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कविता : ऐसा ना हो अकेले रह जाओ

ऐसा ना हो अकेले रह जाओ

माना जीवन मे खुशियो को तुम पाओगे,
क्या करोगे उन खुशियो का जब उन्हें
बिना परिवार खुद अकेले ही मनाओगे।

माना सारी सुख सुविधा को तुम पाओगे,
क्या करोगे सुख सुविधा का जब उन्हें
औरो का हक मार कर तुम कमाओगे।

माना जीवन मे तुम आगे बढ़ते जाओगे,
क्या करोगे मंजिलो पर पहुँचकर,
जब वहाँ खुद को अकेला तुम पाओगे।

शिखर पर पहुँच क्या अकेले मुस्करा पाओगे,
कोई भी ना होगा जब पास तेरे,बताओ मुझे,
फिर गीत खुशियो के किस तरह गुनगुनाओगे।

कभी उठा , कभी गिरा , इंसान यूँ ही आगे चला,
दिन-रात की भाग दौड़ में ईमान से ना गिरना कभी,
ऐसा ना हो बईमानी अपनो से करते करते हुए,
तुझे पता भी ना चले और तू अकेला रह जायेगा।

जीवन हर पल घटता जैसे पर्वत पल पल गिरता है।
तू क्यों ना मिलजुलकर सबसे हिम पर्वत सा ढलता है।।
चाहे कोई बड़ा या छोटा हो,ले चल साथ सभी को,
जैसे नदियों का पानी मिलकर एक समंदर बनता है।।

नीरज त्यागी
ग़ाज़ियाबाद ( उत्तर प्रदेश ).
मोबाइल 09582488698

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