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कमजोर पड़ रही रिश्तों की नींव

कहीं पत्नी ने पति की हत्या कर दी…तो कहीं पति ने पत्नी की हत्या कर दी…अवैध संबंध इन हत्याओं का कारण रहा….तो वहीं दूसरी ओर बेटे ने अपने ही पिता की हत्या कर दी….तो कहीं एक भाई ने ही अपने बड़े भाई की हत्या कर दी…यहां हत्या का कारण जमीनी विवाद रहा….तो पुश्तैनी रिश्तों से जुड़े परिवारों में तलवार चल पड़ी और दो की जान चली गई…कई लोग घायल हुए….यहां बात पैतृक संपत्ति को लेकर बिगड़ी….यहीं नहीं मामला तो ऐसा भी सामने आया कि भाई ने ही गुस्से में अपनी बहन का सुहाग उजाड़ दिया…तो एक बेटे ने मां की हत्या केवल इस लिए कर दी…क्योंकि मां ने उसे बिस्तर से जल्दी उठा दिया। ये सब केवल बानगी है दरकते रिश्तों की। जी हां….रिश्ते इतने कमजोर पड़ जाएंगे, कभी शायद आपने भी नहीं सोचा होगा। टीवी और समाचार पत्रों में आए दिन ऐसी खबरें सुर्खियां बनती है। लेकिन सभी खबरों में एक ही चीज निकल कर सामने आती है कि रिश्तों पर अत्यधिक आंच आ रही है। लेकिन ऐसा हो क्यों रहा है…क्यों आज समाज में लोग हीन भावना के शिकार हो रहे हैं। खासकर युवा वर्ग तो कुछ ज्यादा ही उतावलेपन में नजर आ रहा है। छोटी-छोटी बातों को लेकर ही अपने रिश्तों को झुठलाने में लगा है। गुस्से में उन रिश्तों को भी भुला बैठता है जिन्हें विधाता ने उसके भाग्य में लिखकर धरती पर भेजा है। उस परिवार को भूल बैठता है जिसमें उसका बचपन गुजरता है, जहां वह पला-बढ़ा है। गुस्सा इस कदर हावी होगा कि बात हत्या तक पहुंचेगी,ये तो ना सोचा होगा आपने भी। लेकिन यह आज के समय में हो रहा है। रिश्तों की कमजोर कड़ी खुद हम ही हैं। हम लोगों ने ही इस क्रूर भावना को अपने और परिवार में दाखिल होने की जगह दी है। आज से 2 दशक पूर्व तक संयुक्त परिवारों की एक विस्तृत परंपरा रही। हालांकि फिलहाल भी ऐसे परिवार हैं जो इस परंपरा को निभा रहे हैं। लेकिन फिलहाल धीरे-धीरे लोग केवल अपने तक सीमित होने लग गए हैं। समूह में रहने से तो जैसे चिड़ सी होने लगी है। माना जा सकता है कि संयुक्त परिवार में परिजनों की आपसे अत्यधिक अपेक्षा की जा रही हो। लेकिन इस दौरान आप उस अपेक्षा के सामने अपने आपको कमतर आंकने की भूल करने लग जाएं। तभी ऐसे हालात बनते हैं और एक परिवार में ही गुटबाजी हावी होने लग जाती है। गुटबाजी का दूसरा पहलू पारिवारिक संपत्ति भी है। जमीन जायदाद को आपस में बराबर हिस्से में रख साथ रहने की बजाय अधिकाधिक जमीन अपने नाम करने के लालच में परिवार पीछे छूट जाता है और हकीकत केवल यह होती है कि अपने भी पराये हो जाते हैं। लेकिन इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा। संयुक्त परिवार में रहेंगे तो फिर साथ रहने पर जमीन के लालच का चक्कर तो नहीं रहेगा। ऐसे में संयुक्त परिवार की भारतीय प्राचीन अवधारणा को फिर से बढ़ावा देने की जरुरत है और इसके लिए युवाओं को आगे आना होगा। वहीं युवाओं में बढ़ रही नशे की प्रवृत्ति भी परिवार को खोने में भागीदारी निभा रही है। पारिवारिक मूल्यों को नशा अपना ग्रास बना रहा है। नशा युवाओं को इस कदर खोखला कर रहा है कि वे अपने से बड़ों का सम्मान करना तो भूल ही गए हैं। वहीं गलती पर माफी मांगने की बजाय रिश्तों पर ही हमला कर रहे हैं। पारिवारिक रिश्तों की नींव को कमजोर करने वाली सबसे बड़ी फिलहाल युवा ही बन रहा है। 80 फीसदी मामलों में युवा ही सिरफिरा हो रहा है। जरुरत बचपन से ही संस्कारित पारिवारिक माहौल देने की जरुरत है। कहा जाता है कि बचपन में दी गई मां-बाप और परिजनों की सीख जीवनभर बच्चे का मार्गदर्शन करती है। लेकिन इस बात को फिलहाल गौण किया जा रहा है। जरुरत किताबी ज्ञान से ज्यादा जरूरी घरेलु पाठशाला में ज्ञान देने की है। जब तक बच्चे अपने परिवार से नहीं जुड़ेंगे ऐसे ही वाकिये समाज में होते रहेंगे। युवा पीढ़ी के साथ ही उनके परिजनों की भी जिम्मेदारी बनती है कि गलत राह पर जाते बच्चों को समय रहते सही राह दिखाए। बच्चों के लिए भागदौड़ की जिंदगी के बीच बातचीत के लिए नियमित समय निकालते रहें। जिससे बच्चे को भी अहसास रहे कि उसकी गतिविधियों पर परिजनों की नजर है और समय रहते सही राह पर अगर बच्चा आ जाए तो परिवार भी बना रहेगा और संस्कारों के बलबूते रिश्तों की नींव मजबूत होगी।

चन्द्रमौलि पचरंगिया
लेखक रसमुग्धा त्रैमासिक पत्रिका के सम्पादक हैं

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