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कविता : अर्जी का हाल

ऑफिस में बाबू जी खर्राटे मार रहे थे
बीच बीच में मच्छरों का नाश कर रहे थे

हमने भी हिम्मत जुटाकर उनको हिलाया
हमको देखकर उनका चेहरा तमतमाया

फिर बोले वो नींद से क्यों हमे जगाया
जवाब में हमने भी अर्जी को दिखाया

समय लगेगा इस पर उनका प्रत्युत्तर आया
हमने भी पत्र की अहमियत को बताया

पीक थूक कर अर्जी पढ़ने की बारी आई
यह देखकर हमारे भी जान में जान आई

अर्जी पर काम हेतु ब्योरा उन्होंने मापा
हमने भी संलग्न में सिफारिशी पत्र सौंपा

बोले समय हो गया अब कल फिर आईये
साथ मे थोड़ा सा वजन भी लगाइये

काम की गंभीरता को देख तुरन्त भार लगाया
हमने भी उसके अंत मे स्वीकृति पत्र पाया

मुकेश बिस्सा
श्री कन्हैया कुंज,4 नवखुनिया
गांधी कॉलोनी
जैसलमेर

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