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कविता : आओं फगुआ के गीत सुनाएँ

आओं फगुआ के गीत सुनाएँ

आओं सभी मनायें होली फाग सुनाते ढोल बजाते,
बजता झांझ-मंजीरा प्रेम भाव की बोले बोली।
तीज पर्व खुशियाँ होली आज बने हैं मात्र ठिठोली।
कष्ट मिटाएं मानवता का, आओ गीत फगुआ के गाएं।
मिलजुल कर हर चैराहे, रंगों का यह पर्व मनाएं।
परहित केवल कहकर होली सबके प्रति अनुराग होली।
सभी पर्व मंगलमय होवे क्यों न द्वेष की आग बुझाते।
आडंबर हम दूर भगाये क्यों यह ज्ञान नहीं दिखलाते।
रंग उड़ाये नाचे गाये ऐसी फाग क्यों न अपनाते।
प्रति दिन रहे प्रफुल्लित भारती प्रति संवत हम फाग मनाते।

मंगल व्यास भारती
गढ़ के पास , चूरू राज.

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