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कविता : अगर चाहिए सुकून तुझे तो

अगर चाहिए सुकून तुझे तो

अगर चाहिए सुकून तुझे तो
किसी की आँखों मे झांक के देख।

समझना है इस जमाने को तो
इसकी हर हरकत को देख।

परायों को अपना समझ तो
अपनों को करीब ला के देख।

संसार कहते हैं जिसे उसे
अपना परिवार समझ के देख।

यूँ ही आते किसी की आंखों में आंसू
इन आंसुओं का दर्द समझ के देख।

ये रात लंबी हो भले ही बहुत
तू सुबह का इंतज़ार कर के देख।

ये बागबान में हमेशा न होगा पतझड़
इस बगिया में आती बसंतबहार को देख

मुकेश बिस्सा
श्री कन्हैया कुन्ज, 4 नवखुनिया,गांधी कॉलोनी
जैसलमेर

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