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कविता : दिवास्वप्न

दिवास्वप्न

कुछ दिन पहले की है बात,
मैं गहरी नींद में सो रहा था।
नींद में ही खेलने लगा क्रिकेट,
इंग्लैंड टॉस जीत चुका था।
उसने किया बैटिंग का चुनाव,
धीरे धीरे मैच आगे बढ़ रहा था।
मैंने बौलिंग की करी शुरुआत,
पहले गेंद पर मिला एक विकेट।
मेरा हौसला काफी बढ़ गया था,
दूसरे गेंद पर फिर मिला विकेट।
तीसरी गेंद लेकर में दौड़ने लगा,
बल्लेबाज थरथर कांपने लगा।
गेंद फेंका फिर उड़ गया स्टंप,
छह गेंद में मिला छह विकेट।
खुशी से मैं खूब झूमने लगा,
मैदान में गोल गोल घूमने लगा।
अब थी हमारी बैटिंग की बारी
पहली गेंद पर छक्का मैंने मारी।
धुआंधार बैटिंग था जारी,
बॉलर ने एक बाउंसर फेका।
उस पर किया जोरदार प्रहार,
गेंद पहुंच स्टेडियम के पार।
इस तरह इंग्लैंड गया था हार,
जीत से दर्शक सभी झूमने लगे,
मुझे मिला तीन चार पुरस्कार।
मैं जोर-जोर से चिल्लाने लगा,
लेकर जीता हुआ वर्ल्ड कप।
इसी बीच मेरा नींद खुल गया,
सबकुछ निकल गया दिवास्वप्न।

गोपेंद्र कुमार सिन्हा गौतम
देवदत्तपुर दाऊदनगर औरंगाबाद बिहार
व्हाट्सएप नंबर 950 734 1433

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