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कविता : दुनियां की भीड़ में मुसाफिर

दुनियां की भीड़ में मुसाफिर

दुनियां की इस भीड़ में.खोया इक मुसाफिर वो।
इंसान मगर इंसानों में क्यों अजनबी वो।
रिश्तों के रंगों की कोई पहचान नहीं सबकों वो।
जान अपना दिल के गिले शिकवे कहता अजीब वो।
हर वक्त इधर उधर भटकता रहता. कोई मंजिल नहीं।
मान समान की कोई शिकायत नहीं कैसे साहब है वो।
चहरे पे नूर है ऐसा जाने कोई फरिश्ता आया।
जमीं पे तन बदन से लगता जाने खुदा की रोशनी अजीब है वो।
इस तन्हाई में फिर क्यों रह गया यूं अकेला।
इंसान नहीं वो कोई फरिश्ते की तहजीब का असर है वो।
भारती भरी दुनियां में इबादत की जगह है वो।
न जाने क्यों हर दिल की धड़कती खुश नशीबी है वो।

मंगल व्यास भारती
गढ़ के पास , चूरू राजस्थान

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