व्यवस्था का विश्लेषण करने लगा। तब उसे ज्ञात हुआ की समाज में ऊंच-नीच, जाति-पात की एक बड़ी मोटी अदृश्य दीवार सदियों से खड़ी कर दी गई है जो समाज को दो वर्गों में बांटती है। दलित, पिछड़े, वंचित, शोषित वर्ग दीवार के एक तरफ हैं तो शेष समाज दूसरी ओर। ज्योतिबा इस भेदभाव की खाई को पाटकर सामाजिकता का एक सौहार्दपूर्ण एकसमान धरातल निर्मित करना चाहते थे, जहां पर न केवल विभिन्न जाति, समुदायों के बल्कि गिरिवासी, वनवासी और महिलाओं के लिए भी स्वावलंबन, शिक्षा एवं  संस्कार के समान अवसर उपलब्ध हों। हालांकि वह काल संपूर्ण देश में खासकर महाराष्ट्र में धार्मिक एवं सामाजिक सुधार का काल था। प्रार्थना समाज के माध्यम से महादेव गोविंद रानाडे और आर.जी. भंडारकर सामाजिक समरसता निर्माण करने के प्रयास में सतत सन्नध थे। लेकिन वह धारा बहुत छोटी और कमजोर थी।
          ज्योतिबा फुले महिलाओं की शिक्षा को महत्वपूर्ण मानते थे। इसलिए उन्होंने पुणे में एक बालिका विद्यालय स्थापित किया। शिक्षण के लिए शिक्षिका न मिल पाने के कारण कुछ समय स्वयं शिक्षण कार्य कर पत्नी सावित्री बाई को शिक्षण के प्रति दक्ष कर शिक्षिका के रूप में काम करने को प्रेरित किया। उल्लेखनीय है कि सावित्रीबाई फुले आधुनिक भारत की पहली शिक्षिका हैं। तमाम विरोधों, बाधाओं एवं कठिनाइयों के बावजूद वह बालिका विद्यालय चलता रहा और तो अन्य जगहों पर भी नए विद्यालय खोले गये। स्त्री जिसे पढ़ने लिखने का अधिकार न था, उसे इस प्रकार शिक्षा प्रदान करने के फुले के काम का तीव्र विरोध का परिणाम यह हुआ कि  सामाजिक दबाव पर पिता ने दोनों को घर से निकाल दिया। लेकिन फुले दंपति तो एक अलग ही प्रकार की मिट्टी से बने थे। उनके हृदयों में संकल्प के सिद्धि की आग समाहित थी। वंचित समुदाय के समुत्कर्ष का स्वप्न उनकी आंखों पर पल रहा था। स्वप्न के साकार होने के लिए आवश्यक था छूआछूत से मुक्ति। तब 24 सितंबर 1873 को अछूतोद्धार के लिए सत्यशोधक समाज की स्थापना कर स्वयं अध्यक्ष बने और सावित्रीबाई को महिला विभाग का प्रमुख बनाया। दीनबंधु अखबार के माध्यम से अपने विचार जन-जन तक पहुंचाएं। संस्था को कोल्हापुर नरेश शाहू जी महाराज ने न केवल नैतिक समर्थन दिया बल्कि भरपूर आर्थिक सहयोग भी प्रदान किया। 1854 में एक आश्रम बनाकर विधवा पुनर्विवाह को बल देकर स्त्री को सम्मान के साथ जीने हेतु अवसर देने के लिए समाज को जागरूक किया। संयोग से उनकी कोई संतान न थी तो एक ब्राह्मण विधवा के पुत्र को गोद लिया जो पढ़-लिखकर चिकित्सक बना।
              ज्योतिबा मानते थे कि यदि समानता, मानवता, आर्थिक सुदृढ़ता, न्याय, शोषण मुक्त और भाईचारे पर आधारित समाज बनाना है तो असमान और जाति आधारित सामाजिक सोच से मुक्ति पानी होगी। देश और समाज के विकास के लिए जरूरी है कि सभी मिलकर काम करें। कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। मनुष्य मनुष्य  का गुलाम हो, यह मानवीय मूल्यों के सर्वथा विरुद्ध है। वे आजीवन मानवता के पोषक रहे। उन्होंने अपने विचारों को पुस्तकों के रूप में समाज तक पहुंचाया जिनमें गुलामगिरी, विधवा पुनर्विवाह, तृतीय रत्न, इशारा आदि प्रमुख हैं। सही मायनों में फुले के जीवन ने भारत के संविधान के निर्माता डॉ.आम्बेडकर के कार्यों के लिए समुचित जमीन तैयार कर दी थी।  सामाजिक समरसता का इस प्रकाश पुंज ने 28 नवम्बर, 1890 को अपना प्रकाश बिखेर कर लौकिक जीवन से विदा ली। भारत सरकार ने फुले के सम्मान में 1977 में 25 नये पैसे का डाक टिकट जारी कर अपने श्रद्धासुमन अर्पित किये। आज ज्योतिबा फुले भले ही हमारे बीच नहीं हैं पर उनके विचार सम्पूर्ण मानव समाज का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
प्रमोद दीक्षित मलय
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