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काश कोई मानवता के पक्ष में बोले!!!

“एंटी नैशनल”एक शब्द है जो कि आजकल बहुत अधिक प्रचलित है।ख़ैर,असल में”छपाक”की निर्माता और मुख्य किरदारा के जेएनयू जाने से एकदम भूचाल सा गया।कोई बात नहीं।इस तरह के भूचाल आते रहते हैं लेकिन बेहद दुर्भाग्यपूर्ण कुछ और था,और वो ये था कि जैसे ही यह घटनाक्रम हुआ,जेएनयू में आने जाने वाला प्रकरण,तो यकायक सोशल मीडिया पर,ट्विटर पर ट्रेंड हो गया कि जो भी इस फ़िल्म को देखेगा वो एंटी नैशनल होगा।खेर,यहाँ तक भी सही हो सकता है क्योंकि ये भी एक विचार है और इस विचार की भी कद्र की जानी चाहिए क्योंकि लोकतन्त्र में सबको अपनी बात कहने की पूरी आजादी है।दुर्भाग्यपूर्ण यह था कि एक पोस्ट चली कि ये फ़िल्म “छपाक” कम से कम फ़लां विशेष धर्म के लोग ना देखें क्योंकि इस फ़िल्म में इस विशेष धर्म के खिलाफ साजिश की गयी है।साजिश ये बताई गयी कि जो लड़की एसिड अटैक से पीड़ित है,उस पर एसिड अटैक तो किसी दूसरे फ़लां विशेष धर्म वाले ने किया था और दिखाया यह जा रहा है कि ये फलां विशेष धर्म वाले ने किया है।एक बारगी लगा कि शायद यह सही भी है।अब ये सही है या गलत,इसका निर्णय करने के लिए तो फ़िल्म का देखना बेहद जरुरी था,फ़िल्म देखी और देखने पर यह पाया गया कि पूरी फ़िल्म में ऐसा कहीं भी नहीं है बल्कि जैसा था,वैसा ही है बिल्कुल सही व सटीक रूप में।एकबारगी दिमाग में आया कि वाक्य ही लोग आजकल जहर उगलते हैं और वह भी जानबूझकर,शर्म भी नहीं आती ऐसे लोगों को।फिर एक सवाल उठने लगा कि नहीं हमारे विरोध के कारण पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं,ऐसा हो सकता है लेकिन पहले भी फिल्मों पर बहुत विवाद हुए हैं लेकिन ऐसे कुछ बदलता हुआ नहीं देखा गया,अगर कुछ बदला गया तो वह बहुत भारी विरोध के कारण।पर यकींन मानिए अगर आप फ़िल्म देखें या फ़िल्म की कहानी ही पढ़ लें तो ऐसा बिल्कुल भी लगता कि पात्रों के नाम बदले गए हैं या डेब्यू किया गया है।
अगर कोई इस तरह के घिनोने कुतर्क देकर अपनी बात कहकर जहर फैलाता है तो कम से काम ऐसा धर्म का ठेकेदार नहीं चाहिए।चलिए मान लेते हैं कि इनके ही तर्क सही हैं लेकिन इनके तर्कों को तब सांप सूंघ गया था जब”आजा नच ले”गाने में एक जाति विशेष का नाम था,प्रेमचंद की कहानी भी विवादों के घेरे में रही है और तो और अभी-अभी एक सीरियल चल रहा है डॉक्टर आंबेडकर के नाम पर,उसका भी विरोध कि ये तो समाज तोड़क है।तब तो कोई नहीं बोला,तब तो किसी को खाज नहीं हुई।और तो और जाति के नाम पर अब भी हरियाणा जैसे राज्य में मन्दिरों तक में प्रवेश नहीं दिया जाता,घुड़चढ़ी तक नहीं होने दी जाती,जाति के नाम पर जबरदस्त शोषण है।यहाँ तक कि हद दर्जे का शोषण है।घटनाएं एक आध नहीं है बल्कि सैंकड़ों,हजारों में है पर मजाल है कि कोई धर्म का ठेकेदार सामने आए और खुला,नंगा एलान करे कि जो धर्म ये सब करता है,उसे हम धर्म नहीं मानते या फिर ये सब बंद किया जाए।दोहरा चरित्र,दोगलापन कब तक चलेगा और चले हैं हम एक ऐसा राष्ट्र बनाने कि……। दुराव है, छिपाव है, सियासत है और कुतर्क इतने कि माशाअल्लाह!!!!

कृष्ण कुमार निर्माण

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