न्यूज के लिए सबकुछ, न्यूज सबकुछ
ब्रेकिंग न्यूज़

कविता : बजट शब्दों का जाल

शुरू  होते  फरवरी  का  महीना,
बजट  पेश   करती  है  सरकार।
उम्मीद  लगाए  जनता   सोचती,
होगी जिंदगी इसबार  खुशहाल।
बजट  आती  है,बजट  जाती  है,
सरकार लेखा-जोखा  सुनाती है।
पर  कुछ नहीं बदलता  है उनका,
जिंदगी जिनकी रहती फटे हाल।
वंचित  गरीब मजदूर किसान का,
भला कौन  रखता चाहता ध्यान।
बजट  है बाजीगरी  आंकड़ों  का
बनाया  जाता  शब्दों   का जाल।
गरीब  फंसता  जा  रहा  कर्ज में,
अमीर  हो  रहा  और मालामाल।
कैसे बजट बनाते  हैं अर्थशास्त्री,
देश  पूछ  रहा  है उनसे  सवाल।
जरूरत  के  वस्तुओं की कीमत,
दिनों दिन छू  रहा  है  आसमान।
भोग  की  वस्तुएं  सस्ती  हो रही,
लुफ्त उठाते  हैं सत्ता  के दलाल।
भारत  तब  ही बदल  सकता  है,
जब  रखा  जाए सबका  ख्याल।
जरूरत आज उनकी सोचने की,
जिनकी हालत है सबसे बदहाल।
हर रणनीति  है  तब  तक बेकार,
जब तक  युवा हैं बैठे बेरोजगार।
युवाओं  के लिए हो युवा आयोग,
तब भागेगा  बेरोजगारी  का रोग।
एक  समान हो वेतन और पेंशन,
खुश हो  कर्मचारियों का तनमन।
भ्रष्टाचार मुक्त  बने हर कार्यालय,
नैतिक  बने भारत  का जन-जन।
बजट  ना सिर्फ आंकड़ों का खेल,
बने  देशवासियों  के मन का मेल।
झलके जब  इसमें विचार सबका,
तकदीर बदल जाएगा भारत का।
गोपेंद्र कुमार सिन्हा गौतम
शिक्षक और सामाजिक चिंतक
देवदत्तपुर दाउदनगर औरंगाबाद बिहार 
व्हाट्सएप नंबर 950 734 1433
Print Friendly, PDF & Email
Skip to toolbar